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	<title>महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 14 - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj: Text replace - &quot;बुद्धिमान् &quot; to &quot;बुद्धिमान &quot;</title>
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		<updated>2015-07-29T12:02:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;बुद्धिमान् &amp;quot; to &amp;quot;बुद्धिमान &amp;quot;&lt;/p&gt;
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				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;१२:०२, २९ जुलाई २०१५ का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l3&quot;&gt;पंक्ति ३:&lt;/td&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: सभा पर्व: अष्टात्रिंश अध्याय: भाग 14 का हिन्दी अनुवाद &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: सभा पर्व: अष्टात्रिंश अध्याय: भाग 14 का हिन्दी अनुवाद &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;क्षत्रियों से पीड़ित होकर ब्राह्मण ने ‘राम-राम’ कहकर आर्तनाद किया था, इसीलिये सर्वविजयी परशुराम ने पुन: फरसे से दस हजार क्षत्रियों का अन्त किया। जिस समय द्विजलोग भृगुनन्दन परशुराम! दौड़ो, बचाओ’ इत्यादि बातें कहकर करुणक्रन्दन करते, उस समय उन पीड़ितों द्वारा कही हुई वह आर्तवाणी परशुरामजी नही सहन कर सके। उन्होंने काश्मीर, दरद, कुन्तिभोज, क्षुद्रक, मालव, शक, चेदि, काशि, करूष, ऋषिक, क्रथ, कैशिक, अंग, वंग, कलिंग, मागध, काशी, कोसल, रात्रायण, वीतिहोत्र, किरात, तथा मार्तिकावत- इनको तथा अन्य सहस्त्रों राजेश्वरों को प्रत्येक देशमें तीखे बाणों से मारकर यमराज के भेंट कर दिया। मेरु और मन्दर पर्वत जिसके आभूषण हैं, वह पृथ्वी करोड़ों क्षत्रियों की लाशों से पट गयी। एक-दो बारनहीं, इक्कीस बार परशुराम ने यह पृथ्वी क्षत्रियों से सूनी कर दी। तदनन्तर महाबाहु परशुराम ने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञों का अनुष्ठान करके सौ वर्षों तक सौभ नामक विमान पर बैठे हुए राजा शाल्व के साथ युद्ध किया। भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तदनन्तर सुन्दर रथ पर बैठकर सौभ विमान के साथ युद्ध करने वाले शक्तिशाली वीर भृगुश्रेष्ठ परशुराम ने गीत गाती हुई नग्निका१ कुमारियों के मुख से यह सुना- ‘राम! राम! महाबाहो! तुम भृगुवंशी की कीर्ति बढ़ानेवाले हो, अपने सारे अस्त्र शस्त्र नीचे डाल दो। तुम सौभ विमान का नाश नहीं कर सकोगे। भयभीतों को अभय देने वाले चक्रधारी गदापाणि भगवान श्रीविष्णु प्रद्युम्न और साम्ब को साथ लेकर युद्ध में सौभ विमान का नाश करेंगे। यह सुनकर पुरुषसिंह परशुराम उसी समय वन को चल दिये। राजन्! वे महायशस्वी मुनि कृष्णावतार के समय की प्रतीक्षा करते हुए अपने सरे अस्त्र शस्त्र, रथ, कवच, आयुध बाण, परशु और धनुष जल में डालकर बड़ी भारी तपस्या में लग गये। शत्रुओं का नाश करनेाले धर्मात्मा परशुराम ने लज्जा, प्रज्ञा, श्री, कीर्ति ओर लक्ष्मी- इन पाँचों का आश्रय लेकर अपने पूर्वोक्त रथ को त्याग दिया। आदि काल में जिसकी प्रवृत्ति हुई थी, उस काल का विभाग करके भगवान परशुराम ने कुमारियों को बात पर श्रद्धा होने के कारण ही सौभ विमान का नाश नही किया, असमर्थता के कारण नहीं। जमदग्निनन्दन परशुराम के नाम से विख्यात वे महर्षि, जो विश्वविदित ऐश्वर्यशाली महर्षि हैं, वे इन्हीं श्रीकृष्ण के अंश है, जो इस समय तपस्या कर रहे हैं। राजन्! अब महात्मा भगवान विष्णु के साक्षात् स्वरूप श्रीराम के अवतार का वर्णन सुनो, जो विश्वामित्र मुनि को आगे करके चलने वाले थे। चैत्रमास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को अविनाशी भगवान महाबाहु विष्णु ने अपने आपको चार स्वरूपों में विभक्त करके महराज दशरथ के सकाश से अवतार ग्रहण किया था। वे भगवान सूर्य के समान तेजस्वी राजकुमार लोक में श्रीराम के नाम से विख्यात हुए। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! जगत को प्रसन्न करने तथा धर्म की स्थापना के लिये ही महायशस्वी सनातन भगवान विष्णु वहाँ प्रकट हुए थे। मनुष्यों के स्वामी भगवान श्रीराम को साक्षात् सर्वभूतपति श्रीहरि का ही स्वरूप बतलाया जाता है। भारत! उस समय विश्वामित्र के यज्ञ में विघ्र डालने के कारण राक्षस सुबाहु रीरामचन्द्र जी के हाथों मारा गया और मारीच नामक राक्षस को भी बड़ी चोट पहुँची। परम &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;बुद्धिमान् &lt;/del&gt;विश्वामित्र मुनि ने देवशत्रु राक्षसों का वध करने के कलये श्रीरामचन्द्र जी को ऐसे-ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनका निवारण करना देवताओं के लिये भी अत्यन्त कठिन था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;क्षत्रियों से पीड़ित होकर ब्राह्मण ने ‘राम-राम’ कहकर आर्तनाद किया था, इसीलिये सर्वविजयी परशुराम ने पुन: फरसे से दस हजार क्षत्रियों का अन्त किया। जिस समय द्विजलोग भृगुनन्दन परशुराम! 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वे महायशस्वी मुनि कृष्णावतार के समय की प्रतीक्षा करते हुए अपने सरे अस्त्र शस्त्र, रथ, कवच, आयुध बाण, परशु और धनुष जल में डालकर बड़ी भारी तपस्या में लग गये। शत्रुओं का नाश करनेाले धर्मात्मा परशुराम ने लज्जा, प्रज्ञा, श्री, कीर्ति ओर लक्ष्मी- इन पाँचों का आश्रय लेकर अपने पूर्वोक्त रथ को त्याग दिया। आदि काल में जिसकी प्रवृत्ति हुई थी, उस काल का विभाग करके भगवान परशुराम ने कुमारियों को बात पर श्रद्धा होने के कारण ही सौभ विमान का नाश नही किया, असमर्थता के कारण नहीं। जमदग्निनन्दन परशुराम के नाम से विख्यात वे महर्षि, जो विश्वविदित ऐश्वर्यशाली महर्षि हैं, वे इन्हीं श्रीकृष्ण के अंश है, जो इस समय तपस्या कर रहे हैं। राजन्! अब महात्मा भगवान विष्णु के साक्षात् स्वरूप श्रीराम के अवतार का वर्णन सुनो, जो विश्वामित्र मुनि को आगे करके चलने वाले थे। चैत्रमास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को अविनाशी भगवान महाबाहु विष्णु ने अपने आपको चार स्वरूपों में विभक्त करके महराज दशरथ के सकाश से अवतार ग्रहण किया था। वे भगवान सूर्य के समान तेजस्वी राजकुमार लोक में श्रीराम के नाम से विख्यात हुए। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! जगत को प्रसन्न करने तथा धर्म की स्थापना के लिये ही महायशस्वी सनातन भगवान विष्णु वहाँ प्रकट हुए थे। मनुष्यों के स्वामी भगवान श्रीराम को साक्षात् सर्वभूतपति श्रीहरि का ही स्वरूप बतलाया जाता है। भारत! उस समय विश्वामित्र के यज्ञ में विघ्र डालने के कारण राक्षस सुबाहु रीरामचन्द्र जी के हाथों मारा गया और मारीच नामक राक्षस को भी बड़ी चोट पहुँची। परम &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;बुद्धिमान &lt;/ins&gt;विश्वामित्र मुनि ने देवशत्रु राक्षसों का वध करने के कलये श्रीरामचन्द्र जी को ऐसे-ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनका निवारण करना देवताओं के लिये भी अत्यन्त कठिन था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{लेख क्रम |पिछला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 13|अगला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 15}}&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{लेख क्रम |पिछला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 13|अगला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 15}}&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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		<title>Bharatkhoj: '==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==  &lt;...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2015-07-25T05:08:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==  &amp;lt;...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: सभा पर्व: अष्टात्रिंश अध्याय: भाग 14 का हिन्दी अनुवाद &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षत्रियों से पीड़ित होकर ब्राह्मण ने ‘राम-राम’ कहकर आर्तनाद किया था, इसीलिये सर्वविजयी परशुराम ने पुन: फरसे से दस हजार क्षत्रियों का अन्त किया। जिस समय द्विजलोग भृगुनन्दन परशुराम! दौड़ो, बचाओ’ इत्यादि बातें कहकर करुणक्रन्दन करते, उस समय उन पीड़ितों द्वारा कही हुई वह आर्तवाणी परशुरामजी नही सहन कर सके। उन्होंने काश्मीर, दरद, कुन्तिभोज, क्षुद्रक, मालव, शक, चेदि, काशि, करूष, ऋषिक, क्रथ, कैशिक, अंग, वंग, कलिंग, मागध, काशी, कोसल, रात्रायण, वीतिहोत्र, किरात, तथा मार्तिकावत- इनको तथा अन्य सहस्त्रों राजेश्वरों को प्रत्येक देशमें तीखे बाणों से मारकर यमराज के भेंट कर दिया। मेरु और मन्दर पर्वत जिसके आभूषण हैं, वह पृथ्वी करोड़ों क्षत्रियों की लाशों से पट गयी। एक-दो बारनहीं, इक्कीस बार परशुराम ने यह पृथ्वी क्षत्रियों से सूनी कर दी। तदनन्तर महाबाहु परशुराम ने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञों का अनुष्ठान करके सौ वर्षों तक सौभ नामक विमान पर बैठे हुए राजा शाल्व के साथ युद्ध किया। भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तदनन्तर सुन्दर रथ पर बैठकर सौभ विमान के साथ युद्ध करने वाले शक्तिशाली वीर भृगुश्रेष्ठ परशुराम ने गीत गाती हुई नग्निका१ कुमारियों के मुख से यह सुना- ‘राम! राम! महाबाहो! तुम भृगुवंशी की कीर्ति बढ़ानेवाले हो, अपने सारे अस्त्र शस्त्र नीचे डाल दो। तुम सौभ विमान का नाश नहीं कर सकोगे। भयभीतों को अभय देने वाले चक्रधारी गदापाणि भगवान श्रीविष्णु प्रद्युम्न और साम्ब को साथ लेकर युद्ध में सौभ विमान का नाश करेंगे। यह सुनकर पुरुषसिंह परशुराम उसी समय वन को चल दिये। राजन्! वे महायशस्वी मुनि कृष्णावतार के समय की प्रतीक्षा करते हुए अपने सरे अस्त्र शस्त्र, रथ, कवच, आयुध बाण, परशु और धनुष जल में डालकर बड़ी भारी तपस्या में लग गये। शत्रुओं का नाश करनेाले धर्मात्मा परशुराम ने लज्जा, प्रज्ञा, श्री, कीर्ति ओर लक्ष्मी- इन पाँचों का आश्रय लेकर अपने पूर्वोक्त रथ को त्याग दिया। आदि काल में जिसकी प्रवृत्ति हुई थी, उस काल का विभाग करके भगवान परशुराम ने कुमारियों को बात पर श्रद्धा होने के कारण ही सौभ विमान का नाश नही किया, असमर्थता के कारण नहीं। जमदग्निनन्दन परशुराम के नाम से विख्यात वे महर्षि, जो विश्वविदित ऐश्वर्यशाली महर्षि हैं, वे इन्हीं श्रीकृष्ण के अंश है, जो इस समय तपस्या कर रहे हैं। राजन्! अब महात्मा भगवान विष्णु के साक्षात् स्वरूप श्रीराम के अवतार का वर्णन सुनो, जो विश्वामित्र मुनि को आगे करके चलने वाले थे। चैत्रमास के शुक्लपक्ष की नवमी तिथि को अविनाशी भगवान महाबाहु विष्णु ने अपने आपको चार स्वरूपों में विभक्त करके महराज दशरथ के सकाश से अवतार ग्रहण किया था। वे भगवान सूर्य के समान तेजस्वी राजकुमार लोक में श्रीराम के नाम से विख्यात हुए। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! जगत को प्रसन्न करने तथा धर्म की स्थापना के लिये ही महायशस्वी सनातन भगवान विष्णु वहाँ प्रकट हुए थे। मनुष्यों के स्वामी भगवान श्रीराम को साक्षात् सर्वभूतपति श्रीहरि का ही स्वरूप बतलाया जाता है। भारत! उस समय विश्वामित्र के यज्ञ में विघ्र डालने के कारण राक्षस सुबाहु रीरामचन्द्र जी के हाथों मारा गया और मारीच नामक राक्षस को भी बड़ी चोट पहुँची। परम बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनि ने देवशत्रु राक्षसों का वध करने के कलये श्रीरामचन्द्र जी को ऐसे-ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनका निवारण करना देवताओं के लिये भी अत्यन्त कठिन था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख क्रम |पिछला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 13|अगला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 15}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{सम्पूर्ण महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[Category:कृष्ण कोश]] [[Category:महाभारत]][[Category:महाभारत सभा पर्व]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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