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	<title>राष्ट्रीय अभिलेखागार, भारत - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>Bharatkhoj: '{{लेख सूचना |पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1 |पृष्ठ स...' के साथ नया पन्ना बनाया</title>
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		<updated>2016-12-24T09:38:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;&amp;#039;{{लेख सूचना |पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1 |पृष्ठ स...&amp;#039; के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{लेख सूचना&lt;br /&gt;
|पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1&lt;br /&gt;
|पृष्ठ संख्या=183&lt;br /&gt;
|भाषा= हिन्दी देवनागरी&lt;br /&gt;
|लेखक =&lt;br /&gt;
|संपादक=सुधाकर पाण्डेय&lt;br /&gt;
|आलोचक=&lt;br /&gt;
|अनुवादक=&lt;br /&gt;
|प्रकाशक=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|मुद्रक=नागरी मुद्रण वाराणसी&lt;br /&gt;
|संस्करण=सन्‌ 1964 ईसवी&lt;br /&gt;
|स्रोत=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=भारतडिस्कवरी पुस्तकालय&lt;br /&gt;
|कॉपीराइट सूचना=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|टिप्पणी=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लेख सम्पादक&lt;br /&gt;
|पाठ 1=श्री कृष्णदयाल भार्गव&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन सूचना=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अभिलेखालय''', भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता के बाद भारत में भी अपना अभिलेखालय स्थापित हुआ। उसे भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखालय कहते हैं।(अंग्रेज़ी:National Archives of India‌) इससे पूर्व इसका नाम इंपीरियल रेकर्ड्‌ डिपार्टमेंट (साम्राज्य-अभिलेख-विभाग) था। यह अभिलेखालय 'प्रथमोक्त' नाम से नई दिल्ली के जनपथ और राजपथ के चौक के पास लाल और सफ़ेद पत्थरों के एक भव्य भवन में स्थित है। प्राकृतिक संकटों से अभिलेखों की रक्षा के लिए आधुनिक वैज्ञानिक साधन प्रस्तुत कर लिय गए हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस विभाग को सन्‌ 1891 में ईस्ट इंडिया कंपनी के समय से इकट्ठे हुए सरकारी अभिलेखों को लेकर रखने का काम सौंपा गया था। उस समय इसके अधिकारी लोग स्पष्ट रूप से यह नहीं जानते थे कि इसका क्या काम होगा। अभिलेखसमूह अव्यवस्थित अवस्था में पड़ा था। भारत सरकार का ध्यान इस ओर तब गया जब इंग्लैंड और वेल्ज़ के अभिलेखों के संबंध में नियुक्त राजकीय आयोग ने सन्‌ 1914 में भारतीय अभिलेखों की अव्यवस्थित अवस्था पर टिप्पणी की। फलत: सन्‌ 1919 में भारत सरकार ने भारतीय अभिलेखों के संबंध में अपनी सिफारिशें (अभिस्ताव) भेजने के लिए एक भारतीय ऐतिहासिक अभिलेख आयोग नियुक्त किया। उस आयोग की सिफारिशों के फलस्वरूप अभिलेखों की अवस्था में धीरे धीरे सुधार होता गया। अब इसका मुख्य काम है सरकार के स्थायी अभिलेखों को सँभालकर रखना और प्रशासनिक उपयोग के लिए माँगने पर सरकार के विभिझ कार्यालयों को देना। इसके साथ ही इसको एक और काम भी सौंपा गया है। वह है सरकार द्वारा निश्चित अवधि तक के अभिलेख गवेषणार्थियों को गवेषणाकार्य के लिए देना। गवेषणार्थी अभिलेखालय के गवेषणाकोष्ठ (रिसर्च रूम) में बैठकर गवेषणाकार्य करते है। उपर्युक्त दो उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही इस विभाग का सब कार्यकलाप हो रहा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सरकार के वे सभी अभिलेख यहाँ समय-समय पर अभिरक्षा के लिए भेजे जाते हैं जो अब अपने अपने विभागों, कार्यालयों, मंत्रालयों आदि में तो प्रचलित (करेंट) नहीं हैं किंतु सरकार के स्थायी उपयोग के हैं। इनके अतिरिक्त भूतपूर्व वासामात्य भवनों (रेज़िडेंसियों), विलीन राज्यों तथा राजनीतिक अभिकरणों के भी अभिलेख यहाँ भेजे जाते हैं। इस अभिलेखालय के इस्पात के ताकों पर इस समय लगभग 1,03,625 जिल्दें और 51,13,000 बिना जिल्द बँधे प्रलेख (डाक्यूमेंट) हैं। कुल मिलाकर 13 करोड़ पृष्ठयुग्म (फ़ोलियो) हैं। इनके अतिरिक्त भारतीय सर्वेक्षण विभाग (सर्वे ऑव्‌ इंडिया) से 11,500 पांडुलिपि मानचित्र और विभिन्न अभिकरणों के 4,150 मुद्रित मानचित्र प्राप्त हुए हैं। मुख्य अभिलेखमाला सन्‌ 1748 से आरंभ होती है। इससे पूर्व के वर्षो के भी हितकारी अभिलेखसंग्रहों की प्रतिलिपियाँ इंडिया आफिस, लंदन से मँगाकर रखी गई हैं। इन जिल्दों में सन्‌ 1707 और 1748 में ईस्ट इंडिया कंपनी और उसके कर्मचारियों के बीच किए गए पत्रव्यवहार यहाँ पर मूल में एक अटूट माला के रूप में मिलते हैं और वह ब्रिटिश भारत के इतिहास का एक अनुपम स्रोत है।इसी प्रकार मूल कंसल्टेशंस भी बहुत महत्वूपर्ण हैं। इनमें ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासकों द्वारा लिखे गए वृत्त (मिनिट्स), ज्ञापन (मेमोरंडा), प्रस्ताव और सारे देश में विद्यमान कंपनी के अभिकर्ताओं (एजेंटों) के साथ किया गया पत्रव्यवहार है। इस देश की रहन-सहन और प्रशासन का लगभग प्रत्येक पहलू इनमें मिलता है। अभिलेखों में विदेशी हित ही सामग्री और पूर्वी चिट्ठियों का एक संग्रह भी है। इन चिट्ठियों में अधिकतर चिट्ठियाँ फारसी भाषा में हैं। परंतु बहुत सी संस्कृत, अरबी, हिंदी, बँगला, उड़िया, मराटी, तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बर्मी, चीनी, स्यामी और तिब्बती भाषाओं में भी हैं। हाल के वर्षो में इंग्लैंड, फ्रांस, हालैंड, डेनमार्क और अमरीका से भारत के लिए हितकारी सामग्रियों की अणचित्र-प्रति-लिपियाँ (माइक्रोफ़िल्म कापीज़) भी प्राप्त की गई हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माँगे जाने पर सुगमता से निकालकर देने के लिए इन अभिलेखों को बहुत सावधानी से ताकों पर वर्गीकरण, परीक्षण और क्रमबद्ध करके रखा जाता है और उनकी सूचियाँ तैयार की जाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो कार्यालय अपने अभिलेख यहाँ भेजते हैं वे पहले उनमें से अनुपयोगी अभिलेखों को निकालकर नष्ट कर देते हैं। नष्ट करते समय कहीं वे प्रशासनिक और ऐतिहासिक मूल्य के अभिलेखों को भी न नष्ट कर दें इसलिए यह अभिलेखालय उनको अभिलेखसंचयन के संबंध में सलाह देता है और इस काम में उनका पथप्रदर्शन करता है। संचयन के संबंध में सलाह देता है और इस काम में उनका पथप्रदर्शन करता है। संचयन के संबंध में विषमता दूर करने के लिए इस अभिलेखालय ने विभिन्न मंत्रालयों से आए हुए प्रतिवेदनों के आधार पर अभिलेखसंचयन का एकविध (यूनिफ़ार्म) नियम तैयार किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाहर से आनेवाले अभिलेखों का पहले वायुशोधन (एअर क्लीनिग) तथा धूमन (फ़्यूमिगेशन) किया जाता है। वायु शोधन के द्वारा अभिलेखों में से धूल हटा दी जाती है और धूमन के द्वारा हानिकारक कीड़ों को नष्ट कर दिया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अिभलेखों का परिरक्षण (सँभाल) इस अभिलेखालय के सबसे महत्वपूर्ण कामों में से एक है। यह काम अभिलेख प्रतिसंस्कार (मरम्मत) की विभिन्न विधाओं द्वारा प्रलेखों, उनके कागजों तथा स्याहियों आदि की अवस्थाओं को ध्यान में रखकर यथोचित रीति से किया जाता है। इस काम को सुचारू रूप से करने के लिए अभिलेखालय ने अपनी ही प्रयोगशाला (रिसर्च लेबोरेटरी) बना रखी है। इसमें कागजों तथा स्याहियों आदि के नमूनों का, अभिलेख-प्रतिसंस्कार के लिए उनकी उपयुक्तता आदि जानने के संबंध में परीक्षणकार्य किया जाता है। प्रयोगशाला में ऐसे साधनों तथा रीतियों आदि की खोज भी की जाती है जिससे अभिलखों को अधिक से अधिक दीर्घजीवी बनाया जा सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभिलेखपरिरक्षण (सँभाल में भा-प्रतिलिपिकरण) (फोटोडुप्लिकेशन) विधा से भी सहायता ली जाती है। अणुचित्रण विधा (माइक्रोफिल्मिंग प्रोसेस) द्वारा पुराने और भिदुर अभिलेख का लगातार अणचित्रण किया जा रहा है ताकि यदि कभी मूल अभिलेख अपहत या नष्ट हो जाएँ तो उनकी प्रतिलिपियाँ सँभालकर रखी जा सकें। इसके अतिरिक्त अणुचित्र प्रतिलिपियों को उपयोग में लाने से जहाँ मूल अभिलेखों की आयु अधिक लंबी हो सकती है वहाँ भारत के विभिझ भागों में स्थित गवेषणार्थियों को गवेषणार्थ सस्ते मूल्य पर अभिलेखों की प्रतिलिपियाँ मिल सकती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह अभिलेखालय इस समय संसार के सबसे बड़े अभिलेखालयों में से एक है। इसके कार्यकलापों के प्रशासन, अभिलेख, प्रकाशन, प्राच्य अभिलेख और शैक्षणिक अभिलेख तथा परिरक्षण आदि नामों से छह संभाग (डिवीज़न) हैं। प्रत्येक शाखा अपने शाखाप्रभारी (सेक्शन ईन्चा) तथा संभाग अधिकारी (डिवीज़न आफ़िसर) के द्वारा अपना कार्यकलाप निर्देशक को भेजती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी विश्वकोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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