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	<title>आलिवर क्रॉमवेल - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj २४ जून २०१८ को ०७:०६ बजे</title>
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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		<title>Bharatkhoj: '{{लेख सूचना |पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3 |पृष्ठ स...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2017-02-04T12:05:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;{{लेख सूचना |पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3 |पृष्ठ स...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{लेख सूचना&lt;br /&gt;
|पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3&lt;br /&gt;
|पृष्ठ संख्या=200&lt;br /&gt;
|भाषा= हिन्दी देवनागरी&lt;br /&gt;
|लेखक =&lt;br /&gt;
|संपादक=सुधाकर पांडेय&lt;br /&gt;
|आलोचक=&lt;br /&gt;
|अनुवादक=&lt;br /&gt;
|प्रकाशक=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|मुद्रक=नागरी मुद्रण वाराणसी&lt;br /&gt;
|संस्करण=सन्‌ 1976 ईसवी&lt;br /&gt;
|स्रोत=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=भारतडिस्कवरी पुस्तकालय&lt;br /&gt;
|कॉपीराइट सूचना=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|टिप्पणी=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लेख सम्पादक&lt;br /&gt;
|पाठ 1=गिरजा शंकर मिश्र&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन सूचना=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आलिवर क्रॉमवेल''' (1599-1652 ई.) इंग्लैंड, स्काटलैंड तथा आयरलैंड के कामनवेल्थ के प्रधान संरक्षक। इनका जन्म 25 अप्रैल, 1599 ई. को हंटिंगडन में हुआ था। वे राबर्ट क्रामवेल तथा एलिजाबेथ स्टेवर्ड के द्वितीय पुत्र और हेनरी अष्टम के प्रमुख सलाहाकार के वंशज थे। हटिंगडन के स्कूल में उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। वहाँ डाक्टर वियर्ड के प्रभाव में उनकी धार्मिक जीवन की ओर अभिरुचि जागृत हुई, जो जीवन पर्यंत बनी रही। 1616 ई. में कैंब्रिज के सिडनी ससेक्स कालेज में प्रवेश किया और तदनंतर लिंकन के विद्यापीठ से विधिस्नातक हुए। वे अथक शक्ति, लौह दृढ़ता, व्यावहारिक मातित्व तथा घोर धार्मिक निष्ठा के व्यक्ति थे। साथ ही उनमें कठोरता, बर्बरता तथा निर्दयता भी अधिक मात्रा में थी। ऐसेे कम ही व्यक्ति होंगे जिनमें उसके समान स्नेह और सम्मान तथा भय और घृणा का अर्पूव संमिश्रण हो। उनका चरित्र कट्टर प्यूरिटनवादिता तथा रणदक्षता का विरोधाभास प्रस्तुत करता है। जीवन पर्यंत उन्होंने अपने प्यूरिटन मत के कट्टर अनुयायी होने का परिचय दिया। उनका प्रारंभिक जीवन प्यूरिटन मत से अनुप्रेरित ग्रामीण रईस का था। उनका सार्वजनिक स्वरूप सर्वप्रथम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसदीय अधिकारों ने प्रवक्ता के रूप में प्रकट हुआ, यद्यपि कालांतर में वे संसद् से सतत संघर्ष करता रहे। 1628 ई. में वह हंटिंगडन से संसद् का सदस्य निर्वाचित हुए, किंतु इसके विघटन के उपरांत वह जनदृष्टि से ओझल हो गये। पश्चात्‌ 1639-40 ई. की सूक्ष्म और दीर्ध संसद् में वह कैंब्रिज से सदस्य होकर आए। वे धाराप्रवाह वक्ता नहीं थे, फिर भी उनके उद्देश्य की तत्परता ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गृहयुद्ध के समय क्रामवेल को विशेष ख्याति प्राप्त हुई। गृहयुद्ध छिड़ने पर उन्होंने संसदीय दल को उदार सहायता दी तथा ईस्टर्न असोसिएशन की रचना में सहायक बने। वे कप्तानों की सेना में सम्मिलित हुए, अपने प्रदेश में एक सेना तैयार की तथा उसे स्वयं शिक्षा दी। यह सेना इतनी तत्पर सिद्ध हुई कि सारी संसदीय सेना इसी नमूने पर तैयार होकर, फ़ेयर फ़ाक्स के नेतृव्त में न्यू माडेल आर्मी के नाम से विख्यात हुई। क्रामवेल ने पहले एसेक्ल के तत्वावधान में काम किया तथा एजहिल के (1642) घुड़सवार सेना के सुचारू संचालन ने उनकेे उत्कर्ष का मार्ग सरल कर दिया। उन्हें लेफ्टिनेंट जनरल की उपाधि मिली (1643) मार्स्टन मूर (1644) की विजय उनकी सैनिक दक्षता का प्रमाण है। निज निग्रह कानून पास कराके उन्होंने सेना को और भी अनुशासित कर दिया। 1645 के जेस्वी के युद्ध में घुड़सवार सेनानी के रूप में क्रामवेल की ख्याति बढ़ी। इसके उपरांत वे राजनीति मंच पर चार्ल्स प्रथम के विरूद्ध संघर्ष में नेता के रूप में आए। सेना की ओर से उन्होंने राजा से वार्ता भी की किंतु इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि राजा का निष्कासन तथा वध अनिवार्य है। द्वितीय गृहयुद्ध के श्रीगणेश तथा प्रेस्टन पर स्काट की हार (1648) ने चार्ल्स को फाँसी की ओर द्रुतगति से बढ़ाया (1648)। उस समय मार्च, 1649 में क्रामवेल आयरलैंड के एक कमांड पर राज्यदलीय विद्रोह को दबाने के लिये नियुक्त किए गए। ड्रोमेडा तथा हेक्सफोर्ड की विजयों ने आइरिशों का दमन किया। स्काटलैंड में क्रामवेल ने वीरेस्टरों के विरोध को दबाया जिससे राजा तथा प्रेसबीटरों के कुचक्र समाप्त हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘रंप’ पार्लियामेंट ने इंग्लैड को कामनवेल्थ घोषित किया तथा 45 सदस्यों की एक कौंसिल ऑव स्टेट नियुक्त की जिसमें सेना का जनरल कप्तान होने के नाते क्रामवेल भी एक सदस्य बने। 20 अप्रैल, 1653 ई. को क्रामवेल ने रंप को विघटित कर दिया। उत्तराधिकारप्राप्त बेयरबोन पार्लियामेंट का भी यही भाग्य रहा। दिसंबर, 1653 ई. में इंस्ट्र मेंट ऑव गवर्नमेंट के अंतर्गत क्रामवेल लार्ड प्रोटेक्‌टर बने और क्रामवेल कौंसिल की सहायता से आर्डिनेंस अधिनियम के कुशल उपयोग के द्वारा एक दक्ष प्रशासक सिद्व हुए। उन्होंने इंग्लैंड, स्काटलैंड तथा आयरलैंड की संसदीय एकता स्थापित की; इंग्लिश पादरियों को नियंत्रित किया; वैधानिक सुधार किए। कोर्ट ऑव चांसरी पुन: संगठित की गई। उन्होंने नैतिक सुधार की एक योजना प्रस्तावित कर वैयक्तिक अधिकारों को भी नियंत्रित किया। रूढ़िवादियों को छोड़ सभी के साथ धार्मिक सहिष्णता की नीति बरती। 1655 ई. में उन्होंने मेजर जनरलों के तत्वावधान में शासन चलाने की चेष्टा की जो बहुत अप्रिय सिद्व हुआ। उनका गृहशासन सैनिक निरंकुशता पर आधारित था जिसने कामनवेल्थ की प्रतिष्ठा को धक्का पहुँचाया। 1657 ई. में द्वितीय प्रोटेक्टरेट संसद् ने एक नया विधान ‘हंबुल पेटीशन ऐंड ऐडवाइस’ नाम से प्रस्तुत किया जिसमें क्रामवेल को राजा की पदवी तथा दो सदनों की संसद् प्रस्तावित की गई थी। किंतु क्रामवेल ने राजा की पदवी लेना स्वीकार नहीं किया; अन्य धाराएँ उन्होंने मान लीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रामवेल की वैदेशिक नीति के दो प्रधान लक्ष्य थे। प्रथम इग्लैंड की व्यापारिक एवं नाविक उच्चता स्थापित करना दूसरी मध्य यूरोप के प्रोटेस्टेंटों के हितों की रक्षा। प्रथम लक्ष्य की सिद्धि के लिये उन्होंने डच युद्ध में सफलता प्राप्त की तथा 1654 ई. में डचों से एक संधि की। उन्होंने डेन्मार्क, स्वीडन तथा पुर्तगाल से मैत्रीपूर्ण संधियाँ कीं जिनसे इंग्लैड के व्यापारिक स्वार्थो की रक्षा हुई। उन्होंने इंग्लैंड की जलसेना का भी विकास किया और औपनिवेश्कि साम्राज्य की वृद्धि की। दूसरे लक्ष्य की सिद्धि के लिये यूरोप में एक प्रोटेस्टेंट गुट की रचना का प्रयास किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किंतु शक्तियों के पारस्परिक वैमनस्य के कारण वह असफल रहे। स्पेन के विरूद्ध फ्रांस से मैत्री की जिसके फलस्वरूप स्पेन से घोर औपनिवेशिक युद्ध हुए। एक सैनिक टुकड़ी वेस्ट इंडीज भेजी गई जिसने जमाइका पर अधिकार किया (1655)। स्थलविजयों ने डनकर्क को इंग्लैंड में मिला लिया था। स्पेन के विरूद्ध फ्रांस की सहायता करके वह लुई चतुर्दश के उत्कर्ष के लिये उत्तरदायी बने। साथ ही उन्होंने इंग्लैंड की महानता का भी बीजारोपण किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रामवेल के जीवन के अंतिम दिन वध के भय से आक्रांत रहे। 3 सितंबर,1658 ई. की उनकी मृत्यु हुई। उसके छह पुत्रों में से रिचार्ड उनका उत्तराधिकारी प्रोटेक्टर नियुक्त हुआ किंतु अयोग्य सिद्ध होने के कारण 1660 ई. प्रोटेक्टरेट व्यवस्था समाप्त कर दी गई।&amp;lt;ref&amp;gt;सं. ग्र -ए. जी. गार्डिनर : हिस्ट्री ऑव कामनवेल्थ ऐंड प्रोटेक्टरेट, 1899; एस. आर. र्गिडनर: हिस्ट्री ऑव दि ग्रेट सिविल वार 1642-48; सी. एच. फर्थ : ओलिवर क्रामवेल (1923); सी. वी. वेजउड :ओलिवर क्रामवेल (1939); जे. बचन : ओलिवर क्रामवेल (1934); एम. ऐशले : लाइफ ऑव क्रामवे (1940)।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी_विश्वकोश]][[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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