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	<title>अबाध व्यापार - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj २७ मई २०१८ को ०८:३२ बजे</title>
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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		<title>Bharatkhoj: '{{लेख सूचना |पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1 |पृष्ठ स...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2016-12-28T09:48:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;{{लेख सूचना |पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1 |पृष्ठ स...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{लेख सूचना&lt;br /&gt;
|पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1&lt;br /&gt;
|पृष्ठ संख्या=165&lt;br /&gt;
|भाषा= हिन्दी देवनागरी&lt;br /&gt;
|लेखक =&lt;br /&gt;
|संपादक=सुधाकर पाण्डेय&lt;br /&gt;
|आलोचक=&lt;br /&gt;
|अनुवादक=&lt;br /&gt;
|प्रकाशक=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|मुद्रक=नागरी मुद्रण वाराणसी&lt;br /&gt;
|संस्करण=सन्‌ 1964 ईसवी&lt;br /&gt;
|स्रोत=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=भारतडिस्कवरी पुस्तकालय&lt;br /&gt;
|कॉपीराइट सूचना=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|टिप्पणी=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लेख सम्पादक&lt;br /&gt;
|पाठ 1= श्री दयाशकंर दुबे&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन सूचना=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अबाध व्यापार''' (फ्री ट्रेड) इसका सरल अर्थ है किसी देश के अंदर या किन्हीं दो देशों के बीच बिना किसी बाधा के या बेरोक टोक वस्तुओं का क्रय विक्रय। अबाध व्यापार की इस नीति में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रखा जाता। इसलिए न तो विदेशी वस्तुओं के आयात पर विशेष कर लगाए जाते हैं और न स्वेदशी उद्योग को कोई विशेष सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि अबाध व्यापार के अंतर्गत वस्तुओं पर किसी प्रकार के कर ही नहीं लगाए जाते, किंतु जो भी कर लगाए जाते हैं वे केवल सरकारी आए के लिए ही होते हैं, किसी उद्योग को संरक्षण देने के लिए नहीं। जब किसी विशेष लाभ हेतु कोई दो राष्ट्र परस्पर व्यापार करना प्रारंभ करते हैं तो उसके स्वतंत्र व्यापारिक आदान प्रदान में किसी प्रकार हस्तक्षेप उनको इस लाभ से वंचित कर देता है। व्यापार में वस्तुओं का अदल बदल होता है और इस अदल बदल में क्रेता तथा विक्रेता दोनों को लाभ होता है। जैसे-जैसे व्यापार की मात्रा बढ़ती जाती है वैसे लाभ भी बढ़ता जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देशी व्यापार में सबसे बड़ी बाधा यातायात की असुविधा है। पहाड़ी क्षेत्रों में, सड़कों के अभाव से और ग्रामीण क्षेत्रों में पक्की सड़कें बहुत कम होने के कारण व्यापार बहुत नहीं बढ़ पाता। यह बाधा सरकार के प्रयत्नों द्वारा ही दूर होती है तथा संसार का प्रत्येक देश अपने देशी व्यापार को बढ़ाने के लिए उचित सड़कों का प्रबंध करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदेशी व्यापार अधिकांश में समुद्री जहाजों द्वारा ही होता है। बड़े बड़े जहाजों को चलाने में जब से भाप के इंजनों का उपयोग होने लगा है, जहाज द्वारा माल ले जाने का खर्च पहले से बहुत कम हो गया है। इससे संसार के भिन्न-भिन्न देशों के विदेशी व्यापार में बहुत वृद्धि हुई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदेशी व्यापार में प्राय: उन्हीं वस्तुओं का आयात किया जाता है जो अन्य देशों में सस्ती तैयार की जाती हैं और उनसे आयात के व्यापारियों के अतिरिक्त उन वस्तुओं के उपभोक्ताओं को भी लाभ होता है विदेशी व्यापार में प्राय: वे ही वस्तुएँ निर्यात की जाती हैं जो दूसरे देशों की तुलना में सस्ती तैयार होती हैं। इससे निर्यात के व्यापारियों के साथ ही साथ उन वस्तुओं के विदेशी उपभोक्ताओं को भी लाभ होता है। अबाध व्यापार में वस्तुओं के उत्पादकों में पारस्परिक प्रतियोगिता अधिक होने के कारण देशों के उद्योगों में किसी प्रकार की शिथिलता नहीं आ पाती और वे अधिक से अधिक वस्तुओं का उत्पादन करने का प्रयत्न करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अबाध व्यापार से अंतरराष्ट्रीय व्यवहार में तनाव की संभावना कम होती है तथा प्रत्येक देश अपनी वस्तुओं का विक्रय दूसरे देशों में करके अधिक से अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अबाध व्यापार की एक विशेषता यह है कि इसमें अंतरराष्ट्रीय श्रम-विभाजन में कठिनाइयाँ उपस्थित नहीं होने पातीं। किसी देश के लोग अपने लाभ के लिए उस उद्योग में लगते हैं जिसमें उन्हें अपने पड़ोसियों की अपेक्षा अधिक सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। अबाध व्यापार की नीति हर देश को उन उद्योगों को विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करती है जाए उसके लिए अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अबाध व्यापार से कतिपय हानियाँ भी होती हैं। जो वस्तुएँ अन्य देशों से सस्ते मूल्य पर आती हैं उन वस्तुओं के उत्पादकों को देश के अंदर भारी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है और यदि वे अपना लागत खर्च कम करके उतने ही सस्ते मूल्य पर वैसी वस्तुएँ देश के अंदर तैेयार नहीं कर पाते तो उन वस्तुओं के कारखानों को बंद कर देना पड़ता है। इससे देश के कुछ उद्योग धंधों को बहुत हानि होती है और साथ ही बेरोजगारी भी बढ़ती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अबाध व्यापार से दूसरी बड़ी हानि यह होती है कि उन नए उद्योग-धंधों को, जो किसी देश में आरंभ किए जाते हैं, चलाने का अवसर ही नहीं मिल पाता। आरंभिक अवस्था में उनका लागत खर्च आधिक होता है और वे अपने कारखानों में उतनी सस्ती लागत पर वस्तुएँ तैयार नहीं कर पाते जितने लागत खर्च पर दूसरे देशों में पहले से स्थापित बड़े बड़े कारखाने तैयार कर लेते हैं। इन नवीन उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि देश की सरकार उन वस्तुओं के आयात पर ऐसा भारी कर लगा दे जिससे वे नए उद्योग द्वारा बनी वस्तुओं से प्रतियोगिता न कर सकें। नए उद्योग धंधों को संरक्षण द्वारा सरकार को सहायता देना आवश्यक हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो देश औद्योगिक विकास में अन्य देशों से आगे रहता है वह अबाध व्यापार में अपने यहाँ से तैयार माल अधिक मात्रा में दूसरे देशों में भेजने का प्रयत्न करता है। परिणामत: औद्योगिक विकास में पिछड़े हुए देशों को जीवनरक्षक पदार्थ देकर विलासिता के या दिखावटी सस्ते पदार्थ बदले में लेने पड़ते हैं। इससे उनका विदेशी व्यापार बढ़ने पर उनको स्थायी लाभ नहीं हो पाता। इस प्रकार की हानि से बचने के लिए पिछड़े हुए देश अपने उद्योग धंधों के संरक्षण के लिए आयातों पर भारी कर लगाते हैं और ऐसी वस्तुओं के आयात का नियंत्रण करते हैं जो हानिकारक होती है; जैसे, मादक पदार्थ तथा अन्य विलासिता की दिखावटी वस्तुएँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अबाध व्यापार का आरंभ सर्वप्रथम इंग्लैंड में हुआ। 19वीं शताब्दी के आरंभ में इंग्लैंड में खाद्य पदार्थ, जैसे - गेहूँ, जौ, मक्खन, अंडा, जई तथा रेशमी और ऊनी वस्तुओं के आयात पर भारी कर लगाए गए थे। इन करों के कारण वस्तुओं की कीमतें बहुत बढ़ गई थीं और इससे इंग्लैंड की जनता को बड़ी हानि होती थी। इंग्लैंड के कुछ अर्थशास्त्रियों ने और संसद के सदस्यों ने खाद्य पदार्थों पर से कर हटाने का आंदोलन आरंभ किया। सन्‌ 1839 में राष्ट्रीय अन्नकर विरोध संघ (ऐंटी कार्न ला लीग) की स्थापना हुई। इस संघ को अपने कार्य में संघर्ष का सामना करना पड़ा। इंग्लैंड की पार्लियामेंट में कई बार इस प्रश्न पर विचार हुआ। अंत में सन्‌ 1846 में पील महोदय का अन्नकर हटने का प्रस्ताव लोक सभा (हाउस ऑव कामन्स) में स्वीकृत हुआ और लार्ड सभा ने भी उसे बहुमत से स्वीकार कर लिया। इस प्रकार अन्न पर से आयात कर हटा दिया गया। अपने कार्य में सफलता प्राप्त कर लेने पर राष्ट्रीय अन्नकर विरोधी संघ भंग कर दिया गया। धीरे-धीरे अन्य वस्तुओं के आयात कर भी हटा दिए गाए और 1860 तक इंग्लैंड में अबाध व्यापार पूर्ण रूप से जारी हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसी समय इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति हो रही थी। 19वीं सदी ओर आरंभ में इंग्लैंड की अधिकांश जनता ग्रामों में ही निवास करती थी और खेती के साथ साथ घरेलू उद्योग धंधे भी उन्नत दशा में थे। इंग्लैंड वासियों ने संसार में भिन्न-भिन्न भागों में उपनिवेश बसाकर या राज्य स्थापित कर ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना कर ली और इन देशों से अपना व्यापार भी खूब बढ़ाया था। देश में साहसी पुरुषों और पूँजी की कमी नहीं थी। इसी समय कुछ ऐसी मशीनों का आविष्कार किया गया जाए भाप की सहायता से चलाई जाती थीं और जिनके द्वारा कपड़े तैयार करने का खर्च बहुत कम होता था। बड़े बड़े कारखाने खुले और हुए नए नगरों का निर्माण हुआ तथा पुराने नगरों की बढ़ती हुई। लोले और कोयले के उद्योग को भी बहुत प्रोत्साहन मिला। बड़े बड़े जहाजों का निर्माण होने लगा। उनके चलाने में भाप का उपयोग होने से उनकी गति भी बढ़ गई और सामान ले जाने का खर्च कम हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बड़े-बड़े कारखानों में वस्तुओं की उत्पत्ति बड़ी मात्रा में होने लगी। इन कारखानों को चलाने के लिए कच्चे माल की अधिक परिमाण में आवश्यकता थी। अबाध व्यापार की नीति के कारण इंग्लैंड को अन्य देशों से कच्चा माल सस्ते दामों पर प्राप्त करने की बड़ी सुविधा मिली। तैयार माल को बाहर दूसरे देशों में सस्ते मूल्य पर भेजने में भी अवधि व्यापार की नीति से इंग्लैंड के व्यापारियों को बहुत प्रोत्साहन मिला। इसका परिणाम यह हुआ कि इंग्लैंड का विदेशी व्यापार खूब बढ़ा और 19वीं सदी के अंत तक संसार के सब देशों के संपूर्ण विदेशी व्यापार का चौथाई भाग इंग्लैंड तक संसार के सब देशों के संपूर्ण विदेशी व्यापार का चौथाई भाग इंग्लैंड निवासियों के हाथ में आ गया। औद्योगिक क्रांति और अबाध व्यापार की नीति के कारण इंग्लैंड की खूब आर्थिक उन्नति हुई और संसार के राष्ट्रों में उसका प्रथम स्थान हो गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अंग्रेजी शासन के पूर्व भारत के घरेलू उद्योग धंधे खूब उन्नत दशा में थे। भारतवासी अपने घरेलू उद्योग धंधों द्वारा सुदंर वस्तुओं का निर्माण कर अन्य देशों से खूब व्यापार करते थे। भारत की मलमल संसार के सब देशों में प्रसिद्ध थी। उत्साही अंग्रेजी के दिलों में भारत के साथ सीधा व्यापार करने की लालसा जाग्रत हुई। धीरे-धीरे इसी उद्देश्य से ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई। अंग्रजों ने शनै:-शनै: अपने पैर भारतवर्ष में मजबूत किए तथा यहाँ अपना राज्य स्थापित किया। औद्योगिक क्रांति के कारण इंग्लैंड में बड़े बड़े कारखाने स्थापित हुए और इन कारखानों के लिए अधिक परिमाण में कच्चा माल प्राप्त करने और तैयार माल को आसानी से बेचने की आवश्यकता हुई। इस कार्य में अबाध व्यापार नीति से इंग्लैंड को बहुत लाभ हो रहा था। इसलिए अंग्रेजों ने उसी नीति का पालन भारत में भी किया। इस नीति का परिणाम भारत में यह हुआ कि इंग्लैंड के कारखानों में बने हुए सस्ते तैयार माल भारत में बिना किसी रोक टोक के बड़े परिमाणों में आने लग। इंग्लैंड से सस्ते सूती कपड़ों के आयात में खूब वृद्धि हुई और भारत के जुलाहों को इस प्रतियोगिता का सामना करना पड़ा। वे उतनी कम कीमत पर कपड़ा तैयार करने में असमर्थ रहे और इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में करोड़ों जुलाहों को अपना काम बंद करके खेती की शरण लेनी पड़ी। भारत का सूती कपड़ों का प्रधान घरेलू उद्योग चौपट हो गया और करोड़ों कारीगरों को भूख और बेकारी का शिकार होना पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस अबाध व्यापार की नीति का दूसरा परिणाम यह हुआ कि भारत के कच्चा माल, विशेषकर रुई, तिलहन और अनाज अधिक परिमाण में अन्य देशों को जाने लगा। इससे देश में अनाज की कमी होने लगी और अच्छी फसल के दिनों में भी केवल आधा पेट भोजन पानेवालों की संख्या करोड़ों तक पहुँच गई। जिस वर्ष फसल खराब होती थी उस वर्ष तो दशा और भी खराब हो जाती थी। इन्हीं दिनों देश में कई अकाल पड़े।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस अबाध व्यापार की नीति का तीसरा परिणाम यह हुआ कि भारत में नए उद्योग नहीं पनपने पाए। भारत में सूती कपड़े के कुछ कारखाने अवश्य स्थापित हुए परंतु उनको इंग्लैंड के कारखानों की प्रतियोगिता का सामना करना पड़ा और उनकी विशेष उन्नति न हो सकी। अबाध व्यापार की नीति के अनुसार भारत सरकार ने भारत में बने सूती कपड़ों के उत्पादन पर कर लगा दिया, इसके कारण भी इस उद्योग की उन्नति में रुकावट हुई। जिस अबाध व्यापारनीति के कारण इंग्लैंड की बहुत आर्थिक उन्नति हुई उसी नीति के कारण भारत के उद्योग धंधें चौपट हो गए और भारतवासी अधिक गरीब हो गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतवासियों ने अबाध व्यापारनीति की हानियों का अनुभव किया और भारतीय नेताओं ने इस नीति को बदलने के लिए भारी आंदोलन किया। सन्‌ 1920 में भारत सरकार द्वारा एक आर्थिक कमीशन नियुक्त हुआ जिसने भारत में देशी उद्योगों के लिए संरक्षण नीति स्वीकार करने की सिफारिश की। इस कमीशन की सिफारिशों के अनुसार भारत सरकार को अपनी अबाध व्यापार की नीति बदलनी पड़ी और सन्‌ 1920 के बाद से भारत में अबाध व्यापार की नीति का पालन नहीं हो रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इंग्लैंड में भी आजकल अबाध व्यापार नीति का पालन नहीं हो रहा है। ब्रिटिश साम्राज्य के देशों ने अनुभव किया कि इंग्लैंड की इस नीति से उनको भी हानियाँ होती हैं, इसीलिए उन्होंने इंग्लैंड को अपनी यह नीति बदलने के लिए राजी कर लिया। अब इंग्लैंड में साम्राज्यांतर्गत रियायत की नीति का पालन किया जाता है। इस नीति के अनुसार जो माल इंग्लैंड में ब्रिटिश साम्राज्य के देशों से आता है उनपर आयात कर कम दर से लिया जाता है और अन्य देशों से उन्हीं वस्तुओं के आयात पर कर की दर अधिक रहती है। इसी प्रकार साम्राज्य के अन्य देश इंग्लैंड की वस्तुओं पर कर की दर कम रखते हैं। अबाध व्यापार की हानियों का अनुभव कर आजकल संसार का कोई भी देश इस नीति का पालन नहीं कर रहा है। यदि संसार के सब देश आर्थिक दृष्टि से विकसित दशा में हों और जब सब देश इस नीति का पालन करना स्वीकार कर लें तब संसार के सब देशों को इस अबाध व्यापारनीति से बहुत लाभ हो सकता है। आज कल तो संसार के कई देशों में विदेशी व्यापार पर बहुत अधिक नियंत्रण है। भारत विदेशी विनियम की बचत करने के लिए अपने आयातों का कठोरतापूर्वक नियंत्रण कर रहा है। उसने अपने उद्योग धंधों को प्रोत्साहित करने के लिए बहुत सी वस्तुओं के आयात पर सरंक्षण कर लगा दिया है। अमेरिका का व्यापार चीन से हो ही नहीं रहा है। संसार में बड़े बड़े देशों के दो गुट हो गए हैं। एक गुट के देशों का व्यापार अन्य गुट के देशों के साथ नियंत्रित रूप से ही हो पाता है। नियंत्रणों और संरक्षण करों के कारण संसार के राष्ट्रों का विदेशी व्यापार जितना होना चाहिए उतना नहीं हो पाता, इसलिए प्राय: सब देश विदेशी व्यापार से पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं अभी कुछ वर्ष हुए एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन की स्थापना हुई है। इसमें 50 से अधिक राष्ट्र सम्मिलित हुए हैं। इस संगठन का उद्देश्य जनता के रहन सहन का स्तर ऊँचा करना तथा व्यपारिक प्रतिबंधों को यथासाध्य कम कर संसार को समृद्ध बनाना है। इस संगठन के सदस्य अपने - अपने देशों में व्यापारिक प्रतिबंधों को कम करने का प्रयत्न करते हैं और अपने पारस्परिक झगड़े संगठन के सामने उपस्थित कर उसके निर्णय स्वीकार करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब यह संगठन विश्वव्यापी हो जाएगा, संसार के सब राष्ट्र इसके सदस्य हो जाएँगे और जब इस संगठन के उद्देश्यानुसार सब व्यापारिक प्रतिबंध हट जाएँगे तब संसार में अबाध व्यापार की नीति का पालन होने लगेगा और उसके द्वारा व्यापार का लाभ सब देशों को समान रूप से होने लगेगा और किसी राष्ट्र को उसके द्वारा हानि नहीं पहुँचेगी।&amp;lt;ref&amp;gt;सं.ग्रं. - कृष्णादत्त वाजयेयी: भारतीय व्यापार का इतिहास।&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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