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	<title>महाभारत द्रोणपर्व अध्याय 169 श्लोक 21-39 - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj ३ अगस्त २०१५ को ०५:१९ बजे</title>
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शिखण्डी ने उस समय अर्धचन्द्रकार बाण मारकर प्रत्यन्चा और बाणसहित कृपाचार्य के विशाल धनुष्ज्ञ को काट दिया। राजन्! तब कृपाचार्य ने कुपित होकर सोने के दण्ड और अप्रतिहत धारवाली तथा कारीगर के द्वारा साफ की हुई एक भयंकर शक्ति उसे ऊपर चलायी। अपने ऊपर आती हुई उस शक्ति को शिखण्डी ने बहुत से बाण मारकर काट दिया। वह अत्यन्त कान्तिमती एवं प्रकाशमान शक्ति खण्डित हो सब ओर प्रकाश बिखेरती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। महाराज! तब रथियों में श्रेष्ठ कृपाचार्य ने दूसरा धनुष हाथ में लेकर पैने बाणों द्वारा शिखण्डी को ढक दिया। समरभूमि में यशस्वी कृपाचार्य द्वारा बाणों से आच्छादित किया जाता हुआ रथियों में श्रेष्ठ शिखण्डी रथ के पिछले भाग में शिथिल होकर बैठ गया।  भरतनन्दन! युद्धस्थल में शिखण्डी को शिथिल हुआ देख शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य ने उस पर बहुत से बाणों का प्रहार किया, मानो वे उसे मार डालना चाहते हो। राजा द्रुपद के उस महारथी पुत्र को युद्धविमुख हुआ देख पान्चालों और सोमकों ने उसे चारों ओर से घेरकर अपने बीच में कर लिया। इसी प्रकार आपके पुत्रों ने भी विशाल सेना के साथ आकर द्विजश्रेष्ठ कृपाचार्य को अपने बीच में कर लिया। फिर दोनों दलों में घेर युद्ध होने लगा। राजन्! रणभूमि में परस्पर धावा करने वाले रथों की घर्घराहट का भयंकर शब्द मेघों की गर्जना के समान जान पड़ता था। प्रजापालक नरेश! चारों ओर एक दूसरे पर आक्रमण करने वाले घुड़सवारों और हाथी सवारों के संघर्ष से वह रणभूमि अत्यन्त दारूण प्रतीत होने लगी। महाराज! दौड़ते हुए पैदल सैनिकों के पैरों की धमक से यह पृथ्वी भयभीत अबला के समान काँपने लगी। राजन्! जैसे कौए दौड़-छौड़कर टिड्डियों को पकड़ते हैं, उसी प्रकार रथ पर बैठकर बडे़ वेग से धावा करने वाले बहुसंख्यक रथी शत्रुपक्ष के सैनिकों को दबोच लेते थे। भरतनन्दन! मदस्त्रावी विशाल हाथी मद की धारा बहाने वाले दूसरे गजराजों से सहसा भिड़कर एक दूसरे को यत्नपूर्वक काबू में कर लेते थे।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;प्रजानाथ! द्रोणाचार्य के साथ युद्ध की इच्छा वाले शिखण्डी का समरभूमि में सामना करने के लिये प्रयत्नशील हो शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य बडे़ वेग से आगे बढ़े। शत्रुओं को दमन करने वाले, द्रोण-रक्षक, गौतमगोत्रीय कृपाचार्य को शीघ्रतापूर्वक आते देख हँसते हुए से शिखण्डी ने उन्हें नौ भल्लों से बींध डाला। महाराज! तब आपके पुत्रों का प्रिय करने वाले कृपाचार्य ने शिखण्डी को पाँच बाणों से बींधकर फिर बीस बाणों से घायल कर दिया। पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम के अवसर पर शम्बरासुर और इन्द्र में जैसा युद्ध हुआ था, वैसा ही घोर भयानक एवं महान् युद्ध उन दोनों में भी हुआ। उन दोनों रणदुर्मद वीर महारथियों ने वर्षाकाल के दो मेघों के समान आकाश को बाणसमूहों से व्याप्त कर दिया। भरतश्रेष्ठ! स्वभाव से ही भयंकर दिखायी देने वाला आकाश उस समय और भी घोरतर हो उठा। युद्धभूमि में शोभा पाने वाले योद्धाओं के लिये वह घोर एवं भयानक रात्रि कालरात्रि के समान प्रतीत होती थी। महाराज! शिखण्डी ने उस समय अर्धचन्द्रकार बाण मारकर प्रत्यन्चा और बाणसहित कृपाचार्य के विशाल धनुष्ज्ञ को काट दिया। राजन्! तब कृपाचार्य ने कुपित होकर सोने के दण्ड और अप्रतिहत धारवाली तथा कारीगर के द्वारा साफ की हुई एक भयंकर शक्ति उसे ऊपर चलायी। अपने ऊपर आती हुई उस शक्ति को शिखण्डी ने बहुत से बाण मारकर काट दिया। वह अत्यन्त कान्तिमती एवं प्रकाशमान शक्ति खण्डित हो सब ओर प्रकाश बिखेरती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। महाराज! तब रथियों में श्रेष्ठ कृपाचार्य ने दूसरा धनुष हाथ में लेकर पैने बाणों द्वारा शिखण्डी को ढक दिया। समरभूमि में यशस्वी कृपाचार्य द्वारा बाणों से आच्छादित किया जाता हुआ रथियों में श्रेष्ठ शिखण्डी रथ के पिछले भाग में शिथिल होकर बैठ गया।  भरतनन्दन! 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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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		<title>Bharatkhoj: '==एकोनसप्तत्यधिकशततम (169) अध्याय: द्रोणपर्व (घटोत्‍कच...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;==एकोनसप्तत्यधिकशततम (169) अध्याय: द्रोणपर्व (घटोत्‍कच...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;==एकोनसप्तत्यधिकशततम (169) अध्याय: द्रोणपर्व (घटोत्‍कचवध पर्व )==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: द्रोणपर्व: एकोनसप्तत्यधिकशततम अध्याय: श्लोक 21-39 का हिन्दी अनुवाद&amp;lt;/div&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रजानाथ! द्रोणाचार्य के साथ युद्ध की इच्छा वाले शिखण्डी का समरभूमि में सामना करने के लिये प्रयत्नशील हो शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य बडे़ वेग से आगे बढ़े। शत्रुओं को दमन करने वाले, द्रोण-रक्षक, गौतमगोत्रीय कृपाचार्य को शीघ्रतापूर्वक आते देख हँसते हुए से शिखण्डी ने उन्हें नौ भल्लों से बींध डाला। महाराज! तब आपके पुत्रों का प्रिय करने वाले कृपाचार्य ने शिखण्डी को पाँच बाणों से बींधकर फिर बीस बाणों से घायल कर दिया। पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम के अवसर पर शम्बरासुर और इन्द्र में जैसा युद्ध हुआ था, वैसा ही घोर भयानक एवं महान् युद्ध उन दोनों में भी हुआ। उन दोनों रणदुर्मद वीर महारथियों ने वर्षाकाल के दो मेघों के समान आकाश को बाणसमूहों से व्याप्त कर दिया। भरतश्रेष्ठ! स्वभाव से ही भयंकर दिखायी देने वाला आकाश उस समय और भी घोरतर हो उठा। युद्धभूमि में शोभा पाने वाले योद्धाओं के लिये वह घोर एवं भयानक रात्रि कालरात्रि के समान प्रतीत होती थी। महाराज! शिखण्डी ने उस समय अर्धचन्द्रकार बाण मारकर प्रत्यन्चा और बाणसहित कृपाचार्य के विशाल धनुष्ज्ञ को काट दिया। राजन्! तब कृपाचार्य ने कुपित होकर सोने के दण्ड और अप्रतिहत धारवाली तथा कारीगर के द्वारा साफ की हुई एक भयंकर शक्ति उसे ऊपर चलायी। अपने ऊपर आती हुई उस शक्ति को शिखण्डी ने बहुत से बाण मारकर काट दिया। वह अत्यन्त कान्तिमती एवं प्रकाशमान शक्ति खण्डित हो सब ओर प्रकाश बिखेरती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। महाराज! तब रथियों में श्रेष्ठ कृपाचार्य ने दूसरा धनुष हाथ में लेकर पैने बाणों द्वारा शिखण्डी को ढक दिया। समरभूमि में यशस्वी कृपाचार्य द्वारा बाणों से आच्छादित किया जाता हुआ रथियों में श्रेष्ठ शिखण्डी रथ के पिछले भाग में शिथिल होकर बैठ गया।  भरतनन्दन! युद्धस्थल में शिखण्डी को शिथिल हुआ देख शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य ने उस पर बहुत से बाणों का प्रहार किया, मानो वे उसे मार डालना चाहते हो। राजा द्रुपद के उस महारथी पुत्र को युद्धविमुख हुआ देख पान्चालों और सोमकों ने उसे चारों ओर से घेरकर अपने बीच में कर लिया। इसी प्रकार आपके पुत्रों ने भी विशाल सेना के साथ आकर द्विजश्रेष्ठ कृपाचार्य को अपने बीच में कर लिया। फिर दोनों दलों में घेर युद्ध होने लगा। राजन्! रणभूमि में परस्पर धावा करने वाले रथों की घर्घराहट का भयंकर शब्द मेघों की गर्जना के समान जान पड़ता था। प्रजापालक नरेश! चारों ओर एक दूसरे पर आक्रमण करने वाले घुड़सवारों और हाथी सवारों के संघर्ष से वह रणभूमि अत्यन्त दारूण प्रतीत होने लगी। महाराज! दौड़ते हुए पैदल सैनिकों के पैरों की धमक से यह पृथ्वी भयभीत अबला के समान काँपने लगी। राजन्! जैसे कौए दौड़-छौड़कर टिड्डियों को पकड़ते हैं, उसी प्रकार रथ पर बैठकर बडे़ वेग से धावा करने वाले बहुसंख्यक रथी शत्रुपक्ष के सैनिकों को दबोच लेते थे। भरतनन्दन! मदस्त्रावी विशाल हाथी मद की धारा बहाने वाले दूसरे गजराजों से सहसा भिड़कर एक दूसरे को यत्नपूर्वक काबू में कर लेते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख क्रम |पिछला=महाभारत द्रोणपर्व अध्याय 169 श्लोक 1-20|महाभारत द्रोणपर्व अध्याय 169 श्लोक 40-50}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{सम्पूर्ण महाभारत}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:कृष्ण कोश]] [[Category:महाभारत]][[Category:महाभारत द्रोणपर्व]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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