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	<title>क्रूसदंड क्रूस - अवतरण इतिहास</title>
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&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{लेख सूचना&lt;br /&gt;
|पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3&lt;br /&gt;
|पृष्ठ संख्या=214&lt;br /&gt;
|भाषा= हिन्दी देवनागरी&lt;br /&gt;
|लेखक =&lt;br /&gt;
|संपादक=सुधाकर पांडेय&lt;br /&gt;
|आलोचक=&lt;br /&gt;
|अनुवादक=&lt;br /&gt;
|प्रकाशक=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|मुद्रक=नागरी मुद्रण वाराणसी&lt;br /&gt;
|संस्करण=सन्‌ 1976 ईसवी&lt;br /&gt;
|स्रोत=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=भारतडिस्कवरी पुस्तकालय&lt;br /&gt;
|कॉपीराइट सूचना=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|टिप्पणी=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लेख सम्पादक&lt;br /&gt;
|पाठ 1=कामिल बुल्के&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन सूचना=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''क्रूसदंड क्रूस''' रोम में विद्रोहियों और घोर अपराधी दासों को दंड देने का एक साधन। अपराधी को पहले कोड़ों से मारा जाता; इसके बाद उसे अपने क्रूस (आड़ी और खड़ी लकड़ी से बनी टिकठी) अथवा उसकी आड़ी लकड़ी को प्राणदंड के स्थान पर ले जाने के लिये बाध्य दिया जाता था। वहाँ पहुँचकर जल्लाद अपराधी को भूमि पर लिटाकर उसकी फैली हुई भुजाओं को क्रूस की आड़ी लकड़ी पर रखकर कीलों से ठोंकता था अथवा रस्सी से बाँध देता था। इसके बाद अपराधी सहित उस आड़ी लकड़ी को क्रूस की खड़ी लकड़ी अथवा खूँटे से जोड़ देते थे तथ अपराधी के पैरों को कीलों से ठोंककर अथवा रस्सी से बाँधकर क्रूस के खड़े खूँटे पर जकड़ देते थे। अपराधी प्यास, भूख, तथा पीड़ा सहता रहता था और कभी कभी रात में खूँखार जानवरों से भी सताया जाता था। इस तरह असीम वेदना झेल झेलकर उसे मृत्यु की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कभी कभी अपराधी कोक्रूस पर चढ़ाने के बाद जल्लाद उसकी हड्डियाँ मार मारकर तोड़ते थे। क्रूस की मृत्यु इतनी अपमानजनक समझी जाती थी। कि रोमी-नागरिकता-प्राप्त व्यक्तियों के लिये इस प्रकार का दंड वर्जित था। सम्राट् कोंस्तांतिनस ने अपने राज्यकाल के अंतिम दिनों में क्रूस दंड उठा दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईसामसीह को भी क्रूस पर चढ़ाया गया था इस कारण ईसाइयों का विश्वास रहा है कि मनुष्य जाति के पापों के प्रायश्चित्त के लिये उन्होंने क्रूस का दंड स्वीकार कि या। किंतु अपराधियों को क्रूस की घृणित मृत्यु मरते देखकर कदाचित्‌ ईसाइयों को अपने आराध्य को क्रूस पर चित्रित करने में संकोच हुआ होगा। संभवत: इसी कारण प्रांरभिक तीन शताब्दियों के क्रूसदंडित ईसा के केवल तीन ही चित्र मिले है। इसी प्रकार चौथी शताब्दी के पूर्व के केवल क्रूस के चित्र भी कम ही मिलते हैं। कैंटाकूंब्स अर्थात्‌ रोम की ईसाई कब्रों के तहखानों में दूसरी-तीसरी शताब्दी के कुल मिलाकर लगभग 20 क्रूस के ही चित्र मिले हैं। इनमें क्रूस का स्वरूप अनेक प्रकार का है, यथा-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सम्राट् कोंस्तांतिनस के समय (सन्‌ 307-337 ई.) से क्रूस विजय का चिह्न माना जाने लगा। चौथी शताब्दी के अंत तक ईसाइयों का दृढ़ विश्वास बन गया कि ईसा का क्रूस येरुसलेम में मिल गया है। और ईसा के इस क्रूस के छोटे छोटे टुकड़ों (तबर्रुक) की सर्वत्र पूजा होने लगी। क्रूस की इस भक्ति के कारण क्रूसदंडित ईसा के चित्रों का निर्माण व्यापक रूप से होने लगा। परवर्ती ईसाई कला में ईसा का क्रूसदंड लोकप्रिय विषय रहा है। इसी प्रकार क्रूसमूर्तियों (क्रूसिफिक्स) अर्थात्‌ क्रूस पर ठोंके हुए ईसा की मूर्तियों का भी प्रचलन हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
द्वितीय शताब्दी से ईसाई पुरोहित धर्मसंस्कारों में हाथ से दो आड़ी खड़ी लकीरें खींचकर क्रूस का चिह्न (साइन ऑव दि क्रॉस) बनाते चले आ रहे हैं। ईसाई विश्वासी भी धर्मक्रियाओं के समय अपने माथे पर अँगूठे से क्रूस का चिह्न बना लेते रहे। आजकल प्रत्येक धार्मिक क्रिया के पूर्व ईसाई माथे पर से छाती तक तथा छाती की बाई ओर से दाहिनी ओर तक दाहिना हाथ ले जाकर अपने ऊपर क्रूस का चिह्न बनाते हैं। इस क्रिया को ईसाई धर्म में अंगन्यास कहा जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी_विश्वकोश]][[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
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