खानाबदोश

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लेख सूचना
खानाबदोश
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3
पृष्ठ संख्या 315
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पांडेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1976 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक कपाशंकर माथुर

खानाबदोश मानवसमाज का वह समुदाय जो अपने रहने का स्थान बराबर बदलता रहता है। साधारणत: खानाबदोश कबीलों और जातियों का अपना क्षेत्र होता है जिसमें वे आवश्यकतानुसार घूमते फिरते रहते हैं। आम तौर से उनका स्थानपरिवर्तन खाद्य की उपलब्घि पर निर्भर करता है। शिकारी खानाबदोश आखेट की खोज में निरंतर घूमते रहते हैं, परंतु पशुपालक खानाबदोश मौसम के अनुसार अपने पशुदलों को लेकर घास और चरागाह की खोज में घूमते रहते हैं।

उद्विकासवादी मानव वैज्ञानिकों का विचार है कि अपनी प्रारंभिक सांस्कृतिक अवस्था में मनुष्य खानाबदोश रहा होगा। यह दशा आखेट युग और पशुपालन युग तक रही होगी। कृषि की जानकारी के साथ मनुष्य ने स्थायी जीवन सीखा। कुछ कबीले जो अभी भी शिकारी या पशुपालक हैं, खानाबदोश जीवन व्यतीत करते हैं।

शिकारी खानाबदोश का सामाजिक जीवन अधिकतर छोटे छोटे पारिवारिक समूहों में संगठित होता है। इसका कारण स्पष्टत: यह है कि जंगलों में इतना शिकार या कंद-मूल-फल नहीं मिल सकता कि बड़े समुदाय का भरण पोषण हो सके। सरगुजा (मध्य प्रदेश) के पहाड़ी कोरवा, 25-30 व्यक्तियों के छोटे छोटे समुदायों में रहते हैं और ऐसा प्रत्येक समुदाय पाँच छह वर्गमील जंगल पर अधिकार किए रहता है। कोचीन के कादार, लंका के बेद्दा, उत्तरी ध्रुव के एस्कीमो, मध्य आस्ट्रेलिया के अरूंटा, अफ्रीका के बुशमैन और ब्राजील के जंगली आदिवासी सभी छोटे छोटे दलों में संगठित हैं।

पशुपालक खानाबदोश दल का आकार बहुत बड़ा होता है। अरब के बद्दू, मध्य एशिया के खिरगिज और मंगोल, उत्तरी अमेरिका के एलगोफिन, अफ्रीका के नुरम और मसाई, ये सभी खानाबदोश सैकड़ों की संख्या में दल बनाकर रहते और घूमते हैं। ये अपने पालतू पशु ऊँट, खच्चर, घोड़ा, गाय-बैल या भैंसे लिए चरागाह और पानी की तलाश में घूमते है और किसी भी स्थान पर एक मौसम से अधिक नहीं टिकते। इनका जीवन सब प्रकार से इस मौसमी परिवर्तन के अनुकूल हो जाता है। पशु इनका मुख्य धन है। पशुओं की देखभाल पुरूष करते हैं, स्त्रियाँ गृह कार्य संभालती और बागवानी करती हैं। ऐसे समुदायों में स्त्रियों का स्थान नीचा समझा जाता है। शिकारी खानाबदोशों की भाँति ही इनका राजनीतिक जीवन गणतांत्रिक होता है, परंतु उनमें बड़े बूढ़ों को विशेष मान्यता प्राप्त होती है।

भारत में अनेक खानाबदोश कबीले और जातियाँ हैं। इनमें से कई अपराधोपजीवी हैं जो चोरी और ठगी जैसे अपराधों द्वारा जीवनयापन करते रहे हैं। आसानी से धन प्राप्त करने के अवसर की खोज में और पुलिस के भय से ये लोग खानाबदोश रहे हैं। ऐसी जातियों में मुख्य हबूड़ा, कंजर, भाँट, संसिया, नट, बागड़ी यनादि, कालबेलिया आदि हैं। कुछ अन्य जातियाँ है, जो पशुपालक है या दस्तकारी का काम करती हैं, जैसे उत्तरी-पश्चिमी भारत में गूजर, या राजस्थान में गाडूड़िया लोहार।

अनेक पशुपालक खानाबदोशों ने दुर्दम सैनिक संगठन बनाए हैं। इतिहासप्रसिद्ध मंगोल, गोल्डेन होर्ड, मंचू और तुर्क खानाबदोश ही थे जिन्होंने मध्ययुग में एशिया और यूरोप में विस्तृत साम्राज्यों की स्थापना की। अफ्रीका के जूलू और मसाई भी इसके उदाहरण हैं।[१]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. द्र. जिप्सी