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	<title>महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 13 - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj: '==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==  &lt;...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: सभा पर्व: अष्टात्रिंश अध्याय: भाग 13 का हिन्दी अनुवाद &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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उसका रेष्ठ राजभवन बहुत हीसुन्दर और सारा का सारा सुवर्णमय था। उसने अपने राज्य की आय को चार भागों में बाँट रखा था और इस विभाजन के अनुसार ही वह प्रजा का पालन करता था। वह उस आय के एक अंश के द्वारा सेनाका संग्रह और संरक्षण करता था, दूसरे आंश के द्वारा गृहस्थी का खर्च चलाता था तथा उसका जो तीसरा अंश था, उसके द्वारा राजा अर्जुन प्रजा जनों की भलाई के लिये यज्ञों का अनुष्ठान करता था। वह सबका विश्वासपात्र औरपरम कलयाणकारी था। वह राजकीय आय के चौथे अंश के द्वारागाँवों और जंगलों में डाकुओं और लुटेरों को शासन पूर्वक रोकता था। कृतवीर्यकुमार अर्जुन उसी धन को अच्छा मानता था, जिसे उसने अपने बल-पराक्रम द्वारा प्राप्त किया हो। काक या सूषकवृत्ति से जो लोग प्रजा के धन का अपहरण करते थे, उन सबको वह नष्ट कर देता था। उसके राज्य के भीतर गाँवों तथा नगरों में घर के दरवाजे बंद नहीं किये जाते थे। राजन! कार्तवीर्य अुर्जुन ही समूचे राष्ट्र का पोषक, स्त्रियों का संरक्षक, बकरियों की रक्षा करने वाला तथा गौओं का पालक था। वही जंगलों में मनुष्यों के खेतों की रक्षा करता था। यह है कार्तवीर्य का अद्भुत कार्य, जिसकी मनुष्यों से तुलना नहीं हो सकती है। न पहले का कोई राजा कार्तवीर्य की किसी महत्ता को प्राप्त कर सका और न भविष्य में ही काई प्राप्त कर सकेगा। वह जब समुद्र में चलता था, तब उसका वस्त्र नहीं भींगता था। राजा अर्जुन दत्तात्रेय जी के कृपा प्रसाद से लाखों वर्ष तक पृथ्वी पर शासन करते हुए इस प्रकार राज्य का पालन करता रहा। इस प्रकार उसने लोकहित के लिये बहुत से कार्य किये। भरतश्रेष्ठ! यह मैंने भगवान विष्णु के दत्तात्रेय नामक अवतार का वर्णन किया। भगवान का वह अवतार जामदग्न्य (परशुराम) के नाम से विख्यात है। उन्होंने किस लिये और कब भृगुकुल में अवतार ग्रहण किया, वह प्रसंग बतलाता हूँ, सुनो। महाराज युधिष्ठिर! महर्षि जमदग्नि के पुत्र परशुराम बड़े पराक्रमी हुए हैं। बलवानों में श्रेष्ठ परशुराम जी ने ही हैहयवंश का संहार किया था। महापराक्रमी कार्तवीर्य अर्जुन बल में अपना सानी नहीं रखता था, किंतु अपने अनुचित बर्ताव के कारण जमदग्निनन्दन परशुराम के द्वारा मारा गया। शत्रुसदन हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन रथ पर बैठा था, परंतु युद्ध में पराशुरामजी ने उसे नीचे गिराकर मार डाला। ये भगवान गोविन्द ही पराक्रम परशुराम रूप से भृगुवंश में अवतीर्ण हुए थे। ये ही जम्भासुर का मस्तक विदीर्ण करने वाले तथा शतदुन्दुभि के घातक है। इन्होंने सहस्त्रों विजय पाने वाले सहस्त्रबाहु अर्जुन का युद्ध में संहार करने के लिये ही अवतार लिया था। महायशस्वी परशुराम ने केवल धनुष की सहायता से सरस्वती नदी के तट पर एकत्रित हुए छ: लाख चालीस हजार क्षत्रियों पर विजय पायी थी। वे सभी क्षत्रिय ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले थे। उनका वध करते समय नरश्रेष्ठ परशुराम ने और भी चौदह हजार शूरवीरों का अन्त कर डाला। तदनन्तर शत्रुदमन राम ने दस हजार क्षत्रियों का और वध किया। इसके बाद उन्होंने हजारों वीरों को मूसल से मारकर यम लोक पहुँचा दिया तथा सहस्त्रों को फरसे से काट डाला। भृगुनन्दन परशुराम ने चौदह हजार क्षत्रियों को क्षण मात्र में मार गिराया तथा शेष ब्रह्मद्रोहियों का भी मूलोच्छेद करके स्नान किया।&lt;br /&gt;
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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