महाभारत उद्योग पर्व अध्याय 159 श्लोक 1-15

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एकोनषष्‍टयधिकशततम (159) अध्‍याय: उद्योगपर्व (उलूकदूतागमनपर्व)

महाभारत: उद्योगपर्व: एकोनषष्‍टयधिकशततम अध्याय: श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद

धृतराष्‍ट्र और संजय का संवाद

जनमेजयने पूछा—द्विजश्रेष्‍ठ ! जब इस प्रकार कुरूक्षेत्रमें सेनाएं मोर्चा बांधकर खडी हो गयी, तब कालप्रेरित कौरवोंने क्‍या किया। वैशम्‍पायनजीने कहा—भरतकुलभूषण महाराज ! जब वे सभी सेनाएँ कुरूक्षेत्रमें व्‍यूहरचनापूर्वक डट गयी, तब धृतराष्‍ट्र ने संजय से कहा-संजय ! यहाँ आओ ओर कौरवों तथा पाण्‍डवोंकी सेनोके पडाव पड़ जानेपर वहाँ जो कुछ हुआ हो, वह सब मुझे पूर्णरूपसे बताओ। मैं तो समझता हूं देव ही प्रबल है । उसके सामने पुरूषार्थ व्‍यर्थ है; क्‍योंकि मैं युद्धके दोषोंको अच्‍छी तरह जानता हूँ। वे दोष भयंकर संहार उपस्थित करनेवाले हैं, इस बातको भी समझता हूँ, तथापि ठगविद्याकेपण्डित तथा कपट बातको भी समझता हूं, द्यूत करनेवाले अपने पुत्रको न तो रोक सकता हूं और न अपना हित-साधन ही कर सकता हूं। सूत ! मेरी बुद्धि उपर्युक्‍त दोषोंको बारंबार देखती और स‍मझती है तो भी बुद्धिमानसे मिलनेपर पुन: बदल जाती है। संजय ! ऐसी दशामें अब जो कुछ होनेवाला है, वह होकर ही रहेगा। कहते हैं, युद्धमें शरीरका त्‍याग करना निश्‍चय ही सबके द्वारा सम्‍मानित क्षत्रिय धर्म है। संजय ने कहा- महाराज ! आपने जो कुछ पूछा है और आप जैसा चाहते हैं, वह सब आके योग्‍य है; परंतु आपको युद्धका दोष दुर्योधनके माथेपर नहीं मढना चाहिये। भूपाल ! मैं सारी बातें बता रहा हूं, आप सुनिये । जो मनुष्‍य अपने बुरे आचरणसे अशुभ फल पाता है, वह काल अथवा देवताओं पर दोषारोपण करनेका अधिकारी नहीं है। महाराज ! जो पुरूष दूसरे मनुष्‍योंको साथ सर्वथा निन्‍दनीय व्‍यवहार करता है, वह निन्दित आचरण करनेवाला पापात्‍मा सब लोगोंके लिये वध्‍य है। नरश्रेष्‍ठ ! जूएके समय जो बार-बार छल-कपट और अपमान के शिकार हुए थे, अपने मन्त्रियोंसहित उन पाण्‍डवोंने केवल आपका ही मुँह देखकर सब तरहके तिरस्‍कार सहन किये हैं। इस समय युद्धके कारण घोडों, हाथियों तथा अमित तेजस्‍वी राजाओंको जो विनाश प्राप्‍त हुआ है, उसका सम्‍पूर्ण वृतान्‍त आप मुझसे सुनिये। महामते ! इस महायुद्धमें सम्‍पूर्ण लोकोंकेविनाश को सूचित करनेवाला जो जो वृतान्‍त जैसे-जैसे घटित हुआ है, वह सब स्थि‍र होकर सुनिये और सुनकर एकचित्‍त बने रहिये (व्‍याकुल न होइये)। क्‍योंकि मनुष्‍य पुण्‍य और पापके फल भोगकी प्रक्रिया में स्‍वतन्‍त्र कर्ता नहीं है ; क्‍योंकि मनुष्‍य प्रारम्‍भ के अधीन है, उसे तो कठपुतली की भां‍ति उस कार्यमें प्रवृत्‍त्‍ होना पडता है। कोई ईश्‍वर की प्रेरणासे कार्य करते हैं, कुछ लोग आकस्मिक संयोगवश कर्मोंमें प्रवृत्‍त होना पड़ता है। कोई ईश्‍वर की प्रेरणासे कार्य करते हैं, कुछ लोग आकस्मिक संयोगवश कर्मोंमें प्रवृत्‍त होते हैं तथा दूसरे बहुत-से लोग अपने पूर्ण कर्मोंकी प्रेरणासे कार्य करते हैं। इस प्रकार ये कार्यकी विविध अवस्‍थाएं देखी जाती हैं, इसलिये इस महान् संकटमें पड़कर आप स्थिरभावसे (स्‍वस्‍थचित्‍त होकर) सारा वृत्‍तान्‍त सुनिये।

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्‍तर्गत सैन्‍यनिर्वाणपर्वमें संजयवाक्‍यविषयक एक सौ उनसठवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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