नवतारा

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नवतारा
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 6
पृष्ठ संख्या 258
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक राम प्रसाद त्रिपाठी
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1966 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक कृपाशंकर शुक्ल

नवतारा अथवा नोवा, (Nova) उस तारे को कहते हैं जो एकाएक चमक उठता है और पुन: धीरे-धीरे अपनी पहले जैसी धूमिल अथवा अदृश्य दशा में पहुँच जाता है। ऐसे तारे को कभी कभी 'अस्थायी तारा' भी कहते हैं।

नवतारा

नवतारे की चमक बड़ी तेजी से बढ़ती है, यहाँ तक कि दो तीन दिन में अथवा इससे भी कम समय में कई हजार गुनी बढ़ जाती है, परंतु चमक के घटने में काफी समय लगता है। परमाधिक चमक की अवस्था प्राप्त हो जाने पर तुरंत चमक का घटना प्रारंभ हो जाता है। आरंभ में चमक बड़ी तेजी से घटती है, परंतु कुछ समय बाद चमक के घटने की गति मंद पड़ जाती है। चमक के घटते समय चमक के उतार चढ़ाव भी होता रहता है। तारे को अपनी पूर्वस्थिति प्राप्त करने में साधारणत: 10 से 20 वर्ष तक लगते हैं।

नवतारे के स्पेक्ट्रम अध्ययन से विदित होता है कि चमक बढ़ने पर तारा ऐसी गैसों में आच्छादित हो जाता है जिनका वेग अत्यधिक होता है। तारे के चारों ओर फैलती हुई गैसों के कारण ग्रहीय नीहारिका के समान बिंब दिखाई पड़ता है, जो कई वर्षों तक बढ़ता रहता है और फिर मिट जाता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नवतारे को आच्छादित करनेवाली गैसें तारे के अंदर होनेवाले विस्फोट से उत्पन्न होती है।

नवतारे साधारणत: अपने जीवनकाल में केवल एक बार प्रस्फुटित होकर शांत हो जाते हैं, परंतु तीन तारे ऐसे भी देखे जा चुके हैं, जो एक से अधिक बार प्रस्फुटित हुए हैं। ये नवतारे 'आर-एस ओफ्युची', 'टी कारोनी वोरियालिस' (Coronae Borealis) और 'टी पिक्सिडिस' है। इनमें से पहले दो, दो बार प्रस्फुटित हो चुके हैं और तीसरा चार बार। बार-बार प्रस्फुटित होनेवाले तारे को 'आवर्तक नवतारा' '(recurrent nova) कहते हैं।

किसी किसी तारे में नवतारे के लक्षण सदैव पाए जाते हैं। ऐसे तारे को 'स्थायी नवतारा' कहते हैं। ऐसे तारे का सबसे अच्छा उदाहरण 'पी सिग्नी' (Cygni) हैं।

कोई-कोई नवतारा प्रस्फुटन के समय इतना चमकदार हो जाता है कि वह जिस आकाशगंगा में स्थित होता है उसकी संपूर्ण चमक का मुकाबला करने लगता है। ऐसे नवतारे को 'अधिनवतारा' (Supernova) कहते हैं। अधिनवतारे अधिकतर अगांग नीहारिकाओं में मिलते हैं, परंतु हमारी अपनी आकाशगंगा में ऐसे तारों का अभाव नहीं है। पिछले 900 वर्षों में तीन अधिनवतारे हमारी आकाशगंगा में देखे जा चुके हैं, जिनमें से पहला 1054 ईसवी में देखा गया था, जो अब एक बढ़ती हुई नीहारिका के रूप में है और क्रैव नीहारिका (Crab Nabula) के नाम से प्रसिद्ध है, दूसरा जो सन्‌ 1572 में कश्यपमंडल में दिखाई पड़ा और टाइको ब्राए (Tycho Brahe) का नवतारा कहलाता है, और तीसरा केपलर (Kepler) का नवतारा है जो सन्‌ 1604 में दिखाई दिया। सन्‌ 1944 तक लगभग 100 नवतारों के देखे जाने का उल्लेख मिलता है। ये आकाशगंगा में या उसके आसपास देखे गए हैं। अधिनवतारों की चमक सूर्य की चमक से भी अधिक तेज होती है।



टीका टिप्पणी और संदर्भ

संदर्भ ग्रंथ: एल. कैंपबेल ऐंड एल. जक्किया : दि स्टोरी ऑव वेरिएबल स्टार्स (1841)।

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