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	<title>महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 37 - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj: Text replace - &quot;भगवान् &quot; to &quot;भगवान  &quot;</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;भगवान् &amp;quot; to &amp;quot;भगवान  &amp;quot;&lt;/p&gt;
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				&lt;/tr&gt;&lt;tr&gt;&lt;td colspan=&quot;2&quot; class=&quot;diff-lineno&quot; id=&quot;mw-diff-left-l3&quot;&gt;पंक्ति ३:&lt;/td&gt;
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&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: सभा पर्व: अष्टात्रिंश अध्याय: भाग 37 का हिन्दी अनुवाद &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: सभा पर्व: अष्टात्रिंश अध्याय: भाग 37 का हिन्दी अनुवाद &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;br&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
&lt;tr&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;−&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #ffe49c; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उसमें स्थान स्थान पर उद्यान और बन शोभा पा रहे थे। वह नगरी नृत्य और गीतों से सुशोभित थी। वहाँ अनेक सुन्दर फाटक बने थे। सब और भाँति भाँति के पक्षी चहचहाते थे। कमलों से भरी हुई पुष्करिणी उस पुरी की शोभा बढ़ाती थी। उसमें ह्रष्ट-पुष्ट स्त्री पुरुष निवास करते थे और वह पुरी स्वर्ग के समान मनोहर दिखायी देती थी। प्रसन्नता से भरी हुई उसे सुवर्णमयी नगरी को देखकर रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न तीनों को बड़ा विस्मय हुआ। बाणासुर की राजधानी में कितने ही देवता सदा द्वार पर बैठकर पहरा देते थे। राजन्! भगवान शंकर, कार्तिकेय, भद्रकालीदेवी और अग्रि ये देवता सदा उन पुरीकी रक्षा करते थे। युधिष्ठिर! शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले महातेजस्व्ी श्रीकृष्ण ने अत्यन्त कुपित हो पूर्व द्वार के रक्षकों को बलपूर्वक जीत कर भगवान शंकर के द्वारा सुरक्षित उत्तर द्वार पर आक्रमण किया। वहाँ महान् तेजस्वी भगवान महेश्वर हाथ में त्रिशूल लिये खड़े थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण मुँह बाये काल की भांति आ रहे हैं, तब वे महाबाहु महेश्वर बाणासुर के हित साधन की इच्छा से बाण सहित पिनाक नामक धनुष हाथ में लेकर श्रीकृष्ण के सम्मुख आये। तदनन्तर भगवान वासुदेव और महेश्वर परस्पर युद्ध करने लगे। उनका वह युद्ध अचिन्त्य, रोमांचकारी तथा भयंकर था। वे दोनों देवता एक दूसरे पर विजय पाने की इच्छा से परस्पर प्रहार करने लगे। दोनों ही क्रोध में भरकर एक दूसरे पर दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते थे। तदनन्तर भगवान श्रीकृष्ण ने शूलपाणि भगवान शंकर के साथ दो घड़ी तक युद्ध करके महादेवजी को जीत लिया तथा द्वार पर खड़े हुए अन्य शिवगणों को भी परास्त करके उस उत्तम नगर में प्रवेश किया। पाण्डुनन्दन! पुरी में प्रवेश करके अत्यन्त क्रोध में भरे हुए श्रीजनार्दन ने बाणासुर के पास पहुँचकर उसके साथ युद्ध छेड़ दिया। भरतश्रेष्ठ! बाणासुर भी क्रोध से आग बबूला हो रहा था। उसने भी युद्ध में भगवान केशव पर सभी तीखे-तीखे अस्त्र शस्त्र चलाये। फिर उसने उद्योगपर्वूक अपनी सभी भुजाओं से उस समरांगण में कुपित हो श्रीकृष्ण पर सहस्त्रों शस्त्रों का प्रहार किया। भारत! परंतु श्रीकृष्ण ने वे सभी शस्त्र काट डाले। राजन्! तदनन्तर &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;भगवान् &lt;/del&gt;अधोक्षज ने दो घड़ी तक बाणासुर के साथ युद्ध करके अपना दिव्य उत्तम शस्त्र चक्र हाथ में उठाया और अमित तेजस्वी बाणासुर की सहस्त्र भुजाओं को काट दिया। महाराज! तब श्रीकृष्ण द्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर बाणासुर भुजाएँ कट जाने पर शाखाहीन वृक्ष की भांति धरती पर गिर पड़ा। इस प्रकार बलिपुत्र बाणासुर को रणभूमि में गिराकर श्रीकृष्ण ने बड़ी उतावली के साथ कैद में पड़े हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध को छुड़ा लिया। पत्नी सहित अनिरुद्ध को छुड़ाकर भगवान गोविन्छ ने बाणासुर के सभी प्रकार के असंख्य रत्न हर लिये। उसके घर में जो भी गोधन अथवा अन्य किसी प्रकार के धन मौजूद थे, उन सबको भी यहुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले भगवान ह्रषीकेश ने हर लिया। फिर वे सब रत्न लेकर मधुसूदन ने शीघ्रतापूर्वक रख लिये। कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात उन्होंने महाबली बलदेव, अमितपराक्रमी प्रद्युम्न, परम कान्तिमान अनिरुद्ध तथा सेवकों और दासियों सहित सुन्दरी उषा- इन सबको और नाना प्रकार के रत्नों को भी गरुड़ पर चढ़ाया।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;उसमें स्थान स्थान पर उद्यान और बन शोभा पा रहे थे। वह नगरी नृत्य और गीतों से सुशोभित थी। वहाँ अनेक सुन्दर फाटक बने थे। सब और भाँति भाँति के पक्षी चहचहाते थे। कमलों से भरी हुई पुष्करिणी उस पुरी की शोभा बढ़ाती थी। उसमें ह्रष्ट-पुष्ट स्त्री पुरुष निवास करते थे और वह पुरी स्वर्ग के समान मनोहर दिखायी देती थी। प्रसन्नता से भरी हुई उसे सुवर्णमयी नगरी को देखकर रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न तीनों को बड़ा विस्मय हुआ। बाणासुर की राजधानी में कितने ही देवता सदा द्वार पर बैठकर पहरा देते थे। राजन्! भगवान शंकर, कार्तिकेय, भद्रकालीदेवी और अग्रि ये देवता सदा उन पुरीकी रक्षा करते थे। युधिष्ठिर! शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले महातेजस्व्ी श्रीकृष्ण ने अत्यन्त कुपित हो पूर्व द्वार के रक्षकों को बलपूर्वक जीत कर भगवान शंकर के द्वारा सुरक्षित उत्तर द्वार पर आक्रमण किया। वहाँ महान् तेजस्वी भगवान महेश्वर हाथ में त्रिशूल लिये खड़े थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण मुँह बाये काल की भांति आ रहे हैं, तब वे महाबाहु महेश्वर बाणासुर के हित साधन की इच्छा से बाण सहित पिनाक नामक धनुष हाथ में लेकर श्रीकृष्ण के सम्मुख आये। तदनन्तर भगवान वासुदेव और महेश्वर परस्पर युद्ध करने लगे। उनका वह युद्ध अचिन्त्य, रोमांचकारी तथा भयंकर था। वे दोनों देवता एक दूसरे पर विजय पाने की इच्छा से परस्पर प्रहार करने लगे। दोनों ही क्रोध में भरकर एक दूसरे पर दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते थे। तदनन्तर भगवान श्रीकृष्ण ने शूलपाणि भगवान शंकर के साथ दो घड़ी तक युद्ध करके महादेवजी को जीत लिया तथा द्वार पर खड़े हुए अन्य शिवगणों को भी परास्त करके उस उत्तम नगर में प्रवेश किया। पाण्डुनन्दन! पुरी में प्रवेश करके अत्यन्त क्रोध में भरे हुए श्रीजनार्दन ने बाणासुर के पास पहुँचकर उसके साथ युद्ध छेड़ दिया। भरतश्रेष्ठ! बाणासुर भी क्रोध से आग बबूला हो रहा था। उसने भी युद्ध में भगवान केशव पर सभी तीखे-तीखे अस्त्र शस्त्र चलाये। फिर उसने उद्योगपर्वूक अपनी सभी भुजाओं से उस समरांगण में कुपित हो श्रीकृष्ण पर सहस्त्रों शस्त्रों का प्रहार किया। भारत! परंतु श्रीकृष्ण ने वे सभी शस्त्र काट डाले। राजन्! तदनन्तर &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;भगवान  &lt;/ins&gt;अधोक्षज ने दो घड़ी तक बाणासुर के साथ युद्ध करके अपना दिव्य उत्तम शस्त्र चक्र हाथ में उठाया और अमित तेजस्वी बाणासुर की सहस्त्र भुजाओं को काट दिया। महाराज! तब श्रीकृष्ण द्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर बाणासुर भुजाएँ कट जाने पर शाखाहीन वृक्ष की भांति धरती पर गिर पड़ा। इस प्रकार बलिपुत्र बाणासुर को रणभूमि में गिराकर श्रीकृष्ण ने बड़ी उतावली के साथ कैद में पड़े हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध को छुड़ा लिया। पत्नी सहित अनिरुद्ध को छुड़ाकर भगवान गोविन्छ ने बाणासुर के सभी प्रकार के असंख्य रत्न हर लिये। उसके घर में जो भी गोधन अथवा अन्य किसी प्रकार के धन मौजूद थे, उन सबको भी यहुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले भगवान ह्रषीकेश ने हर लिया। फिर वे सब रत्न लेकर मधुसूदन ने शीघ्रतापूर्वक रख लिये। कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात उन्होंने महाबली बलदेव, अमितपराक्रमी प्रद्युम्न, परम कान्तिमान अनिरुद्ध तथा सेवकों और दासियों सहित सुन्दरी उषा- इन सबको और नाना प्रकार के रत्नों को भी गरुड़ पर चढ़ाया।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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		<title>Bharatkhoj: '==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==  &lt;...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==  &amp;lt;...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;==अष्टात्रिंश (38) अध्‍याय: सभा पर्व (अर्घाभिहरण पर्व)==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;&amp;quot;&amp;gt;महाभारत: सभा पर्व: अष्टात्रिंश अध्याय: भाग 37 का हिन्दी अनुवाद &amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसमें स्थान स्थान पर उद्यान और बन शोभा पा रहे थे। वह नगरी नृत्य और गीतों से सुशोभित थी। वहाँ अनेक सुन्दर फाटक बने थे। सब और भाँति भाँति के पक्षी चहचहाते थे। कमलों से भरी हुई पुष्करिणी उस पुरी की शोभा बढ़ाती थी। उसमें ह्रष्ट-पुष्ट स्त्री पुरुष निवास करते थे और वह पुरी स्वर्ग के समान मनोहर दिखायी देती थी। प्रसन्नता से भरी हुई उसे सुवर्णमयी नगरी को देखकर रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न तीनों को बड़ा विस्मय हुआ। बाणासुर की राजधानी में कितने ही देवता सदा द्वार पर बैठकर पहरा देते थे। राजन्! भगवान शंकर, कार्तिकेय, भद्रकालीदेवी और अग्रि ये देवता सदा उन पुरीकी रक्षा करते थे। युधिष्ठिर! शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले महातेजस्व्ी श्रीकृष्ण ने अत्यन्त कुपित हो पूर्व द्वार के रक्षकों को बलपूर्वक जीत कर भगवान शंकर के द्वारा सुरक्षित उत्तर द्वार पर आक्रमण किया। वहाँ महान् तेजस्वी भगवान महेश्वर हाथ में त्रिशूल लिये खड़े थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण मुँह बाये काल की भांति आ रहे हैं, तब वे महाबाहु महेश्वर बाणासुर के हित साधन की इच्छा से बाण सहित पिनाक नामक धनुष हाथ में लेकर श्रीकृष्ण के सम्मुख आये। तदनन्तर भगवान वासुदेव और महेश्वर परस्पर युद्ध करने लगे। उनका वह युद्ध अचिन्त्य, रोमांचकारी तथा भयंकर था। वे दोनों देवता एक दूसरे पर विजय पाने की इच्छा से परस्पर प्रहार करने लगे। दोनों ही क्रोध में भरकर एक दूसरे पर दिव्यास्त्रों का प्रयोग करते थे। तदनन्तर भगवान श्रीकृष्ण ने शूलपाणि भगवान शंकर के साथ दो घड़ी तक युद्ध करके महादेवजी को जीत लिया तथा द्वार पर खड़े हुए अन्य शिवगणों को भी परास्त करके उस उत्तम नगर में प्रवेश किया। पाण्डुनन्दन! पुरी में प्रवेश करके अत्यन्त क्रोध में भरे हुए श्रीजनार्दन ने बाणासुर के पास पहुँचकर उसके साथ युद्ध छेड़ दिया। भरतश्रेष्ठ! बाणासुर भी क्रोध से आग बबूला हो रहा था। उसने भी युद्ध में भगवान केशव पर सभी तीखे-तीखे अस्त्र शस्त्र चलाये। फिर उसने उद्योगपर्वूक अपनी सभी भुजाओं से उस समरांगण में कुपित हो श्रीकृष्ण पर सहस्त्रों शस्त्रों का प्रहार किया। भारत! परंतु श्रीकृष्ण ने वे सभी शस्त्र काट डाले। राजन्! तदनन्तर भगवान् अधोक्षज ने दो घड़ी तक बाणासुर के साथ युद्ध करके अपना दिव्य उत्तम शस्त्र चक्र हाथ में उठाया और अमित तेजस्वी बाणासुर की सहस्त्र भुजाओं को काट दिया। महाराज! तब श्रीकृष्ण द्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर बाणासुर भुजाएँ कट जाने पर शाखाहीन वृक्ष की भांति धरती पर गिर पड़ा। इस प्रकार बलिपुत्र बाणासुर को रणभूमि में गिराकर श्रीकृष्ण ने बड़ी उतावली के साथ कैद में पड़े हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध को छुड़ा लिया। पत्नी सहित अनिरुद्ध को छुड़ाकर भगवान गोविन्छ ने बाणासुर के सभी प्रकार के असंख्य रत्न हर लिये। उसके घर में जो भी गोधन अथवा अन्य किसी प्रकार के धन मौजूद थे, उन सबको भी यहुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले भगवान ह्रषीकेश ने हर लिया। फिर वे सब रत्न लेकर मधुसूदन ने शीघ्रतापूर्वक रख लिये। कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात उन्होंने महाबली बलदेव, अमितपराक्रमी प्रद्युम्न, परम कान्तिमान अनिरुद्ध तथा सेवकों और दासियों सहित सुन्दरी उषा- इन सबको और नाना प्रकार के रत्नों को भी गरुड़ पर चढ़ाया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख क्रम |पिछला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 36|अगला=महाभारत सभा पर्व अध्याय 38 भाग 38}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{सम्पूर्ण महाभारत}}&lt;br /&gt;
[[Category:कृष्ण कोश]] [[Category:महाभारत]][[Category:महाभारत सभा पर्व]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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