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	<title>मरियम मकानी - अवतरण इतिहास</title>
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		<updated>2015-09-27T12:29:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;{{लेख सूचना |पुस्तक नाम= हिन्दी विश्वकोश खन्ड - 9 |पृष्ठ ...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{लेख सूचना&lt;br /&gt;
|पुस्तक नाम= हिन्दी विश्वकोश खन्ड - 9&lt;br /&gt;
|पृष्ठ संख्या= 164&lt;br /&gt;
|भाषा= हिन्दी देवनागरी&lt;br /&gt;
|लेखक =  रेखा मिश्र&lt;br /&gt;
|संपादक= रामप्रसाद त्रिपाठी&lt;br /&gt;
|आलोचक=&lt;br /&gt;
|अनुवादक=&lt;br /&gt;
|प्रकाशक= नागरी मुद्रणा वाराणसी&lt;br /&gt;
|मुद्रक= नागरी मुद्रणा वाराणसी&lt;br /&gt;
|संस्करण= सन् 1967 ईसवी&lt;br /&gt;
|स्रोत=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध= भारतडिस्कवरी पुस्तकालय &lt;br /&gt;
|कॉपीराइट सूचना= नागरी मुद्र्णा वाराणसी&lt;br /&gt;
|टिप्पणी=&lt;br /&gt;
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|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन सूचना=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''मरियम मकानी''' मुगलकाल में काफी मात्रा में स्त्रियाँ इतिहास के पन्नों पर दृष्टिगोचर होती हैं। मध्य एशिया की परंपराओं का पालन करते हुए मुगल शासकों ने अपनी स्त्रियों को काफी स्वतंत्रता दी थी और उनके साथ मिलते जुलते थे। वैसे तो महल की सभी बेगमों और शाहजादियों का आदर एवं सत्कार होता था, परंतु उनमें से कुछ का सम्मान विशेष रूप से था। उन्हीं में से मरियम मकानी भी थीं जिनका वास्तविक नाम हमीदा बानू बेगम था। मरियम मकानी की पदवी उनके प्रति आदर की भावना प्रदर्शित करती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमीदा बानू बेगम का विवाह हुमायूँ बादशाह के साथ सन्‌ 1541  ई. में हुआ था। स्वभाव से वह बहुत ही दृढ़ संकल्पवाली तथा स्वाभिमानी प्रतीत होती है। विवाह के पश्चात्‌ उन्होंने अपने प्रभाव से बादशाह के हृदय को जीता। बेगम शिया थीं। अपनी बुद्धिमत्ता एवं सुव्यवहार के कारण उन्होंने फारस के शाह और उनकी बहन को भी प्रभावित किया जिसके फलस्वरूप उन्होंने बादशाह हूमायूँ की सहायता की। मरियम मकानी वीर एवं साहसी थीं। वह ऊँट, धोड़े इत्यादि पर भली भाँति सवार हो सकती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मरियम मकानी को शासनप्रबंध में भी दिलचस्पी थी। जब 1545 में कांधार विजय के बाद हुमायूँ काबुल की ओर रवाना हुआ। तो हमीदा बानू वहाँ बादशाह के प्रतिनिधि के रूप में सुरक्षा एवं देखभाल के लिये रह गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मरियम मकानी के जीवन का अधिकतर भाग उनके पुत्र अकबर के काल में व्यतीत हुआ। उनका प्रभाव पुत्र पर पड़ना स्वाभाविक ही था। कहा जाता है, अकबर का शिया धर्म के प्रति झुकाव बेगम के प्रभाव के ही कारण कुछ अंश में था। अकबर भी अपनी माँ का बहुत आदर एवं सत्कार करते थे और सदैव उनका स्वागत करने राजधानी से बाहर जाते थे। शाहजादे शाहजादियों के विवाह के उत्सव भी उन्हीं के महल में मनाए जाते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1599 ई. में जब अकबर दक्षिण की ओर जा रहे थे तो सलीम को अत्यधिक मद्यपान के कारण बादशाह के सम्मुख जाने की आज्ञा न दी गई। परंतु मरियम मकानी की प्रार्थना से उसे कोरनिश करने की आज्ञा मिल गई। जब सलीम ने 1601 में अपने पिता के विरुद्ध गद्दी प्राप्त करने के लिये विद्रोह कर दिया तो किसी का भी साहस शाहजादे के लिये क्षमा माँगने का न हुआ। अंत में मरियम मकानी तथा गुलबदन बेगम ने उसकी ओर से क्षमा माँगी और उन्हीं के प्रयत्न द्वारा बादशाह ने उसे क्षमा किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बादशाह जहाँगीर की आत्मकथा से ज्ञात होता है कि मरियम मकानी ने कई उद्यान भी लगवाए थे। बेगम को फरमान जारी करने का विशेष अधिकार भी प्राप्त था। उनके कुछ फरमान भी प्राप्त हैं जो उनके प्रभाव एवं महत्व को प्रदर्शित करते हैं। 1604 में उनका देहांत हुआ। &lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:मुग़ल साम्राज्य]][[Category:मध्य काल]][[Category:जीवनी साहित्य]][[Category:चरित कोश]][[Category:इतिहास कोश]][[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
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