<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://bharatkhoj.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0_-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%AC%E0%A4%BE_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-138</id>
	<title>भागवत धर्म सार -विनोबा भाग-138 - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bharatkhoj.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0_-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%AC%E0%A4%BE_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-138"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatkhoj.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0_-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%AC%E0%A4%BE_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-138&amp;action=history"/>
	<updated>2026-07-10T12:24:02Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://bharatkhoj.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0_-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%AC%E0%A4%BE_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-138&amp;diff=357411&amp;oldid=prev</id>
		<title>Bharatkhoj: '&lt;h4 style=&quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&quot;&gt;भागवत धर्म मिमांसा&lt;/h4&gt; &lt;h4 style=&quot;text-...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatkhoj.org/w/index.php?title=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%A4_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0_-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8B%E0%A4%AC%E0%A4%BE_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-138&amp;diff=357411&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2015-08-11T09:45:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;&amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;भागवत धर्म मिमांसा&amp;lt;/h4&amp;gt; &amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;भागवत धर्म मिमांसा&amp;lt;/h4&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;h4 style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;9. पारतन्त्र्य-मीमांसा&amp;lt;/h4&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;text-align:center&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
 (24.1)  गुणाः सृजन्ति कर्माणि गुणोऽनुसृजते गुणान् ।&lt;br /&gt;
जीवस्तु गुणसंयुक्तो भुंक्ते कर्मफलान्यसौ ।।&amp;lt;ref&amp;gt;11.10.31&amp;lt;/ref&amp;gt;	&lt;br /&gt;
(24.2)   यावत् स्याद् गुणवैषम्यं तावन्नानात्वमात्मनः ।&lt;br /&gt;
नानात्वमात्मनो यावत् पारतंत्र्यं तदैव हि ।।&amp;lt;ref&amp;gt;11.10.32&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्वातन्त्र्य-प्राप्ति के लिए क्या करना चाहिए? मन से ऊपर उठना चाहिए। उसके बिना स्वातत्र्य संभव नहीं। सारे झमेले मन के ही कारण खड़े होते हैं। शत्रु मित्र बनते हैं, वे भी मन के ही कारण। इसिलए मन से ऊपर उठना चाहिए। फिर भूतों का भी डर नहीं रहेगा। कहा जाता है कि सर्वत्र पारतन्त्र्य है। किस कारण? स्पष्ट है कि मन के कारण। मन से गुण पैदा होते हैं। मनो गुणान् वै सृजते बलीयः – बलवान् मन गुण पैदा करता है। फिर गुणों से विलक्षण कर्म बनते हैं और फिर उन कर्मों से सारी चीजें पैदा होती हैं, झमेला खड़ा होता है। इसलिए मन से अलग रहें। लेकिन मन से अलग होना कठिन जाता है। यदि वह आसानी से न सधे, तो क्या करें? गुणों से अलग हो जाएँ। आसान युक्ति बता दी। कर्म कौन पैदा करता है? गुण। गुण कर्म पैदा करता है और फिर कर्म के अनुसार एक गुण से अनेक गुण पैदा होते हैं। फिर उन गुणों से कर्म पैदा होते हैं और कर्म से गुण – यह चक्र चलता ही रहता है। इस तरह गुणों की सन्तति चालू होता है – अनसृजते। अनु का अर्थ है कर्मानुसारेण, गुणान् सजते। स तरह गुण-जाल बढ़ता ही जाता है। फिर जीवस्तु गुणसंयुक्तः – जीव गुण-संयुक्त बनता है। कर्म तो पैदा करता है गुण, लेकिन भोगता है यह बेवकूफ जीव! जीव मानता है कि ‘यह मैंने किया, वह मैंने किया।’ वास्तव में गुण ने कर्म किये, लेकिन जीव निष्कारण गुणसंयुक्त होकर कर्म भोगता है। जब तक यह गुण-वेषम्य यानी गुणों का चढ़ाव-उतार जारी रहेगा, तब तक आत्मा का नानात्व बना रहेगा। तब तक एक ही आत्मा अलग-अलग दीखेगा, आत्मा में भेद रहेगा। फिर किसी में कुछ गुण यानी विशेषता या कमी रही, तो उसी पर ध्यान जायेगा। जब तक इसमें यह गुण है, उसमें वह दोष है – इस ओर ध्यान जायेगा तब तक आत्मा में भेद रहेगा और तब तक पारतन्त्र्य भी स्थिर रहेगा। पारतन्त्र्य कब तक रहेगा? जब तक ‘पर’ रहेगा। स्वतन्त्र होने के लिए कहा जाता है कि ‘दूसरों का ताबा हटाओ!’ पर भागवत कहती है कि ‘दूसरा ही हटाओ!’ पारतन्त्र्य में लोग दूसरों का ताबा हटाना चाहते हैं, ‘पर’ को नहीं। लेकिन जब तक ‘पर’ नहीं हटता, तब तक कुछ नहीं बनेगा। दो राष्ट्रों में तब तक मित्रता नहीं बनेगी, जब तक ‘पर’ नहीं हटता। ‘पर’ हटेगा, तो विश्व एक बनेगा। आज सर्वत्र कोशिश चल रही है, अपने पर से दूसरों का ताबा हटाने की। इसी को ‘स्वातन्त्र्य’ कहा जाता है। भागवत कहती है, ताबा हटाने की क्या बात! ‘दूसरा’, यही चीज हटाओ। ‘पर’ को कायम रखना पारतन्त्र्य को ही कायम रखना है। जब तक आत्मा में भेद रहेगा, तब तक पारतन्त्र्य रहेगा। इस भेद को, ‘पर’ को हटाने के लिए क्या करना होगा? गुण-वैषम्य हटाना होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख क्रम |पिछला=भागवत धर्म सार -विनोबा भाग-137|अगला=भागवत धर्म सार -विनोबा भाग-139}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भागवत धर्म सार}}&lt;br /&gt;
[[Category:भागवत धर्म सार]][[Category:कृष्ण कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
	</entry>
</feed>