<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="hi">
	<id>https://bharatkhoj.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF_38_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_21</id>
	<title>महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 21 - अवतरण इतिहास</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://bharatkhoj.org/w/index.php?action=history&amp;feed=atom&amp;title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF_38_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_21"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatkhoj.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF_38_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_21&amp;action=history"/>
	<updated>2026-06-02T21:00:00Z</updated>
	<subtitle>विकि पर उपलब्ध इस पृष्ठ का अवतरण इतिहास</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.41.1</generator>
	<entry>
		<id>https://bharatkhoj.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF_38_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_21&amp;diff=353859&amp;oldid=prev</id>
		<title>Bharatkhoj: Text replace - &quot;भगवान् &quot; to &quot;भगवान  &quot;</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatkhoj.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF_38_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_21&amp;diff=353859&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2015-07-29T12:26:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;भगवान् &amp;quot; to &amp;quot;भगवान  &amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;table style=&quot;background-color: #fff; color: #202122;&quot; data-mw=&quot;interface&quot;&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-marker&quot; /&gt;
				&lt;col class=&quot;diff-content&quot; /&gt;
				&lt;tr class=&quot;diff-title&quot; lang=&quot;hi&quot;&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;← पुराना अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;td colspan=&quot;2&quot; style=&quot;background-color: #fff; color: #202122; text-align: center;&quot;&gt;१२:२६, २९ जुलाई २०१५ का अवतरण&lt;/td&gt;
				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l4&quot;&gt;पंक्ति ४:&lt;/td&gt;
&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot;&gt;पंक्ति ४:&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;युधिष्ठिर! उस समय श्रीकृष्ण ने कंस के मन में भारी भय उत्पन्न कर दिया। हाथियों में श्रेष्ठ कुवलयापीड को, जो ऐरावत कुल में उत्पन्न हुआ था और श्रीकृष्ण को कुचल देना चाहता था, श्रीकृष्ण ने कंस के देखते-देखते ही मार गिराया। फिर शत्रुनाशन श्रीकृष्ण ने सब लोगों के सामने ही कंस को मारकर उग्रसेन को राजपद पर अभिषिक्त कर दिया और अपने माता-पिता देवकी वसुदेव के चरणों में प्रणाम किया।  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;युधिष्ठिर! उस समय श्रीकृष्ण ने कंस के मन में भारी भय उत्पन्न कर दिया। हाथियों में श्रेष्ठ कुवलयापीड को, जो ऐरावत कुल में उत्पन्न हुआ था और श्रीकृष्ण को कुचल देना चाहता था, श्रीकृष्ण ने कंस के देखते-देखते ही मार गिराया। फिर शत्रुनाशन श्रीकृष्ण ने सब लोगों के सामने ही कंस को मारकर उग्रसेन को राजपद पर अभिषिक्त कर दिया और अपने माता-पिता देवकी वसुदेव के चरणों में प्रणाम किया।  &lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस प्रकार जनार्दन ने कितने ही अद्भुत कार्य किये और कुछ दिनों तक बलरामजी के साथ वे मथुरा में रहे। तात युघिष्ठिर! तदनन्तर वे दोनों धर्मज्ञ भाई गुरु सान्दीपनि के यहाँ (उज्जयिनीपुरी में) विद्याध्ययन के लिये गये। वहाँ वे गुरुसेवा परायण हो सदा धर्म के ही अनुष्ठान में लगे रहे। वे दोनों महात्मा कठोर व्रत का पालन करते हुए वहाँ रहते थे। उन्होंने चौंसठ दिन रात में ही छहों अंगों सहित सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इतना ही नहीं, उनयदुकुल कुमारों ने लेख्य (चित्रकला), गणित, गान्धर्ववेद तथा सारे वैद्यको भी उतने ही समय के भीतर जान लिया। गजशिक्षा तथा अश्वशिक्षा को तो उन्होंने कुछ बारह दिनों में ही प्राप्त कर लिया। इसके बाद वे दोनों धर्मज्ञ एवं धर्मपरायण वीर धनुर्वेद सीखने के लिये पुन: सान्दीपनि मुनि के पास गये। राजन्! धनुर्वेद के श्रेष्ठ आचार्य सान्दीपनि के पास जाकर उन दोनों ने प्रणाम किया। सान्दीपनि ने उन्हें सत्कार पूर्वक अपनाया एवं वे फिर अवन्ती में विचरते हुए वहाँ रहने लगे। पचास दिन रात में ही उन दोनों ने दस अंगों से युक्त, सुप्रतिष्ठित एवं रहस्य सहित सम्पूर्ण धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उन दोनों भाईयों को अस्त्र विद्या में निपुण देखकर विप्रवर सान्दीपनि ने उन्हें गुरुदक्षिणा देने की आज्ञा दी। सान्दीपनि जी सब विष्यों के विद्वान् थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से अपने अभीष्ठ मनोरथ की याचना इस प्रकार की। सान्दीपनिजी बोले- मेरा पुत्र इस समुद्र में नहा रहा था, उस समय ‘तिमि’ नामक जलजन्तु उसे पकड़ कर भीतर ले गया और उसके शरीर को खा गया। तुम दोनों का भला हो। मेरे उस मरे हुए पुत्र को जीवित करके यहाँ ला दो। भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! इतना कहते-कहते गुरु सान्दीपनि पुत्र शोक से आर्त हो गये। यद्यपि उनकी माँग बहुत कठिन थीं, तीनों लोकों में दूसरे किसी पुरुष के लिये इस कार्य का साधन करना असम्भव था, तो भी श्रीकृष्ण ने उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कर ली। भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपनि के पुत्र को मारा था, उस असुर को उन दोनों भाइयों ने युद्ध करके समुद्र में मार गिरया। तदनन्तर अमिततेजस्वी भगवान श्रीकृष्ण के कृपा प्रसाद से सान्दीपनि का पुत्र, जो दीर्घकालसे यमलोक में जा चुका था, पुन: पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा। वह अशक्य, अचिन्तय और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। बलराम और श्रीकृष्ण ने अपने गुरु को सब प्रकार के ऐश्वर्य, गाय, घोड़े और प्रचुर धन सब कुछ दिये। तत्पश्चात गुरुपुत्र को लेकर भगवान ने गुरुजी को सौंप दिया। उस पुत्र को आया देख सान्दीपनि के नगर के लोग यह मान गये कि श्रीकृष्ण के द्वारा यह ऐसा कार्य सम्पन्न हुआ है, जो अन्य सब लोगों के लिये असम्भव और अचिन्तय है। &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;भगवान् &lt;/del&gt;नारायण के सिवा दूसरा कोैन ऐसा पुरुष है, जो इस अद्भुत कार्य को सोचा भी सके (करना तो दूर की बात है)।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;इस प्रकार जनार्दन ने कितने ही अद्भुत कार्य किये और कुछ दिनों तक बलरामजी के साथ वे मथुरा में रहे। तात युघिष्ठिर! तदनन्तर वे दोनों धर्मज्ञ भाई गुरु सान्दीपनि के यहाँ (उज्जयिनीपुरी में) विद्याध्ययन के लिये गये। वहाँ वे गुरुसेवा परायण हो सदा धर्म के ही अनुष्ठान में लगे रहे। वे दोनों महात्मा कठोर व्रत का पालन करते हुए वहाँ रहते थे। उन्होंने चौंसठ दिन रात में ही छहों अंगों सहित सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इतना ही नहीं, उनयदुकुल कुमारों ने लेख्य (चित्रकला), गणित, गान्धर्ववेद तथा सारे वैद्यको भी उतने ही समय के भीतर जान लिया। गजशिक्षा तथा अश्वशिक्षा को तो उन्होंने कुछ बारह दिनों में ही प्राप्त कर लिया। इसके बाद वे दोनों धर्मज्ञ एवं धर्मपरायण वीर धनुर्वेद सीखने के लिये पुन: सान्दीपनि मुनि के पास गये। राजन्! धनुर्वेद के श्रेष्ठ आचार्य सान्दीपनि के पास जाकर उन दोनों ने प्रणाम किया। सान्दीपनि ने उन्हें सत्कार पूर्वक अपनाया एवं वे फिर अवन्ती में विचरते हुए वहाँ रहने लगे। पचास दिन रात में ही उन दोनों ने दस अंगों से युक्त, सुप्रतिष्ठित एवं रहस्य सहित सम्पूर्ण धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उन दोनों भाईयों को अस्त्र विद्या में निपुण देखकर विप्रवर सान्दीपनि ने उन्हें गुरुदक्षिणा देने की आज्ञा दी। सान्दीपनि जी सब विष्यों के विद्वान् थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से अपने अभीष्ठ मनोरथ की याचना इस प्रकार की। सान्दीपनिजी बोले- मेरा पुत्र इस समुद्र में नहा रहा था, उस समय ‘तिमि’ नामक जलजन्तु उसे पकड़ कर भीतर ले गया और उसके शरीर को खा गया। तुम दोनों का भला हो। मेरे उस मरे हुए पुत्र को जीवित करके यहाँ ला दो। भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! इतना कहते-कहते गुरु सान्दीपनि पुत्र शोक से आर्त हो गये। यद्यपि उनकी माँग बहुत कठिन थीं, तीनों लोकों में दूसरे किसी पुरुष के लिये इस कार्य का साधन करना असम्भव था, तो भी श्रीकृष्ण ने उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कर ली। भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपनि के पुत्र को मारा था, उस असुर को उन दोनों भाइयों ने युद्ध करके समुद्र में मार गिरया। तदनन्तर अमिततेजस्वी भगवान श्रीकृष्ण के कृपा प्रसाद से सान्दीपनि का पुत्र, जो दीर्घकालसे यमलोक में जा चुका था, पुन: पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा। वह अशक्य, अचिन्तय और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। बलराम और श्रीकृष्ण ने अपने गुरु को सब प्रकार के ऐश्वर्य, गाय, घोड़े और प्रचुर धन सब कुछ दिये। तत्पश्चात गुरुपुत्र को लेकर भगवान ने गुरुजी को सौंप दिया। उस पुत्र को आया देख सान्दीपनि के नगर के लोग यह मान गये कि श्रीकृष्ण के द्वारा यह ऐसा कार्य सम्पन्न हुआ है, जो अन्य सब लोगों के लिये असम्भव और अचिन्तय है। &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;भगवान  &lt;/ins&gt;नारायण के सिवा दूसरा कोैन ऐसा पुरुष है, जो इस अद्भुत कार्य को सोचा भी सके (करना तो दूर की बात है)।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{लेख क्रम |पिछला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 20|अगला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 22}}&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;{{लेख क्रम |पिछला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 20|अगला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 22}}&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;/table&gt;</summary>
		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatkhoj.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF_38_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_21&amp;diff=351266&amp;oldid=prev</id>
		<title>Bharatkhoj: '==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==  &lt;...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatkhoj.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5_%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF_38_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97_21&amp;diff=351266&amp;oldid=prev"/>
		<updated>2015-07-25T05:38:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==  &amp;lt;...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: सभा पर्व: अष्टात्रिंश अध्याय: भाग 21 का हिन्दी अनुवाद &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युधिष्ठिर! उस समय श्रीकृष्ण ने कंस के मन में भारी भय उत्पन्न कर दिया। हाथियों में श्रेष्ठ कुवलयापीड को, जो ऐरावत कुल में उत्पन्न हुआ था और श्रीकृष्ण को कुचल देना चाहता था, श्रीकृष्ण ने कंस के देखते-देखते ही मार गिराया। फिर शत्रुनाशन श्रीकृष्ण ने सब लोगों के सामने ही कंस को मारकर उग्रसेन को राजपद पर अभिषिक्त कर दिया और अपने माता-पिता देवकी वसुदेव के चरणों में प्रणाम किया। &lt;br /&gt;
इस प्रकार जनार्दन ने कितने ही अद्भुत कार्य किये और कुछ दिनों तक बलरामजी के साथ वे मथुरा में रहे। तात युघिष्ठिर! तदनन्तर वे दोनों धर्मज्ञ भाई गुरु सान्दीपनि के यहाँ (उज्जयिनीपुरी में) विद्याध्ययन के लिये गये। वहाँ वे गुरुसेवा परायण हो सदा धर्म के ही अनुष्ठान में लगे रहे। वे दोनों महात्मा कठोर व्रत का पालन करते हुए वहाँ रहते थे। उन्होंने चौंसठ दिन रात में ही छहों अंगों सहित सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इतना ही नहीं, उनयदुकुल कुमारों ने लेख्य (चित्रकला), गणित, गान्धर्ववेद तथा सारे वैद्यको भी उतने ही समय के भीतर जान लिया। गजशिक्षा तथा अश्वशिक्षा को तो उन्होंने कुछ बारह दिनों में ही प्राप्त कर लिया। इसके बाद वे दोनों धर्मज्ञ एवं धर्मपरायण वीर धनुर्वेद सीखने के लिये पुन: सान्दीपनि मुनि के पास गये। राजन्! धनुर्वेद के श्रेष्ठ आचार्य सान्दीपनि के पास जाकर उन दोनों ने प्रणाम किया। सान्दीपनि ने उन्हें सत्कार पूर्वक अपनाया एवं वे फिर अवन्ती में विचरते हुए वहाँ रहने लगे। पचास दिन रात में ही उन दोनों ने दस अंगों से युक्त, सुप्रतिष्ठित एवं रहस्य सहित सम्पूर्ण धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर लिया। उन दोनों भाईयों को अस्त्र विद्या में निपुण देखकर विप्रवर सान्दीपनि ने उन्हें गुरुदक्षिणा देने की आज्ञा दी। सान्दीपनि जी सब विष्यों के विद्वान् थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से अपने अभीष्ठ मनोरथ की याचना इस प्रकार की। सान्दीपनिजी बोले- मेरा पुत्र इस समुद्र में नहा रहा था, उस समय ‘तिमि’ नामक जलजन्तु उसे पकड़ कर भीतर ले गया और उसके शरीर को खा गया। तुम दोनों का भला हो। मेरे उस मरे हुए पुत्र को जीवित करके यहाँ ला दो। भीष्मजी कहते हैं- युधिष्ठिर! इतना कहते-कहते गुरु सान्दीपनि पुत्र शोक से आर्त हो गये। यद्यपि उनकी माँग बहुत कठिन थीं, तीनों लोकों में दूसरे किसी पुरुष के लिये इस कार्य का साधन करना असम्भव था, तो भी श्रीकृष्ण ने उसे पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कर ली। भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपनि के पुत्र को मारा था, उस असुर को उन दोनों भाइयों ने युद्ध करके समुद्र में मार गिरया। तदनन्तर अमिततेजस्वी भगवान श्रीकृष्ण के कृपा प्रसाद से सान्दीपनि का पुत्र, जो दीर्घकालसे यमलोक में जा चुका था, पुन: पूर्ववत् शरीर धारण करके जी उठा। वह अशक्य, अचिन्तय और अत्यन्त अद्भुत कार्य देखकर सभी प्राणियों को बड़ा आश्चर्य हुआ। बलराम और श्रीकृष्ण ने अपने गुरु को सब प्रकार के ऐश्वर्य, गाय, घोड़े और प्रचुर धन सब कुछ दिये। तत्पश्चात गुरुपुत्र को लेकर भगवान ने गुरुजी को सौंप दिया। उस पुत्र को आया देख सान्दीपनि के नगर के लोग यह मान गये कि श्रीकृष्ण के द्वारा यह ऐसा कार्य सम्पन्न हुआ है, जो अन्य सब लोगों के लिये असम्भव और अचिन्तय है। भगवान् नारायण के सिवा दूसरा कोैन ऐसा पुरुष है, जो इस अद्भुत कार्य को सोचा भी सके (करना तो दूर की बात है)।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख क्रम |पिछला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 20|अगला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 22}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{सम्पूर्ण महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[Category:कृष्ण कोश]] [[Category:महाभारत]][[Category:महाभारत सभा पर्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
	</entry>
</feed>