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	<title>भगवद्गीता -राधाकृष्णन पृ. 173 - अवतरण इतिहास</title>
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		<updated>2015-09-26T07:36:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039; &amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;अध्याय-7&amp;lt;br /&amp;gt; ईश्वर और जगत् ईश...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt; &amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;अध्याय-7&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ईश्वर और जगत् ईश्वर प्रकृति और आत्मा है&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;text-align:center&amp;quot;&amp;gt;  &lt;br /&gt;
19.बहूनां  जन्मनामन्ते  ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।&lt;br /&gt;
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा  सुदुर्भभः।।&lt;br /&gt;
बहुत -से जन्मों के अन्त में ज्ञानी व्यक्ति- जो यह समझता है कि जो कुछ भी है, वह सब वासुदेव (ईश्वर) ही है- मुझे प्राप्त होता है। ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ होता है।बहुनां जन्मनाम् अन्ते: बहुत-से जन्मों के बाद। सत्य को हृदयंगम कर पाना अनेक युगों का कार्य है। जब तक कोई व्यक्ति अनुभव की गहराइयों को उनकी विविध जटिलताओं के साथ भलीभांति न जान ले, तब तक यह आशा नहीं की जा सकती कि उसे सत्य का ज्ञान हो जाएगा। और इस सबमें काफी समय लगता है। परमात्मा पौधे को अपनी गति से बढ़ने देता है। प्राकृतिक शिशु को बनने में नौ महीने लगते हैं, फिर आध्यात्मिक शिशु को बनने में तो कहीं अधिक लम्बा समय लगेगा। प्रकृति का सम्पूर्ण रूपान्तरण एक लम्बी प्रक्रिया है।वासुदेवः सर्वम्: वासुदेव सब-कुछ है। वासुदेव जीवन का स्वामी है, जो हम सबमें निवास करता है।&amp;lt;ref&amp;gt;वसति सर्वस्मिन्निति वासु; तस्य देवः।&amp;lt;/ref&amp;gt; परमात्मा  अपनी दो प्रकृतियों के रूप में सब-कुछ है। इस वाक्यांश का अर्थ रामानुज ने यह लगाया है कि ’’वासुदेव मेरा सर्वस्व है।’’ इसका संकेत परमात्मा के उस अनश्वर गौरव की ओर है, जो विनीत और विश्वासी भक्त को अपने हृदय में अनुभव होता है। परमात्मा सब-कुछ  है, जब कि हम कुछ भी नहीं हैं। अन्य सब वस्तुओं की भांति मनुष्य का अस्तित्व परमात्मा के बिना नहीं रह सकता, जब कि परमात्मा का अस्तित्व सदा बना रहता है। हम विश्वासपूर्वक अपने-आप को परमात्मा के हाथों में यह विश्वास करते हुए सौंप देते हैं कि वह सब-कुछ है। यह परमात्मा के प्रति, जो सब-कुछ है और जो वस्तुतः है, विनम्रता की अनुभूति है।’’वासुदेव सबका कारण है।’’ - मध्व।विनय और प्रार्थना के अन्य स्वरूप निरर्थक नहीं हैं; उनका अपना फल है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
सहिष्णुता&lt;br /&gt;
20.कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः     प्रपद्यन्तेअन्यदेवताः।&lt;br /&gt;
तं तं नियममास्थाय  प्रकृत्या नियताः स्वया।। &lt;br /&gt;
परन्तु  जिन लोगों के मन उनकी लालसाओं के कारण विकृत हो गए हैं, वे अपने-अपने स्वभाव के कारण विभिन्न विधि-विधानों को करते हुए अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
21.यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।&lt;br /&gt;
तस्य  तस्याचलां  श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।&lt;br /&gt;
जो कोई भक्त श्रद्धापूर्वक जिस भी रूप की पूजा करना चाहता है, मैं उस-उस रूप में उसकी श्रद्धा को अचल बना देता हूं।परमेश्वर प्रत्येक भक्त की श्रद्धा को पुष्ट करता है और जो कोई जो फल चाहता है, उसे वह देता है। आत्मा अपने संघर्ष में जितनी ऊंची उठ जाती है, परमात्मा उससे मिलने के लिए ठीक उतना ही नीचे झुकता है। गौतमबुद्ध और शंकराचार्य जैसे अच्यधिक चिन्तनशील ऋषियों ने भी देवताओं में प्रचलित लोकप्रिय विश्वास का खण्डन नहीं किया। वे इस बात को समझते थे कि परमेश्वर को किसी प्रकार अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता और साथ ही यह भी कि वह जिन रूपों में प्रकट हो सकता है, उनकी संख्या असीम है। प्रत्येक सतह को उसका स्परूप उसकी गहराई से प्राप्त होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे कि छाया अपने मूल तत्व की प्रकृति को प्रतिविम्बित करती है। इसके अतिरिक्त सब प्रकार की पूजा ऊंचा उठाती है। चाहे हम किसी भी वस्तु पर श्रद्धा क्यों न करें, जब तक हमारी श्रद्धा गम्भीर है, वह प्रगति में सहायक होती है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
22.स  तया  श्रद्धया  युक्तस्तस्याराधनमीहते।&lt;br /&gt;
लभते च तत कामान्मयैव विहितान्हि तान्।।&lt;br /&gt;
उस श्रद्धा से युक्त होकर वह उसकी आराधना करना चाहता है, और उससे ही वह अपने वांछित फल प्राप्त करता है, जब कि वस्तुतः वह फल मैं ही देता हूं।सब रूप एक भगवान् के ही हैं; उनकी पूजा भगवान् की पूजा है; और सब फलों को देने वाला भगवान् ही है।&amp;lt;ref&amp;gt;सर्वा अपि देवता ममैव मूर्तयः, तदाराधनमपि वस्तुतो ममाराधनरमेव, तत्ततफलदाताअपि चाअहमेव।&amp;lt;/ref&amp;gt; - श्रीधर।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख क्रम |पिछला=भगवद्गीता -राधाकृष्णन पृ. 172|अगला=भगवद्गीता -राधाकृष्णन पृ. 174}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भगवद्गीता -राधाकृष्णन}}&lt;br /&gt;
[[Category:भगवद्गीता -राधाकृष्णन]][[Category:कृष्ण कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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