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	<title>भागवत धर्म सार -विनोबा भाग-116 - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj: '&lt;h4 style=&quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&quot;&gt;भागवत धर्म मिमांसा&lt;/h4&gt; &lt;h4 style=&quot;text-...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2015-08-11T06:33:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;भागवत धर्म मिमांसा&amp;lt;/h4&amp;gt; &amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;भागवत धर्म मिमांसा&amp;lt;/h4&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;6. ज्ञान-वैराग्य-भक्ति&amp;lt;/h4&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;text-align:center&amp;quot;&amp;gt; &lt;br /&gt;
(19.3)    दष्टं जनं संपतितं बिलेऽस्मिन्&lt;br /&gt;
कालाहिना क्षुद्र-सुखोरु-तर्षम्।&lt;br /&gt;
समुद्‍धरैनं कृपया पवर्ग्यैर्&lt;br /&gt;
वचोभिरासिंच महानुभाव ।।&amp;lt;ref&amp;gt;11.19.10&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
आगे उद्धव कहते हैं कि कालरूपी सर्प ने मुझे काटा है –दष्टम्। जिस बिल में साँप है, उसी बिल में आपका भक्त रहता है। अपना वर्णन कर रहे हैं कि इस संसाररूपी बिल में पड़ा हुआ और साँप से काटा हुआ मैं हूँ। मुझे क्षुद्र सुख यानी विषय-सुख की बड़ी प्यास लगी है। यह एक रूपक है। कहा जाता है कि जिस मनुष्य को साँप काटता है, उसे बहुत प्यास लगती है। वही मिसाल यहाँ दी गई है। उरु-तर्षा यानी बहुत प्यास। इसलिए हे भगवान्!समुद्धर –मेरा आप उद्धार करो। हे मन्त्र जाननेवाले, मन्त्रज्ञ महानुभाव! अपने अपवर्ग्यैः वचोभिः –मुक्तिदायी वचनों से मुझ पर सिंचन करो। ‘अपवर्ग’ यानी मुक्ति। हे महानुभाव! मुझे बचाओ। साँप के काटे हुए मनुष्य को मान्त्रिक मन्त्र से ठीक करते हैं और उस समय उस पर जल छिड़कते हैं। वही मिसाल यहाँ दी गयी है और भगवान् से कहा है कि आप अपने मुक्तिदायी वचनों से मुझ पर सिंचन करें। इन तीनों श्लोकों में अपने को बचाने के लिए भगवान् से प्रार्थना की गयी है और वैराग्य-ज्ञान-भक्ति की माँग भी की है। आगे के श्लोकों में भगवान् उद्धव के प्रश्नों के उत्तर देंगे।&lt;br /&gt;
(19.4)   नवैकादश पंच त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै।&lt;br /&gt;
ईक्षेताथैकमप्येषु तत् ज्ञानं मम निश्चितम् ।।&amp;lt;ref&amp;gt;11.19.14&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान् ज्ञान-वैराग्य समझा रहे हैं :येन ज्ञानेन ईक्षेत –जिस ज्ञान से हम देख सकेंगे। क्या देख सकेंगे?नवैकादश पंच त्रीन् भावान् भूतेषु –नौ अधिक ग्यारह, अधिक पाँच, अधिक तीन, यानी 28 मूलतत्व सब भूतों में भरे हुए हैं। ‘भाव’ यानी मूलतत्व। और ईक्षेत अथ एकमपि एषु –इन 28 मूलतत्वों में एक तत्व देखो। सारांश, अनन्त भूतों में 28 भाव हैं, यह ज्ञान जिससे होता है, उस ज्ञान को प्रथम जान लें। फिर उन 28 भावों में एव तत्व जान लें। तत् ज्ञानं मम निश्चितम् –इसी को मैं ज्ञान मानता हूँ। यह एक प्रक्रिया है। पहले अनन्त भावों को उबाल-उबालकर यानी ओटकर 28 भाव निकाले। फिर 28 भावों को ओटकर उसका एक तत्व बनाया। ये 28 भाव कौन-से हैं? सांख्यशास्त्रकारों ने 25 पदार्थ माने हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;प्रकृति, पुरुष, महतत्व, अहंकार और पंच तन्मात्राएँ (9), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और मन (11), पृथिवी आदि पंच भूत (5) तथा सत्व, रज, तम ये (3) गुण : 9+11+5+3=28 ।&amp;lt;/ref&amp;gt; उनमें तीन गुण जोड़ दिये तो 28 हो जाते हैं। सांख्यों ने तीन गुणों को प्रकृति में माना है, यहाँ उन्हें अलग गिना गया है। यह विषय मुझे शुष्क लगता है। मैंने पंचीकरण-प्रक्रिया की पढ़ी है।&amp;lt;ref&amp;gt;पंजीकरण’ वेदान्तशास्त्र की प्रसिद्ध सृष्टि-प्रक्रिया है। हमें दीखनेवाले पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश – ये पाँच स्थूल महाभूत कैसे बने, इसका स्पष्टीकरण करते हुए शास्त्र में बताया गया है कि मूलतः इनके पाँच बीजरूप होते हैं, जिन्हें ‘पंचतन्मात्राएँ’ या ‘सूक्ष्म भूत’ कहा जाता है। ये तन्मात्राएँ हैं :1. शब्द-तन्मात्रा, 2. स्पर्श-तन्मात्रा, 3. रूप-तन्मात्रा, 4. रस-तन्मात्रा और 5. गन्ध-तन्मात्रा। इन्हीं से स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं।	स्थूल भूत बनते समय पाँचों में एक-दूसरे के गुण या तत्व आ मिलते हैं। किस तरह? तो देखिये : पहले, पाँच सूक्ष्म भूतों (तन्मात्राओं) को दो हिस्सों में बाँट दें। फिर पहले पाँच हिस्सों के पुनः चार-चार हिस्से बना लें। बाद अपना हिस्सा छोड़ शेष चार भूतों के 4 चौथाई हिस्सों को जोड़ स्थूलभूत का ½भाग कर लें और उसमें अपने-अपने हिस्से का शेष आधा भाग जोड़ते जाएँ, तो पाँचों स्थूल महाभूत बन जाते हैं। इस पंचीकरण के कारण ही एक भूत में दूसरे भूत के गुण पाये जाने की उपपत्ति बैठ जाती है। - सं.&amp;lt;/ref&amp;gt; वह नीरस लगी। उसका आत्मज्ञान से कोई ताल्लुक नहीं। सृष्टि कैसे बनी, यह विज्ञान का विषय है। लेकिन जिन्होंने खोज की, उन्हें आत्मज्ञान तो नहीं हुआ था। रामदास स्वामी ने कहा है :&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;text-align:center&amp;quot;&amp;gt; प्रपंची पाहिजे सुवर्ण। परमार्थी पंचीकरण ।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्थात् प्रपंच में सुवर्ण चाहिए, पैसा चाहिए और परमार्थ में पंचीकरण विद्या चाहिए। पाँच महाभूत, पाँच विषय, चित्त के तत्व आदि का शास्त्र इस पंचीकरण-विद्या में आता है। मैंने अपने लिए इसमें यह परिवर्तन कर लिया है :&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;text-align:center&amp;quot;&amp;gt;प्रपंची पाहिजे अन्न। परमार्थी आत्मज्ञान ।।&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
उपनिषद् में भी ‘अनाज बढ़ाओ’ कहा है :'''अन्नं बहु कुर्यीत''' ।&lt;br /&gt;
लेकिन भगवान् ने भागवत के इस श्लोक में बड़ी कुशलतापूर्वक साधकों को निर्देश देते हुए कहा है कि ‘अनन्त का 28 करो और 28 का 1’रिड्यूस टु वन –एक तक आओ। अनन्त भेदों से 28 भेदों तक आये, तो काम कुछ आसान बना। फिर भी ये 28 बाकी रहने पर झमेला नहीं मिटेगा, क्योंकि ‘वन वर्ल्ड’ (एक जगत्) बनाना है। इसलिए भगवान् ने ज्ञानमार्ग निकाला और कहा कि ’28 का 1 बनाओ।’ जिस ज्ञान से उन 28 में ‘एक’ दीखे, तत् ज्ञानं मम निश्त्तिम् –उसे मैं निश्चित ज्ञान मानता हूँ। दूध की रबड़ी बनायी, फिर रबड़ी का मावा! मतलब मावा बनाने से है। फिर विज्ञान क्या है? भगवान् कहते हैं :&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भागवत धर्म सार}}&lt;br /&gt;
[[Category:भागवत धर्म सार]][[Category:कृष्ण कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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