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	<title>ओगुस्तस - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj २० जुलाई २०१८ को ०७:४३ बजे</title>
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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		<title>Bharatkhoj: '{{लेख सूचना |पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 2 |पृष्ठ स...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2017-04-23T12:32:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;{{लेख सूचना |पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 2 |पृष्ठ स...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{लेख सूचना&lt;br /&gt;
|पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 2&lt;br /&gt;
|पृष्ठ संख्या=292&lt;br /&gt;
|भाषा= हिन्दी देवनागरी&lt;br /&gt;
|लेखक =&lt;br /&gt;
|संपादक=सुधाकर पाण्डेय &lt;br /&gt;
|आलोचक=&lt;br /&gt;
|अनुवादक=&lt;br /&gt;
|प्रकाशक=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|मुद्रक=नागरी मुद्रण वाराणसी&lt;br /&gt;
|संस्करण=सन्‌ 1964 ईसवी&lt;br /&gt;
|स्रोत=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=भारतडिस्कवरी पुस्तकालय&lt;br /&gt;
|कॉपीराइट सूचना=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|टिप्पणी=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लेख सम्पादक&lt;br /&gt;
|पाठ 1=भगवतशरण उपाध्याय&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=मोतीचंद्र&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन सूचना=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''ओगुस्तस''' (63 ई.पू.-14 ई.) रोम का पहला सम्राट् ईसा का समकालीन, जिसका पूरा नाम गाइयस जूलियस सीज़र ओक्ताविआनस्‌ (मूल रूप में गाइयस ओक्ताविआनस) था। रोम के सम्राटों में सबसे महान जिसने समकालीन रक्तंजित रोमन राजनीति को शांति और स्थायित्व प्रदान किया और उस इतिहासप्रसिद्ध युग की प्रतिष्ठा की जो उसके नाम से विख्यात है। जिस प्रकार ग्रीक इतिहास में पेरिक्लीज़ का युग, भारत के इतिहास में गुप्त सम्राटों का युग और इंग्लैंड के इतिहास में ऐलिज़ाबेथ का युग अपनी राजनीति, साहित्य, ललित कलाओं आदि के उत्कर्ष के लिए विख्यात है, उसी प्रकार रोमन इतिहास में इस सम्राट का राज्यकाल राजनीति, साहित्य, ललित कलाओं आदि के क्षेत्र में उत्कर्ष की चोटी छूकर विख्यात हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओगुस्तस 23 सितंबर, 63 ई.पू. के दिन रोम में पैदा हुआ। उसका पिता गाइयस ओक्तावियस और माता प्रसिद्ध जूलियस सीज़र की भगिनी जूलिया की कन्या अतिया थी। उसे चार वर्ष का छोड़ पिता परलोक सिधारा और माता ने अपने दूसरे पति की सहायता से उसका पालन पोषण किया। जूलियस सीज़र ने उसे अपना वारिस घोषित किया और उपकृत ओक्तावियस ने अपने नाम के साथ जूलियस सीज़र का नाम भी जोड़ लिया। 44 ई.पू. के मार्च में जब सीज़र की रोम में हत्या हुई तब ओक्तावियस ग्रीस में अध्ययन कर रहा था और केवल 19 वर्ष का था। हत्या की सूचना पा वह इटली लौटा और ब्रिंदिसी में सीज़र के मित्रों ने उसका स्वागत किया। ओक्तावियस ने तभी सीज़र का नाम अपने नाम के साथ जोड़ लिया और मित्रों के साथ रोम जा पहुँचा। रोम में तब दो दल थे, एक उन प्रजातंत्रीय नेताओं का जिन्होंने सीज़र की हत्या की थी और दूसरा उनके विरोधी सीज़रवादियों का, जिनके नेता मार्क्स आंतोनियस और मार्क्स लेपिदस थे। रोम पहुँच उसने अंतोनियस से सीज़र की दी हुई विरासत ले ली जिससे पहले तो दोनों में कुछ मनमुटाव हुआ फिर कृत्रिम मित्रता का बीजवपन हुआ। वस्तुत: दोनों एक दूसरे के आंतरिक शत्रु थे। अगले वर्ष अंतोनी, लेपिदस और ओक्तावियस की संमिलित अमारत कायम हुई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस अमारत ने सबसे पहले तो प्रजातंत्रिक दल के नेताओं की संपत्ति जब्त कर ली। फिर मार्कस ब्रूतस्‌ और लोंगिनस्‌ द्वारा संचालित उस हलकी सेना को मकदुनियाँ में फ़िलिपी नामक स्थान पर 42 ई.पू. परास्त किया। दो वर्ष बाद ओक्तावियस्‌ ने अंतोनी से अपनी बहन ओक्ताविया का विवाह कर परस्पर की मैत्री संपुष्ट की जो दोनों के एक दूसरे के प्रति भीतरी विरोध से टूटी जा रही थी। कुछ दिनों बाद लेपिदस्‌ के अमारत से हट जाने से रोम की राजनीतिक शक्ति केवल ओक्तावियस्‌ और अंतोनी में ही केंद्रित हो गई। अब दोनों ने रोमन साम्राज्य को बाँट लिया, अंतोनी को उसके पूर्वी भाग, एशिया आदि, मिले और ओक्तावियस्‌ को इटली के साथ पश्चिम के यूरोपीय देश। पर भीतर ही भीतर दोनों में संघर्ष चलता रहा। दोनों की नीति और रुचि में भी वैषम्य था। जहाँ अंतोनी वीर होता हुआ भी व्यसनी और विलासप्रिय था वहाँ ओक्तावियस्‌ कर्मठ और महत्वाकांक्षी था। ईरानी पार्थवों से एशिया में युद्ध करते अंतोनी के प्रवास के समय अक्तावियस्‌ ने धन और नीति से रोमनों के हृदय जीत लिए और अपने अनेक कार्यो से वह लोकप्रिय हो चला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
साथ ही ओक्तावियस्‌ ने अंतोनी के रोमविरोधी और अनैतिक कारनामे रोम में प्रकट कर दिए जिसका परिणाम भी उसके पक्ष में हुआ। उसने मिस्र की रानी से जन्में बेटों को दी हुई उसकी विरासत का भंडाफोड़ कर रोम की जनता में अंतोनी के प्रति असंतोष उत्पन्न कर दिया। पहले से ही ओक्ताविया को तलाक दे मिस्री रानी क्लियोपात्रा से अंतोनी के विवाह कर लेने से कुछ कम असंतोष रोमनों में न था। जनता के इस असंतोष का लाभ उठा ओक्तावियस्‌ ने क्लियोपात्रा के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया और एक बड़ी सेना लेकर स्थल और जल दोनों भागों से मिस्र पर आक्रमण किया। अक्सियम के युद्ध में उसके सेनापति और मिस्र अग्रिप्पा ने अंतोनी को परास्त कर भगा दिया। अंतोनी ने मिस्र की राह ली और ओक्तावियस्‌ ने उसका पीछा किया। अंतोनी और क्लियोपात्रा ने उसके सिकंदरिया पहुँचते ही आत्महत्या कर ली। अब ओक्तावियस्‌ समूचे रोमन साम्राज्य का अकेला स्वामी था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओक्तावियस्‌ ने रोम लौटकर पहले विधान की व्यवस्था की। उसने 31 ई.पू. में कांसुल पद स्वीकार किया जो अगले आठ वर्षो तक प्रति वर्ष उसके पक्ष में घोषित होता रहा। अगले दो वर्ष उसने मिस्र, ग्रीस, सीरिया, लघु एशिया और द्वीपों की राजनीति व्यवस्थित करने के लिए पूर्व में बिताए और रोम लौटकर उसने लगातार तीन दिनों तक विजयोत्वस किया। रोम का भी वैधानिक पुनरुद्धार आवश्यक था, सो उसने पहले तो पिछले गृहयुद्ध के अन्यायों का निराकरण किया फिर सिनेटरों की संख्या 900 से 600 कर दी, धार्मिक क्रियाओं को फिर से प्रतिष्ठा दी, ललित कलाओं और साहित्य को अनी संरक्षा से प्रोत्साहित किया, अनावश्यक सेनाएँ तोड़ दीं, कृषि का विकास किया, देशी उद्योगों को सँभालने में सहायता की, उपनिवेश स्थापित किए, और सबसे महत्व का कार्य, उसने देश में, विशेषत: रोम में, वर्षो से होते आते रक्तपात को बंद कर वहाँ पूर्ण शांति की स्थापना करके, किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
27 ई.पू. की जनवरी में ओक्तावियस्‌ ने राज्य की व्यवस्था सिनेट और रोमन जनता को सौंप दी। उसके बदले उसे स्पेन, गाल, सीरिया और मिस्र का निजी प्रांतों के रूप में लाभ हुआ और उसका कांसुल पद सुरक्षित बना रहा। अब उसने अपनी शालीनता और महिमा बढ़ाने के लिए 'ओगुस्तस' उपाधि धारण की, जिससे वह संसार के इतिहास में विख्यात हुआ। धीरे-धीरे उसने बड़े राजनीतिक चातुर्य से शासन और अधिकार अपने हाथ में लेने शुरू किए। एक के बाद दूसरा अधिकार उसके हाथों में केंद्रित होने लगा और उसने अपना स्थान रोम की राजनीति में कुछ ऐसा बना लिया जैसा उससे पहले किसी शासक को उपलब्ध न था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्हीं दिनों ओगुस्तस ने अफ्रीका और एशिया, गाल और स्पेन में लड़ाइयाँ लड़ीं और अनेक देश जीते। पार्थवों के साथ युद्ध एक अनुकूल संधि द्वारा उसने बंद कर दिया जिससे आर्मेनिया का राज्य उसके हिस्से पड़ा। 9 ई.पू. में निश्चय गाल में उसे कुछ संकट का सामना करना पड़ा, जब जर्मनों ने उसके सेनापति वारस को मारकर उसकी उत्तरवर्ती सेना नष्ट कर दी। पर अंत में उसके उत्तरधिकारी तिबेरियस्‌ ने जर्मनों का पराभव कर उस और से भी उसे निश्चिंत कर दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमन साम्राज्य की सीमाएँ इस प्रकार दूर-दूर तक फैला ओगुस्तस ने अपनी सम्राट्पदीय व्यवस्था प्रसारित की। बड़े परिश्रम से उसने नए कानून की घोषणा की और शांति के सभी कार्यो को अपनी संरक्षा दी। रोम से साम्राज्य के प्रांतों को जानेवाली सड़कें नए सिरे से बनीं और उनपर रक्षा के प्रहरी बैठे, व्यापार के सारे मार्गो का लक्ष्य राजधानी बनी, रोमन नागरिक को नई शक्ति मिली और देश को नई मुद्राप्रणाली का लाभ हुआ। वर्जिल और होरेस जैसे महान्‌ कवियों ने उसी शांति और सुरक्षा के युग में अपने अमर काव्य लिखे। रोम नगर के सौंदर्य में तो इतनी अभिवृद्धि हुई कि लोगों में यह कहावत ही चल पड़ी कि ''नगर को उसने ईटों का पाया था पर छोड़ा उसे संगमरमर का बनाकर''। उपकृत सिनेट ने तब वर्ष के एक मास का नाम बदलकर उसके नाम का अनुवर्ती ओगस्तस रखा जो अब अगस्त कहलाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओगुस्तस ने विवाह तो तीन-तीन किए पर उसके जूलिया नाम की कन्या के सिवा कोई और संतान न हुई। उसने पहले अपनी बहिन के पुत्र मार्सलस को, फिर अपनी कन्या के पुत्रों को बारी-बारी से अपना उत्तराधिकारी बनाया परंतु वे उससे भी पहले मर गए। तब उसने अपनी पत्नी के अन्य पति जनित विपुत्र द्रूसस्‌ को उत्तराधिकारी घोषित किया परंतु वह भी कुछ काल बाद परलोक सिधारा। तत्पश्चात्‌ उसके छोटे भाई तिबेरियस्‌ को उसने मनोनीत किया जो ओगुस्तस के बाद रोमन साम्राज्य का सम्राट् हुआ, यद्यपि उससे ओगुस्तस घृणा करता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओगुस्तस शरीर से कुछ विशेष शक्तिमान न था और प्राय: रोगों का शिकार बना रहता था। न उसमें अंतोनी की सैनिक तीव्रता थी और न सीज़र की सामरिक विचक्षणता, परंतु धीरज और नैतिक सूझ उसमें उन दोनों से अधिक थी। जिस महत्वाकांक्षा के फलस्वरूप सीज़र की हत्या हुई उसी ने ओगुस्तस को रोम का पहला सम्राट् बनाया और प्राय: 41 वर्ष राज कर 77 वर्ष की आयु में वह शांतिपूर्वक अपने मित्रों के बीच मरा। कहते हैं, उसने मृत्युशय्या के निकट खड़े रोमनों से पूछा–''क्या मैंने अपनी भूमिका उक्ति रूप से खेली है?'' और स्वीकारात्मक उत्तर पाने पर उसने कहा–''तब विदा, संतुष्ट होओ, प्रसन्न रहो!'' निश्चय इस घटना से अपने जीवन की सफलता पर उसका शांत परितोष प्रकट होता है।&amp;lt;ref&amp;gt;सं.ग्रं.–फ़र्थ जानबी : आगस्टस्‌ सीज़र, न्यूयार्क, 1903; बेयरिंग-गूल्ड सेबाइन :द ट्रैजेडी ऑव द सीज़र्स, न्यूयार्क, 1907; मार्च, फ्रैंक नी. : द फ़ाउंडिंग ऑव द रोमन एंपायर, द्वितीय संस्करण, आक्सफ़र्ड; द कैंब्रिज ऐंशेंट हिस्ट्री, खंड 10, न्यूयार्क 1934। &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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