कोशल कोसल

अद्‌भुत भारत की खोज
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लेख सूचना
कोशल कोसल
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3
पृष्ठ संख्या 190
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पांडेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1976 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक विशुद्धनंद पाठक

कोशल कोसल गौतम बुद्ध के समय तथा उनसे पूर्व भारतवर्ष में जो 16 महाजनपद थे उनमें से एक और प्रमुख। कोसल (जनपद के नाम के कोसल और कोशल दोनों ही रूप मिलते हैं) के इतिहास की जानकारी के मुख्य स्त्रोत हैं उत्तर-वैदिक साहित्य के ब्राह्मण और उपनिषद् ग्रंथ, संस्कृत साहित्य के दोनों महाकाव्य-रामायण और महाभारत, पुराण तथा बौद्ध त्रिपिटक। वाल्मीकि रामायण (बाल., 1.55) में उसे सरयू नदी के किनारे स्थित प्रभूत धनधान्य से संपन्न महान्‌ तथा विस्तृत जनपद कहा गया है। कोसल महाजनपद भारतीय भूखंड

के उत्तरी पूर्वी भाग में स्थित तथा मध्यप्रदेश अथवा आर्यावर्त का प्रमुख क्षेत्र था। जैन साहित्य में उसे कुणाल विषय की संज्ञा दी गई। उसके पश्चिम में पांचाल, पूर्व में सदानीरा नदी (बड़ी गंडक) और विदेह जनपद तथा दक्षिण में तमसा (टोंस), गोमती और स्यंदिका (सई) नामक नदियों के दुकूल पड़ते थे। दक्षिण में उसकी सीमा कहीं कहीं गंगा को छूती थी। शाक्य, मल्ल, कोलिय तथ मोरिय नामक बुद्ध कालीन गणतंत्र भी उसी की सीमा में पड़ते थे। अयोध्या (और, अथवा, साकेत), श्रीवस्ती, कपिलवस्तु, संतेव्या, रामग्राम, पिप्पलिवन, कुसिनारा और पावा उसके मुख्य नगर एवं सरयू, अचिरवती (राप्ती), रोहिणी, हिरण्यवती (छोटी गंडक), अनोमा, कुकत्था, (घाघी), मही, सुंदरिका (स्यंदिका अथवा सई) और बाहुका (घुमेल) उसकी मुख्य नदियाँ थीं। महावन, जेतवन, अंधकवन और कंटकीवन उसके मुख्य वन थे।

कोसल के सूर्यवंशी राजकुल के प्रथम शासक मनु के पुत्र इक्ष्वाकु थे। अयोध्या को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया और वहाँ से अपने राज्य का विस्तार किया। पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार इक्ष्वाकुपुत्र विकुक्षि के पुत्रों ने मेरु (संभवत: पामीर) के उत्तरी प्रदेशों को उपनिविष्ट किया। वंश के 10 वें राजा श्रावस्त ने प्रसिद्ध नगर श्रीवस्ती की नींव डाली। उनके पौत्र कुवलयाश्व ने राजपूताने के प्रदेशों पर अधिकार प्राप्त किया। मंधाता इस वंश के प्रथम चक्रवर्ती थे और पुराणों तथा महाभारत में उन्हें त्रैलोक्य विजयी कहा गया है, जिसका समर्थन बौद्धों के मंधातु जातक से भी होता है। ऋ ग्वेद में उन्हें दस्युहंता तथा भागवतपुराण में त्रसदस्यु कहा गया है। यमुना नदी के किनारों पर तथा प्रसिद्ध तीर्थ कुरु क्षेत्र में उन्होने यज्ञ किया। पुराणों में उनकी विजय महान्‌ मानी गई हैं। मांधाता के पुत्र पुरु कुत्स ने दक्षिण में नर्मदा के किनारे तक कोसल का प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया। परंतु पुरु कुत्स के बाद कुछ पीढ़ियों तक कोसल अल्पकालिक अंधकार और विपत्ति से ग्रस्त हो गया। दक्षिण भारत के हैहयों ने कृतवीर्य और अर्जुन के नेतृत्व में उत्तर के अनेक राज्यों के साथ कोसल को भी आक्रांत किया। वहाँ के राजा बाहु को, हैहय तालजंघों तथा उनकी मित्र उत्तरपश्चिमी भारत की कुछ जंगली जातियों ने अपनी राजधानी अयोध्या छोड़कर जंगल में भाग जाने को विवश किया। वन में ही उनकी मृत्यु हो गई तथा उनकी गर्भवती रानी की और्वऋ षि के आश्रम में शरण लेनी पड़ी। कालांतर में वहीं उसे सगर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

और्व ने सागर को सभी संभावित समस्याओं का सामना करने के योग्य बनाने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी। परंतु सगर की कठिनाइयाँ और समस्याएँ महान्‌ थीं। एक ओर वे राज्य, राजधानी और सेनादि सबसे विहीन और दूसरी ओर उनके दुर्मद और शक्तिशाली शत्रु। तथापि वे अवसर के अनुकूल साबित हुए और अपने पिता की हार का बदला लेने हैहय तालजंघों एवं उनकी मित्र जातियों को हराने तथा अनेक नए प्रदेशों को जीतने में सफल हुए। उन्होंने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में अश्वमेध यज्ञ भी किया। तन्निमित्त विजयाभियान में नियुक्त उनके साठ हजार पुत्रों की जो कथापरंपराएँ मिलती हैं, उनसे उनकी साठ हजार सेना का तात्पर्य समझा जा सकता है। उनकी विशाल विजयों और महान्‌ यज्ञों का उल्लेख एक पालिजातक (फॉसबाल, रोमनाक्षर संस्करण जिल्द 6, पृष्ठ 203) में भी प्राप्त होता है, जहाँ उन्हें सागरांत पृथ्वी का विजेता, यज्ञस्तंभों का निर्माता एवं यज्ञाग्नियों का प्रज्वालक कहा गया है।

सागर के वंशज भगीरथ के नाम से ही गंगा भागीरथी कहलाई। संभवत: उन्हीं के समय से गंगा की पूजा भी प्रारंभ हुई। कालांतर में कोसल की गद्दी पर बैठनेवाले राजाओं में दिलीप (द्वितीय), रघु और दशरथ प्रसिद्ध हुए। बाल्मीकि ने दशरथ के शासन की भूमि भूरि प्रशंसा की है (रामा., बा. 61-9)। दुर्भाग्यवश उनके अंतिम दिन अयोध्या के राजदरबार में चलनेवाले कलह के कारण दु:ख और चिंता में बीते। कलह का कारण था उत्तराधिकार का प्रश्न, जिस संबंध में स्पष्टत: दो पक्ष थे-एक राम का, दूसरा भरत का। दशरथ स्वयं भी स्पष्ट नहीं थे; कैकेयी तथा उनके पिता केकयराज को दिए हुए वचनों के विपरीत जाकर उन्होंने राम को यौवराज्य देने का निश्चय किया। फलस्वरूप भीतरी कलह बाहर फूट पड़ा और राम को 14 वर्षों के लिये दंडकवास को जाना पड़ा। सौभाग्य से राजदरबारी दल में राम की पक्षप्रबलता तथा प्रजाजनों द्वारा उनके प्रभूत समर्थन को देखकर एवं स्वयं अपने वनवासकाल में उन्हीं की और से उन्होंने शासन किया। राम के दंडकनिवास की सबसे मुख्य घटना उनके द्वारा राक्षसों की पराजय थी। राक्षस जाति का प्रधान केंद्र तो लंका था, परंतु उनके उपद्रव सारे दक्षिणी भारत में व्याप्त थे। फलस्वरूप बानर और रीछ नामक जातियाँ उनकी शत्रु हो गईं। उत्तर भारत से दक्षिण की ओर गए हुए कुछ ऋ षिमुनि भी राक्षसों से त्रस्त थे। राम का स्वाभाविक समर्थन और सहयोग उन्हें प्राप्त हुआ और अंतिम संघर्ष में राक्षसों का राजा रावण ससैन्य मारा गया। उसके भाई विभीषण को राम ने लंका में अपना अधीनस्थ राजा बनाया।

राम के बाद कोसल के इतिहास का चक्रवर्तियुग समाप्त हो गया। एक तो उन्होंने अपने पैतृक राज्य एवं नवविजित प्रदेशों को अपने पुत्रों और भतीजों में बाँट दिया और दूसरी ओर उनके वंशज राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत कमजोर साबित हुए। महाभारतकालीन कोसलराज बृहद्वल महाभारत की लड़ाई में कौरवों की ओर से लड़ता हुआ अभिमन्यु द्वारा मारा गया। महाजनपदयुग में कोसल के राजाओं ने अपने पार्श्ववर्ती राज्यों से बराबर युद्ध किए जिनका मुख्य उद्देश्य था उत्तर भारत की राजनीतिक अधिसत्ता प्राप्त करना। साम्राज्यनिर्माण की दौड़ में उनके सबसे बड़े सघंर्ष मगध से हुए परंतु अंत में मगध विजयी होकर आगे निकल गया। गौतम बुद्ध के समकालीन कोसलराज महाकोसल और प्रसेनजित्‌ उसके सबसे अंतिम मुख्य शासक हुए। प्रसेनजित्‌ कई दृष्टियों से महान्‌ था, तथापि उसके दिनों में ही कोसल राज्य की अवनति के लक्षण दिखाई देने लगे थे। उसके पुत्र विडूडभ के द्वारा शाक्यों के नरसंहार के कारण सभी बौद्ध अप्रसन्न हो गए और उसकी राज्यशक्ति क्रमश: क्षीण होने लगी। थोड़े ही दिनों बाद समय की बढ़ती हुई साम्राज्यशक्ति ने कोसल को आत्मसात्‌ कर लिया और उसकी स्वतंत्र सत्ता जाती रही। कोसल इसके पश्चात्‌ साम्राज्यों का ही अधीनस्थ रहा-नदी, मौर्यों, शुंगो, गुप्तों, हर्ष, प्रतीहारों, गहड़वालों, पठानों, मुगलों आदि का। उसे अवध के नाम से फिर विशेष प्रतिष्ठा नवाब-वजीरों ने दी।


टीका टिप्पणी और संदर्भ