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	<title>घूर्णाक्ष दिकसूचक - अवतरण इतिहास</title>
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&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{लेख सूचना&lt;br /&gt;
|पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 4&lt;br /&gt;
|पृष्ठ संख्या=122&lt;br /&gt;
|भाषा= हिन्दी देवनागरी&lt;br /&gt;
|लेखक =&lt;br /&gt;
|संपादक=रामप्रसाद त्रिपाठी&lt;br /&gt;
|आलोचक=&lt;br /&gt;
|अनुवादक=&lt;br /&gt;
|प्रकाशक=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|मुद्रक=नागरी मुद्रण वाराणसी&lt;br /&gt;
|संस्करण=सन्‌ 1964 ईसवी&lt;br /&gt;
|स्रोत=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=भारतडिस्कवरी पुस्तकालय&lt;br /&gt;
|कॉपीराइट सूचना=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|टिप्पणी=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लेख सम्पादक&lt;br /&gt;
|पाठ 1=सुरेश चंद गौड़&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन सूचना=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक''' (Gyro-compass) पहले जलयानों में दिशा ज्ञात करने के लिये चुंबकीय दिक्‌सूचक की सहायता ली जाती थी, किंतु आधुनिक विशाल जलयानों में इस्पात की अधिकता रहने के कारण चुंबकीय दिक्‌सूचक विश्वसनीय नहीं रह जाता। इसलिये अन्य प्रकार के दिक्‌सूचकों की खोज होने लगी और इस प्रयास की परिणति घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक के आविष्कार के रूप में हुई। सन्‌ १९०८ में एच. ऐंशुज (H. Anschiitz) नामक जर्मन यंत्रशास्त्री ने प्रथम व्यवहार्य घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक बनाया। इसके बाद संयुक्त राज्य, अमरीका, के ई. ए. स्पेरी (E. A. Sperry) ने एक नया घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक बनाया और उसका सफल परीक्षण न्यूयार्क सिटी तथा नॉरफॉक के बीच एक व्यापारी जहाज पर किया गया। इंग्लैंड के एस. जी. ब्राउन (S. G. Brown) ने सन्‌ १९१६ में एक तीसरा घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक बनाया। तीनों के मौलिक सिद्धांतों में साम्य होते हुए भी, उनमें घूर्णांक्षदर्शी तत्वों (gyroscopic elements), यथा घूर्णक या रोटर (rotor), दोलनशील खोल (pendulous case) और बाहरी छल्ले या जिंबल (gimbal) इत्यादि को लटकाने की विधियाँ भिन्न भिन्न थीं। ऐंशुज़ के दिक्‌सूचक में प्लवन विधि का, ब्राउन के दिक्‌सूचक में 'तैल पंप' का और स्पेरी के दिक्‌सूचक में सुग्राही भार को यांत्रिक विधि से संतुलित करने की विधि का अवलंबन किया गया था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Guarnaksh-compass.jpg|thumb|150px|left]]&lt;br /&gt;
इसके फ्रेम में गुरुत्वाकर्षण के उपयोग के लिये एक द्रव पदार्थ की नली लगी हुई है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उ= उत्तर; द= दक्षिण; प= पश्चिम तथा पू= पूरब।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख्य भाग एवं कार्यसिद्धांत - इस यंत्र के तीन मुख्य भाग होते हैं : (1) एक भारी घूर्णाक्ष घूर्णक (gyro-rotor), जो अत्यंत तीव्र गति से अपने अक्ष या धुरी (axle) पर नर्तन करता है। यह विद्युच्छक्ति से घुमाया जाता है ; (2) एक दोलनशील खोल (pendulous case), जिसके सहारे घूर्णक की धुरी ऊपर नीचे घूम सकती है; (३) एक बाहरी छल्ला (gimbal), जो धुरी को दिगंश (azimuth) में घूर्णन कराता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत्यंत तीव्र गति से अपनी धुरी पर नर्तन करने के कारण धूर्णक (rotor) में घूर्णाक्षसुलभ अवस्थित्वि (gyrosocopic intertia) उत्पन्न हो जाता है, जिसके कारण धुरी दिक्‌ (space) में सदा उसी दिशा में रहना चाहती है जिसमें वह प्रारंभ में रहती है। यदि इसकी धुरी प्रारंभ में पृथ्वी के याम्योत्तर (पृथ्वी के घूर्णाक्ष के समानांतर) में रखी जाय तो घूर्णक के नर्तन करने पर यह उसी दिशा में बनी रहना चाहेगी। नीचे दिए गए चित्र २ में घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक को भूमध्य रेखा पर स्थित दिखलाया गया है। पृथ्वी के घूर्णन के साथ ही छल्ला (gimbal) भी पश्चिम से पूर्व की ओर चलेगा। यदि घूर्णक की नर्तनधुरी पृथ्वी के याम्योत्तर में होगी तो घूर्णक पर कोई बलयुग्म कार्य नहीं करेगा, किंतु यदि धुरी की दिशा याम्योत्तर से रंचमात्र भी हटकर होगी, तो उसपर एक प्रत्यानयन बलयुग्म (restoring torque) उत्पन्न हो जायगा, जो धुरी को याम्योत्तर के चतुर्दिक्‌ पुरस्सरण (precession) करना प्रारंभ कर देगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मान लीजिए, घूर्णक की नर्तन धुरी पृथ्वी के अक्ष की दिशा से कुछ विमुख है। इसका उत्तरी सिरा याम्योत्तर से कुछ कोण बनाता हुआ पश्चिम की ओर तथा दक्षिणी सिरा उतना ही कोण बनाता हुआ पूर्व की ओर हटा हुआ है। पृथ्वी के घूर्णन के कारण घूर्णक के नर्तन अक्ष का उत्तरी सिरा नीचे की ओर झुकने लगेगा और दक्षिणी सिरा ऊपर की ओर उठने लगेगा। इस प्रकार धुरी पर एक बलयुग्म स्वत: कार्य करने लगेगा, जो घूर्णक के उत्तरी सिरे पर नीचे तथा दक्षिणी सिरे पर ऊपर की ओर कार्य करता हुआ प्रतीत होगा। घूर्णक के घूर्णन तथा इस प्रतिक्रियात्मक बलयुग्म के सम्मिलित प्रभाव से घूर्णक की धुरी अपनी प्रारंभिक दिशा तथा बलयुग्म की दिशा, दोनों के लंबवत्‌, पश्चिम से पूर्व की ओर पुरस्सरण (precess) करना आरंभ कर देगी। पुरस्सरण करते हुए जिस क्षण घूर्णक की धुरी पृथ्वी के घूर्णन अक्ष के समांतर स्थिति से होकर गुजरेगी, स्थिति ठीक उलटी ही जायगी, क्योंकि इसके बाद घूर्णक की धुरी का ऊपरी सिरा पूर्व की ओर और दक्षिणी सिरा पश्चिम की ओर चला जायगा। फलस्वरूप उत्तरी सिरा ऊपर उठने लगेगा और दक्षिणी सिरा नीचे दबने लगेगा। इस दशा में अक्ष पर लगनेवाले बलयुग्म की दिशा भी पहले की ठीक उल्टी हो जायगी और नर्तनधुरी पूर्व से पश्चिम की ओर पुरस्सरण करने लगेगी। पुरस्सरण की इस क्रिया पर ध्यान देने से स्पष्ट हो जायगा कि घूर्णक की धुरी एक दीर्धवृत्ताकार (ellipitcal) पथ पर पुरस्सरण करती है। यदि इसे इसी प्रकार छोड़ दिया जाय, तो निरंतर पुरस्सरण करती रहेगी और तब यह साधारण घूर्णाक्षदर्शी की भाँति कार्य करेगी। घूर्णक की धुरी को पृथ्वी के घूर्णाक्ष के समांतर, अर्थात्‌ उत्तर-दक्षिण दिशा में, बनाए रखने के लिये पुरस्सरण की इस क्रिया को रोकना आवश्यक हो जाता है। एतदर्थ घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक में अवमंदन (damping) की उपयुक्त व्यवस्था कर दी जाती है, जिससे घूर्णाक की धुरी सर्पिल पथ में पुरस्सरण करती हुई, अंत में पूर्ण रूप से उत्तर-दक्षिण दिशा की ओर उन्मुख होकर टिक जाती है। इस अवमंदन व्यवस्था के लिय घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक में सामान्यतया पारे में भरी हुई एक अर्धवृताकार नली उस फ्रेम या छल्ले में लगा दी जाती है जिसमें वह घूर्णक या परिभ्रमणचक्र लटकता रहता है। ऊपर दिए गए दृष्टांत में, मान लीजिए, पुरस्सरण के क्रम में घूर्णक की धुरी का उत्तरी सिरा ऊपर की ओर उठता तथा दक्षिणी सिरा नीचे की ओर झुकता है। इससे पारा उस नली के ऊँचे भाग से नीचे भाग की ओर बहने लगता है। इस प्रकार वह घूर्णक की क्षैतिज धुरी के चारों ओर एक बल लगाता है। पुरस्सरण के उपर्युक्त सिद्धांत के अनुसार, यह बल घूर्णक को ऊर्ध्वाधर अक्ष के चारों ओर तब तब घुमाने की चेष्टा करता रहेगा जब तक घूर्णक की धुरी पृथ्वी के याम्योत्तर नहीं आ जाती। ज्यों ही धूर्णक की धुरी याम्योत्तर दिशा को पार करेगी, उसका विपरीत सिरा ऊपर उठेगा, जिसके फलस्वरूप पारे का प्रवाह भी अब विपरीत दिशा में होने लगेगा। इस धूर्णक की धुरी विपरीत दिशा में पुरस्सरण करके पुन: याम्योत्तर हो जायगी; किंतु पुरस्सरण क्रमश: घटता जाता है और अंतत: बिलकुल समाप्त हो जाता है, जिससे घूर्णक की धुरी याम्योत्तर दिशा में रह जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Guarnaksh-compass-2.jpg|thumb|150px|right|घूर्णदर्शी की संचलन चक्र का पूर्व-पश्चिम स्थिति से प्रारंभ]]पश्चिम से पूर्व की ओर पृथ्वी का घूर्णन; क. पर वास्तविक याम्योत्तर की दिशा में अवस्थापन के लिये रखा; ख., ग., घ, बाद की स्थितियाँ; च. घूर्णाक्ष दिक्सूचक में संरूपित।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जलयानों में व्यवहृत होनेवाले घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक में संपूर्ण घूर्णाक्ष प्रणाली को इस प्रकार छल्लों के एक सेट (set) पर आरोपित करते हैं कि यान के डगमगाने अथवा उसके वेग में किसी प्रकार के परिवर्तन आदि का प्रभाव घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक पर नही पड़ने पाता। इस प्रकार के घूर्णाक्ष दिक्‌सूचक में घूर्णक और उसका प्रकोष्ठ (case) स्वयं दोलनशील (pendulous) नहीं होते, वरन्‌ प्रकोष्ठ में एक संयोग-पिन (coupling pin) लगा होता है, जो एक अन्य छल्ले में घुसा हुआ रहता है। इस छल्ले को प्राक्षेपिक छल्ला (ballistic ring) कहते हैं। इस छल्ले में इसी के अक्ष के लंबवत्‌ पारा भरी हुई एक नली लगी रहती है, जिसके ऊपरी सिरे दोनों ओर बोतल की आकृति के होते हैं (देखं चित्र १.)। पारा भरी हुई इस नली को ''पारा प्राक्षेपिक छल्ला'' (mercury ballistic ring) कहते हैं। इसकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। संयोग-पिन (coupling pin) को तनिक सा उत्केंद्र (eccentric) कर देने से धूर्णाक्षदर्शी अवमंदन की सुलभ व्यवस्था पूरी हो जाती है। प्राक्षेपिक छल्ले से बेयरिंगों (bearings) के सहारे छाया तत्व (phantom element) से एक संकेतक संबंधित रहता हैं, जिसके द्वारा जलयान के आगे बढ़ने की दिशा ज्ञात की जा सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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