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	<title>गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 307 - अवतरण इतिहास</title>
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	<updated>2026-06-03T00:23:33Z</updated>
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		<title>Bharatkhoj: '&lt;div style=&quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&quot;&gt;गीता-प्रबंध: भाग-2 खंड-1: कर्म,...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2015-09-22T06:03:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;गीता-प्रबंध: भाग-2 खंड-1: कर्म,...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;गीता-प्रबंध: भाग-2 खंड-1: कर्म, भक्ति और ज्ञान का समन्वयव&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;6.कर्म , भक्ति और ज्ञान&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
जितने भी पदार्थ हैं उनके बाह्म रूपों को वह ऐसे देखता है मानों वे आवरण हों इसके साथ ही वह उनके भीतरी अभिप्राय को देखता है , देखता है कि वे सब पदार्थ उसी एक अचिंत्य सत्तत्व के स्वतः प्रकट होने के साधन और लक्षण हैं , इस तरह बाह्म रूप और आंतर अभिप्राय , दोनों को ही एक साथ देखता हुआ वह सर्वत्र उसी एकत्व , उसी ब्रह्म , पुरूष , आत्मा , वासुदेव , उसी वस्तुतत्व को ढूंढ़ता है जो ये सब प्राणी और पदार्थ बना है । इसलिये भी उसका सारा आंतरिक जीवन उस अनंत के साथ समस्वर और सुसंगत हो जाता है जो अब , यह जो कुछ जीवन - रूप से है या इसके अंदर और चारों ओर है , इस सबके रूप में स्वतः प्रादुर्भूत है और इस तरह उसका समस्त बाह्म जीवन अखिल ब्रह्मांड के जीवनोद्देश्य का एक समुचित साधक यंत्र बन जाता है । अपनी आत्मा के द्वारा वह उस परब्रह्म की ओर ताकता है जो परब्रह्म ही यहां , वहां , सर्वत्र एकमेवाद्वितीय सत् है । अपने अतं:स्थत ईश्वर के द्वारा वह उन परम पुरूष की ओर देखता है जो अने परम रूप में सब वासस्थनों के परे हैं । विश्व में व्यक्त हुए प्रभु के द्वारा वह उन परम की ओर देखता है जो अपने सब व्यक्त भावों के परे रहकर उनका नियमन करते हैं ।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार वह ज्ञान के असीम उद्घाटन और ऊध्र्वदर्शन और अभीप्सा के द्वारा आरोहण कर उस वस्तु को प्राप्त होता जिसकी और उसने अपने - आपको अनन्य और सर्वभाव से फेर लिया है । जीव का भगवान् की ओर सर्वभाव से यह फिरना ही मुख्यतया गीता के ज्ञान , कर्म और भक्ति के समन्वय का आधार है । इस प्रकार से भगवान को सर्वभावेन जानना यह जानना है कि वे ही एक भवगान् आत्मा में है , व्यक्तीभूत सारे चराचर जगत् में है और समस्त व्यक्त के परे हैं - और यह सब एकीभाव से और एक साथ हैं । परंतु उन्हें इस प्रकार जानना भी पर्याप्त नहीं होता जबतक कि उसके साथ हृदय और अंतःकरण भगवान् की ओर प्रगाढ़ता के सथ ऊपर न उठें , जबतक कि मनुष्य के अंदर वह ज्ञान एकमुखी और साथ ही सर्वग्राही प्रेम , भक्ति और अभीप्सा को प्रज्जवलित न कर दे । निश्चय ही वह ज्ञान जिसके संग अभीप्सा नहीं नहीं हेाती , जो उन्नयन से उद्दीप्त नहीं होता कोई सच्चा ज्ञान हीं है , क्योंकि ऐसा ज्ञान केवल बौद्धिक रूप से देखने की क्रिया और नीरस ज्ञान - प्रयास मात्र हो सकता है । भगवान की झांकी पा लेने के बाद तो भगवान की भक्ति और उन्हें ढूंढ़ने की सच्ची लगन प्राप्त हो ही जाती है - वह लगन हो जाती है जो केवल उन भगवान् को ही नहीं जो अपने कैवल्य रूप में हैं , बल्कि उन भगवान् को भी जो हम लोगों के अंदर हैं और उन भगवान् को भी जो यह सब जो कुछ उसके अदंर हैं , ढूंढ़ती फिरती है । बुद्धि से जानना केवल समझना है और आरंभ के लिये एक प्रभावशाली साधन हो सकता है और यदि उस ज्ञान में कोई दिली सच्चाई न हो तो नहीं भी हो सकता और न होगा ही । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख क्रम |पिछला=गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 306|अगला=गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 308}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गीता प्रबंध}}&lt;br /&gt;
[[Category:गीता प्रबंध]][[Category:कृष्ण कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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