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	<title>चयापचयन के रोग - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj: '{{लेख सूचना |पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 4 |पृष्ठ स...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{लेख सूचना&lt;br /&gt;
|पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 4&lt;br /&gt;
|पृष्ठ संख्या=164&lt;br /&gt;
|भाषा= हिन्दी देवनागरी&lt;br /&gt;
|लेखक =&lt;br /&gt;
|संपादक=रामप्रसाद त्रिपाठी&lt;br /&gt;
|आलोचक=&lt;br /&gt;
|अनुवादक=&lt;br /&gt;
|प्रकाशक=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|मुद्रक=नागरी मुद्रण वाराणसी&lt;br /&gt;
|संस्करण=सन्‌ 1964 ईसवी&lt;br /&gt;
|स्रोत=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=भारतडिस्कवरी पुस्तकालय&lt;br /&gt;
|कॉपीराइट सूचना=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|टिप्पणी=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लेख सम्पादक&lt;br /&gt;
|पाठ 1=मुकुंद स्वरूप वर्मा&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन सूचना=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चयापचयन के रोग''' (Metabolic diseases) - चयापचयन या उपापचयन जीवन का प्रधान लक्षण तथा क्रिया है। प्रत्येक जीवित पदार्थ में प्रत्येक क्षण उपापचयन घटना घटती रहती है। चय का अर्थ है एकत्र करना और अपचय का अर्थ व्यय करना, बाँटना या बिखेरना है। चय क्रिया से ऊर्जा की उत्पत्ति और संग्रह होता है। इस ऊर्जा का पेशियों की क्रिया के, अथवा शारीरिक ताप के, रूप में व्यय होना अपचय है। जो कुछ आहार हम करते हैं - प्रोटीन, कारबोहाइड्रेट, वसा- उस सबका अत्यंत सूक्ष्म रूप में पाचन होकर शरीर की वस्तु को, जिसमें ऊर्जा एकत्र रहती है, फिर से बनाना चय है। ये परिवर्तन अनेक गूढ़ रासायनिक क्रियाओं के फल होते हैं, जिनके लिये ऑक्सीजन आवश्यक होता है। रक्त फुफ्फुसों में वायु से ऑक्सीजन लेकर प्रत्येक ऊतक तथा शरीर की कोशिका को पहुँचाता है। इन्हीं क्रियाओं से जहाँ एक ओर एक वस्तु बनती है वहाँ दूसरी ओर दूसरी वस्तु का भंजन होकर ऐसे अंतिम पदार्थ बन जाते हैं जिनका शरीर से फुफ्फुस, वृक्क, आंत्र तथा चर्म द्वारा त्याग होता है। प्रोटीन के पाचन से अंतिम पदार्थ ऐमिनो अम्ल बनते हैं, जिनके पुनर्विन्यास से शरीर में उपस्थित प्रोटीन बनता है। कुछ ऐमिनो अम्लां का भंजन भी होता है, जिससे यूरिया और यूरिक अम्ल बनकर मूत्र द्वारा शरीर से निकल जाते हैं। कार्बोहाइड्रेट के पाचन से ग्लूकोज़ बनकर पेशियों में काम आता है और अंत को जल और कार्बन डाइआक्साइड के रूप में मूत्र, स्वेद तथा श्वास द्वारा बाहर निकल जाता है। ग्लूकोज़ ग्लाइकोजन के रूप में यकृत में एकत्र भी हो जाता है। ग्लूकोज़ ग्लाइकोजन के रूप में यकृत में एकत्र भी हो जाता है। वसा के कण शरीर में विस्तृत जालक-अंत: कला-तंत्र (Reticulo endothelial system) में एकत्र रहते हैं तथा विभाजित होकर जल और कार्बन डाइआक्सइड के रूप में शरीर से पृथक्‌ होते हैं। जल, खनिज लवण, एंजाइम (enzyme) तथा हारमोन उन सब गूढ़ रासयनिक प्रक्रियाओं के ठीक ठीक संचालन में विशेष सहायक होते हैं जिनके ये परिवर्तन परिणाम हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राय: प्रत्येक रोग का चयापचयन से संबंध है। रुग्ण अवस्था में चयापचय में परिवर्तन हो जाता है तथा इस परिवर्तन का परिणाम रोग होता है, किंतु कुछ रोग विशेषकर चयापचय की किसी रासायनिक क्रिया के विकृत हो जाने से उत्पन्न होते हैं। ये तीन प्रकार से होते हैं : (1) चयापचय की किसी रासायनिक क्रिया के विकृत हो जाने से, (2) आहार की अधिकतम या न्यूनता से तथा (3) अंत: स्त्रावी ग्रंथियों के क्रियाधिक्य या क्रियान्यूनता से, अर्थात्‌ हारमोनों की अधिकता या कमी के परिणाम से।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रासायनिक क्रियाओं की विकृति से उत्पन्न रोग -''' (1) यकृत, प्लीहा, अस्थिमज्जा, लसीका ग्रंथियों आदि की रक्तवाहिकाओं की अंत: कला में वसा के समान वस्तुओं से लेसिथिन, किरेटिन और कोलेस्टरोल का एकत्र हो जाना, (2) यकृत में ग्लाइकोजन का अतिमात्रा में संग्रह हो जाना, जिससे यकृत का आकार बढ़ जाता है तथा (3) वे रोग जो प्रोटीन के चयापचय के किसी जन्मजात विकार से उत्पन्न होते हैं, जैसे गठिया। इस रोग में प्रोटीन के अपचय से उत्पन्न हुए यूरिक अम्ल के कण संधियों में एकत्र हो जाते हैं। सिस्टिनमेह (Cystinuria), पोरफाइरिनमेह (Porphyrinuria) तथा ऐल्केप्टोनमेह (Alkaptonuria) नामक असाधारण राग भी इसी कारण उत्पन्न होते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आहार की अधिकता या न्यूनता से उत्पन्न रोग -''' अधिकता से स्थूलता उत्पन्न होती है। वसा की अधिक मात्रा शरीर में एकत्र होने से अनेक रोग हो सकते हैं। आहार की न्यूनता अथवा अनुपयुक्तता (प्रोटीन, विटामिन या खनिज लवणों की कमी) से दुर्बलता होती है। खनिज लवणों या विटामिनों की कमी से शरीर को बहुत क्षति पहुँच सकती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हारमोनों की अधिकता या न्यूनता -''' प्रत्येक अंत: स्त्रावी ग्रंथि के स्त्राव में अधिकता या कमी हो जाने पर शारीरिक प्रक्रियाओं के विकृत हो जाने के कारण रोग उत्पन्न होते हैं। अवटुका ग्रंथि से नेत्रोंत्संधी गलगंड, मिक्सोडीमा या वामनता उत्पन्न होती है। अग्न्याशय की लेंगरहेंस द्वीपिका के स्त्राव, इंसुलिन, की कमी से मधुमेह या डायाबीटीज़ (Diabetes) और अधिकता से शरीर में शर्कर्ह्राास उत्पन्न होता है। अधिवृक्क ग्रंथि (Suprarenal gland) के स्त्राव की अधिकता से वह दशा उत्पन्न होती है जो कशिंग का लक्षणपुंज (Cushing syndrome) कही जाती है और कमी से ऐडिसन का रोग हो जाता है। अधिवृक्क का अंतस्थ भाग ऐड्रिनेलिन उत्पन्न करता है, जिसकी न्यूनाधिकता से भयंकर परिणाम हो सकते हैं। पीयूषिका ग्रंथि अपने 17 या 18 स्त्रावों द्वारा शरीर की अधिशोषक है। उसका मृत्यु और जीवन से संबंध है। प्रजनन ग्रंथियां पुरुष में अंड और स्त्री में डिंब हारमोन बनाती हैं। पुरुष में पुरुषत्व के लक्षण और स्त्री में स्त्रीत्व उत्पन्न करनेवाले ये ही स्त्राव हैं। डिंब ग्रंथि के एक स्त्राव से गर्भ की वृद्धि होती है। इन स्त्रावों के घट बढ़ जाने से विपरीत परिणाम होते है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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