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	<title>महाभारत सभा पर्व अध्याय 28 भाग 2 - अवतरण इतिहास</title>
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&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;==अष्टाविंश (28) अध्‍याय: सभा पर्व (दिग्विजय पर्व)==&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: सभा पर्व: अष्टाविंश अध्याय: 28 भाग 2 का हिन्दी अनुवाद &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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दूसरे मनुश्च मन से भी वहां नहीं पहुँच सकते। कितनी ही नदियाँ और वृक्ष उस शैल शिखर की शोभा बढ़ाते हैं। भाँति-भाँति के मनोहर पक्षी वहाँ कलख करते रहते हैं। ऐसे मनोहर मेरु गिरि को रेखकर उस समय अर्जुन को बड़ी प्रसन्नता हुई। मेरु के चारों ओर मण्डलाकार इलावृतवर्ष बसा हुआ है। मेरे के दक्षिण पार्श्व में जम्बू नाम का एक वृक्ष है, जो सदा फल और फूलों से भरा रहता है। सिद्ध और चारण उव वृक्ष का सेवन करते हैं। राजन्! उक्त जम्बू वृक्ष की शाखा ऊँचाई में स्वर्ग लोक तक फैली हुई है। उसी के नाम पर इस द्वीप को जम्बूद्वीप कहते हैं। शत्रुओं को संताप देने वाले सव्यसाची अर्जुन ने उस जम्बू वृक्ष को देखा। जम्बू और मेरुगिरि दोनों ही इस जगत में अनुपम हैं। उन्हें देखकर अर्जुन को बड़ी प्रसन्नता हुई। राजन! वहाँ सब ओर दृष्टिपात करते हुए अर्जुन सिद्धों और दिव्य चारणों से कई सहस्त्र रत्न, वस्त्र, आभूषण तथा अन्य बहत सी बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर उन सबसे विदा ले बड़े भाई के यज्ञ के उद्देश्य से बहुत से रत्नों का संग्रह करके वे वहाँ से जाने को उद्यत हुए। पर्वतश्रेष्ठ मेरु को अपने दाहिने करके अर्जुन जम्बूनदी के तट पर गये। वे उस श्रेष्ठ सरिता की शोभा देखना चाहते थे। वह मनोरम दिव्य नदी जल के रूप में जम्बूवृक्ष के फलों का स्वादिष्ट रस बहाती थी। सुनहरे पंखों वाले पक्षी उसका सेवन करते थे। वह नदी सुवर्णमय कमलों से भरी हुई थी। उनकी कीचड़ भी स्वर्णमय थी। उसके जल से भी सुवर्णमयी आभा छिटक रही थी। उस मंगलमयी नदी की बालु का भी सुवर्ण के चूर्ण सी शेभा पाती थी। कहीं-कहीं सुवर्णमय कमलों तथा स्वर्णमय पुष्पों से वह व्याप्त थी। कहीं सुनदर खिले हुए सवुर्णमय कुमुद और उत्पल छाये हुए थे। कहीं उसे नदी के तट पर सुन्दर फूलों से भरे हुए स्वर्णमय वृक्ष सब ओर फैले हुए थे। उस सुन्दर सरिता के घाटों पर सब और सोने की सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। निर्मल मणियों के समूह उसकी शोभा बढ़ाते थे। नृत्ये और गीत के मधुर शब्द उस प्रदेश को मुखरित कर रहे थे। उसके दोनों तटों पर सुनहरे और चमकीले चँदोवे तने थे, जिनके कारण जम्बू नदी की बड़ी शोभा हो रही थी। राजेन्द्र! ऐसी अदृष्टपूर्व नदी का दर्शन करके अर्जुन ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और वे मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए। उस नदी के तट पर बहुत से देवोपम अपनी स्त्रियों के साथ विचर रहे थे। उनक सौन्दर्य देखने ही योग्य था। वे सबके मन को मोह लेते थे। जम्बू नदी का जल ही उनका आहार था। वे सदा सुख और आनन्द में निमग्र हरने वाले तथा सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित थे। उस समय अर्जुन ने उनसे भी नाना प्रकार के रत्न प्राप्त किये। दिव्य जाम्बूनद नामक सुवर्ण और भाँति-भाँति के आभूषण आदि दुर्लभ वस्तुएँ पाकर अर्जुन वहाँ से पश्चिम दिशा की ओर चल दिये। उधर जाकर अर्जुन ने नागों द्वारा सुरक्षि प्रदेश पर विजय पायी। महाराज! वहाँ से और पश्चिम जाकर शक्तिशाली अर्जुन गन्धमादन पर्वत पर पहुँच गये और वहाँ के रहने वालों को जीतकर अपने अधीन बना लिया। राजन! इस प्रकार गन्धमादन पर्वत को लाँधकर अर्जुन रत्नों से सम्मन्न केतुमालवर्ष में गये, जो देवोपम पुरषों और सुन्दरी स्त्रियों की निवासभूमि है।&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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