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	<title>भागवत धर्म सार -विनोबा भाग-111 - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj: '&lt;h4 style=&quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&quot;&gt;भागवत धर्म मिमांसा&lt;/h4&gt; &lt;h4 style=&quot;text-...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2015-08-11T05:50:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;भागवत धर्म मिमांसा&amp;lt;/h4&amp;gt; &amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;भागवत धर्म मिमांसा&amp;lt;/h4&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;4.  बुद्ध-मुक्त-मुमुक्षु साधक&amp;lt;/h4&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्त अधिकाधिक शुद्ध करना चाहिए। इन दिनों ‘एक्टिविटी’ (क्रिया) पर अधिक जोर दिया जाता है। कहते हैं :‘हमें आन्दोलन करना है।’ लेकिन मैंने ‘आन्दोलन’ के बदले ‘आरोहण’ कहा। युधिष्ठिर की कहानी है। आखिरी उम्र में वे भाई और पत्नी के साथ स्वर्गारोहण के लिए निकले। उनमें से एक-एक गिरता गया। फिर भी वे अकेले आगे बढ़ते गये। इसे ‘आरोहण’ कहा गया है। ‘एक्टिविटी’ में शक्ति है। लेकिन जितनी चित्त-शुद्धि होगी, उतना ही क्रिया के बिना परिणाम अधिक होगा। जडवत् बनने का दूसरा भी अर्थ लिया जाता है, जिसके लिए मैं आपको सचेत करना चाहता हूँ। मानते हैं कि जडवत् बनना यानी जो सहज होगा, वही करना।परिणामस्वरूप लोग तमोगुण में पड़ेंगे। जान-बूझकर क्रिया कम करने की आवश्यकता नहीं। जैसे-जैसे चित्त-शुद्धि होगी, वैसे-वैसे बाह्य-क्रिया कम होती ही जायेगी। वह कम करनी नहीं पड़ेगी। तम हम लोके जडवत् आचरेत् –मनु के इस वाक्य के निकट पहुँच जाएँगे। हमने अनुभव किया है कि भगवान् की प्रवृत्ति की तीव्र प्रेरणा उसकी निवृत्ति में होती है। इसलिए हम पूर्ति खड़ी करते हैं, उपासना करते हैं। मूर्ति न बोलती है, न कुछ करती है। लेकिन उससे भक्त को प्रेरणा मिलती है। यह क्रिया परमेश्वर के निकट पहुँचाती है। इससे यह भ्रम न हो कि हम तमोगुण के निकट जा रहे हैं। तमोगुण और इस अवस्था में बहुत अन्तर है। तमोगुण और समाधि में भी बहुत अन्तर है और समाधि तथा इस अवस्था में भी अन्तर है। शास्त्रकारों ने कहा है :समाधिः लयः। समाधि यानी लयावस्था। लयावस्था में जाना लाभदायी बात नहीं। फिर भी कुछ साधक उसके पीछे पड़ते हैं। किन्तु उसमें उन्हें कृतार्थता का भास होना लाभदायी नहीं। साधक को सदैव यह अनुभव होना चाहिए कि हमारे और हमारे ध्येय के बीच अन्तर बढ़ ही रहा है। खयाल होना चाहिए कि जैसे-जैसे हम अपने आदर्श के निकट जाते हैं, वैसै-वैसे हमारा आदर्श आगे बढ़ रहा है। गांधीजी स्थितिप्रज्ञ के लक्षण को सदैव सामने रखते थे। वह उनका आदर्श था। लोग मानते थे कि गांधीजी वहाँ तक पहुँच गये। लेकिन गांधीजी बार-बार कहते कि ‘मैं बहुत दूर हूँ।’ जो कहता है कि मैं नजदीक हूँ, वह तो दूर होता ही है, इसमें कोई शक नहीं। मैं हमेशा एक मिसाल दिया करता हूँ। दो भाई बिस्तर पर लेटे थे। एक से पूछा कि नींद आयी, तो उसने कहा :‘नहीं।’ दूसरे से पूछा तो उसने कहा :‘हाँ।’ मतलब यह कि दोनों को नींद नहीं आयी। उसे केवल भास हुआ कि नींद आयी। ऐसे ही जो समझता है कि ‘मैं कृतार्थ हूँ’, उसे कृतार्थता का भास होता है। वास्तव में उससे वह बहुत दूर है। अभी तक हमने मुक्त पुरुष के लक्षण पढ़े। आगे श्लोक 15 से 22 में भक्त-लक्षण हैं। इसलिए हम उन्हें छोड़ देते हैं। भगवान् ने उद्धव और अर्जुन को उपदेश दिया है। दोनों उनके साथी थे। अर्जुन भगवान् के सार्वजनिक काम का प्रतिनिधि था। उसे भी भगवान् ने उपदेश दिया। लेकिन उद्धव को भगवान् ने जो उपदेश दिया, वह अन्तिम उपदेश है। भागवत में कहा गया बहुत सारा उपदेश गीता में भी है, लेकिन कुछ गीता की पूर्ति भी है। भागवत का जो चुनाव मैंने किया, उसमें यही दृष्टि रखी थी। जो हिस्सा गीता की पूर्ति में है, वही अधिक-से-अधिक इसमें लिया गया है।&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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