गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 43

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गीता-प्रबंध
5.कुरुक्षेत्र

इस संबंध में भी हम वास्विकता को मृदु, मधुर और भ्रामक रूप देकर दिखाना पसंद करते हैं। हम प्रेम और दया के ईश्वर को गढ़ लेते हैं जो हमारी धारणा के अनुसार शुभ, न्याय, सदगुण और सदाचार का देवता, न्यायकर्ता, सद्गुण और सदाचारी है, और बाकी जो कुछ है उसके संबंध में हम झट कह देते है कि वह ईश्वर नहीं है न ईश्वर का उससे कुछ वास्ता है, वह किसी शैतान की सृष्टि है जिसे किसी कारणवश ईश्वर ने उसकी दुष्ट इच्छा पूरी करने दी अथवा वह अंधकार के स्वामी अहिर्मन की सृष्टि है जो शिवस्वरूप अहुर्मज्द की मंगलमयी कृति को धूल में मिलाना चाहता है, अथवा यह स्वार्थी और पापी मनुष्य का ही काम है कि उसने इस ईश्वर की मूल निर्दोष सृष्टि को बिगाड़ डाला। मानों प्राणि जगत् में मृत्यु निगलने का विधान मनुष्य का बनाया हुआ हो और यहां जो भीषण प्रक्रिया कर रही है जिसके द्वारा प्रकृति सृष्टि करती है, मनुष्य की रची हुई हो। संसार में कुछ ही धर्म ऐसे हैं जिन्होंने भारत के आर्य-धर्म के समान निःसंकोच यह यह कहने का साहस दिया कि यह रहस्यमय विश्व-शक्ति एक ही भगवत्व है, एक ही त्रिमूर्ति है; यही धर्म यह कह सका है कि जो शक्ति इस जगत् कर्म में व्याप्त है वह केवल परोपकारी दुर्गा ही नहीं बल्कि रक्तरंजित संहार-नृत्य करने वाली, करालवदना काली भी है और ’यह भी माता हैं; इन्हें भी परमेश्वरी जानो और सामर्थ्‍य हो तो इनका पूजन करो।’
यह बड़े मार्के की बात है कि जिस धर्म में ऐसी अचल सत्यनिष्ठा और प्रचंड साहस था वही ऐसी गंभीर और व्यापक आध्यात्मिकता का निर्माण कर सका, जिसकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। क्योंकि सत्य ही वास्तविक आध्यात्मिकता का आधार है और साहस उसकी आत्मा। तस्यै सत्यमायतनम् । इन सब बातों का यह अभिप्राय नहीं कि संग्राम और विनाश ही जीवन का अथ और इति है या सामंजस्य संग्राम से बड़ी चीज नहीं है और प्रेम मृत्यु की अपेक्षा भगवान् का अधिक अभिव्यक्त रूप नहीं है, फूट स्थान एकत्व को, निगलने का स्थान प्रेम को, अहंभाव का स्थान विश्व को, मृत्यु का स्थान अमर जीवन को नहीं देना चाहिये। भगवान् केवल संहार कर्ता नहीं बल्कि सब प्राणियों के सुहृद् हैं; केवल विश्व के त्रिवेद ही नहीं बल्कि परात्पर पुरुष है; करालवदना काली स्नेहमयी मंगलकारिणी माता भी हैं; कुरुक्षेत्र के स्वामी दिव्य सखा और सारथी हैं; सब प्राणियों के मनमोहन हैं, अवतार श्रीकृष्ण हैं। वे इस संग्राम, संघर्ष और विश्व श्रृंखला में से होकर हमें चाहें जहां ले जा रहे हों, इसमें संदेह नहीं कि वे हमें उन सब पहलुओं के परे ले जा रहे हैं जिन पर हम दृढ़ता के साथ आग्रह कर रहे थे। पर कहां, कैसे, किस प्रकार की तत्परता से, किन साधनों से- यह हमें ढूंढ़ने के लिये पहली आवश्यक बात यह है कि हम इस जगत् को जैसा यह है वैसा देखें, और उनकी क्रिया आरंभ में और अब जैसे-जैसे दिखायी देती जाये वैसे-वैसे उसको देखते जायें और उसका ठीक-ठीक मूल्य आंकते जायें, इसके बाद, उनका मार्ग और लक्ष्य स्वयं प्रत्यक्ष हो जायेंगे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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