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	<title>गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 329 - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj: '&lt;div style=&quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&quot;&gt;गीता-प्रबंध: भाग-2 खंड-1: कर्म,...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2015-09-22T08:18:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;गीता-प्रबंध: भाग-2 खंड-1: कर्म,...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;गीता-प्रबंध: भाग-2 खंड-1: कर्म, भक्ति और ज्ञान का समन्वयव&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;7.गीता का महाकाव्य&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
सर्वातीत अनंत - विषयक यह आत्मानुभूति विश्व के ही सब पदार्थो को ईश्वर या देव मानने वाले सर्वेश्वरवाद की सब सीमाओं को तोड़ डालती है। विश्व - रूप ऐकेश्वरवाद में विश्व और ईश्वर एक हैं , उसमें अनंत की जो कल्पना है वह ईश्वर को उसके जगद्रूप आविर्भाव में कैद रखने का प्रयास करती और ईश्वर को जानने का एकमात्र उपाय इस विश्व को ही बतलाती है ; परंतु यह आत्मानुभूति ज्ञान हमें मुक्त कर दिक्कालातीत सनातन स्वरूप में ला छोड़ता है। ‘‘ तेरे आविर्भाव को न देवता जानते हैं न असुर ही ”&amp;lt;ref&amp;gt;10.14&amp;lt;/ref&amp;gt; यही अपने जवाब में अर्जुन कह उठता है। यह सारा जगत् अथवा ऐसे असंख्य जगत् भी उन्हें प्रकट नहीं कर सकते न उनके वर्णनातीत विलक्षण आलोक और असीम माहात्म्य को धारण कर सकते हैं। ईश्वरसंबंधी इससे कनिष्ठ कोटि के ज्ञान इन्हीं परम पुरूष परमेश्वर के चिराव्यक्त अनिर्वचनीय सत्स्वरूप पर आश्रित होने के कारण ही सत्य है। परंतु फिर भी यह परम पद विश्व का निषेधस्वरूप नहीं है , न कोई ऐसा निरपेक्ष स्वरूप है जिसका विश्व के साथ कोई संबंध न हो । यह परम वस्तुतत्व है , सब निरपेक्षों का निरपेक्ष है।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
विश्वगत सारे संबंध इन्हीं परम से निकलते हैं ; विश्व के सब पदार्थ और प्राणी इन्हींको लौट जाते हैं और केवल इन्हींमें अपना वास्तविक और अपरिमेय जीवन लाभ करते हैं। ‘‘ सर्वशः मैं ही सब देवताओं और महर्षिओं का आदि हूं।”&amp;lt;ref&amp;gt;  10.2&amp;lt;/ref&amp;gt; देवता वे अमर शक्तियां ओर अमर व्यक्तित्व हैं जो विश्व की अंतर्बाह्य शक्तियों को सचेतन रूप से भीतर गढ़ते हैं तथा उने बनानेवाले , अध्यक्ष रूप से उन्हें चलानेवाले हैं। देवता सनातन और मूल देवाधिदेव के आध्यात्मिक रूप हैं और उन देवाधिदेव से निकलकर जगत् की नाना शक्तियों में उतर आते हैं। देवता अनेकविधि हैं , सार्वत्रिक हैं , वे आत्मसत्ता के मूलतत्वों , उसकी सहस्त्रों गुत्थियों से उस एक ही का यह विविधतापूर्ण जगत - जाल निर्मित करते हैं। उनकी अपनी सारी सत्ता , प्रकृति , शक्ति , कर्मपद्धति हर तरह से , अपने एक - एक तत्व और अपनी बनावट के एक - एक धागे में रम पुरूष परमेश्वर की सत्ता से ही निकलती है। यहां का कोई भी पदार्थ ये दैवी कार्यकर्ता स्वतः निर्मित नहीं करते , अपने से ही कोई कार्य नहीं करते ; हर चीज का मूल कारण , उसके सत् - भाव और भूत - भाव का मूल आध्यात्मिक कारण स्वतःसिद्ध परम पुरूष परमेश्वर में ही होता है। जगत् किसी चीज क मूल कारण जगत् में नहीं है ; सब कुछ परम सत् में प्रवृत्त होता है।महर्षि जो वेदों की तरह यहां भी जगत् के सप्त पुरातन कहे गये हैं , उस भागवत ज्ञान की धी - शक्तियां हैं जिसने अपनी ही स्वात्म - सचेतन अनंतता से , प्रज्ञा पुराणी से सब पदार्थो का विकास कराया है - अपने ही सत्तत्व के सात तत्वों की श्रेणियों को विकसित किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख क्रम |पिछला=गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 328|अगला=गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 330}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गीता प्रबंध}}&lt;br /&gt;
[[Category:गीता प्रबंध]][[Category:कृष्ण कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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