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	<title>संत जान क्रिसोस्तम - अवतरण इतिहास</title>
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		<updated>2017-02-07T11:17:50Z</updated>

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&lt;p&gt;&lt;b&gt;नया पृष्ठ&lt;/b&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;{{लेख सूचना&lt;br /&gt;
|पुस्तक नाम=हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3&lt;br /&gt;
|पृष्ठ संख्या=207&lt;br /&gt;
|भाषा= हिन्दी देवनागरी&lt;br /&gt;
|लेखक =&lt;br /&gt;
|संपादक=सुधाकर पांडेय&lt;br /&gt;
|आलोचक=&lt;br /&gt;
|अनुवादक=&lt;br /&gt;
|प्रकाशक=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|मुद्रक=नागरी मुद्रण वाराणसी&lt;br /&gt;
|संस्करण=सन्‌ 1976 ईसवी&lt;br /&gt;
|स्रोत=&lt;br /&gt;
|उपलब्ध=भारतडिस्कवरी पुस्तकालय&lt;br /&gt;
|कॉपीराइट सूचना=नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी&lt;br /&gt;
|टिप्पणी=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लेख सम्पादक&lt;br /&gt;
|पाठ 1=पद्मा उपाध्याय&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन सूचना=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''संत जान क्रिसोस्तम''' (345-407 ई.)। मिस्र के प्रसिद्ध ईसाई संत। इनका जन्म अंतिओक के एक संपन्न परिवार में लगभग 345 ई. हुआ था। इनका मूल नाम क्रिसोस्टोमस जोआन्नेस था। तर्कशास्त्री लिवेनियस के विद्यालय में अपने बाल्यकाल में ही इन्होंने अपनी बौद्धिक शक्ति एवं प्राचीन साहित्य और संस्कृति के प्रति उत्कट प्रेम का परिचय दिया था। सन्‌ 360 में 15 वर्ष की आयु में अंतिओक के पादरी मेलेतियस द्वारा नामसंस्कार होने के पश्चात्‌ ये मरूभूमि की ओर चले गए जहाँ 10 वर्षों तक गंभीर अध्ययन तथा तपस्वी का जीवनयापन करते रहे। शारीरिक अस्वस्थता ने इन्हें फिर संसार में लौटाया और 381 ई. में वे अंतिओक के डीकेन बनाए गए तथा 386 ई. में आर्चबिशप हुए। अंतिओक में इनके उपदेशों के विशेषकर उनके मूर्तियों पर दिए गए उपदेशों के कारण उनकी बहुत प्रशंसा हुई, उस समय जनता, एक दंगे के कारण जिसमें सम्राट् थियोदीयस की मूर्तियाँ नष्ट कर दी गई थी बहुत आतंकित हो रही थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनकी उपदेश शैली और उत्कृष्ट सादगी से प्रभावित होकर लोंगों ने उन्हें नेक्तारियस के देहांत के पश्चात्‌ 398 ई. में कुस्तुंतुनिया का बिशप बना दिया। इस पद पर रहकर उन्होंने जो कार्य उनसे उनकी बहुत प्रशंसा हुई। चर्च की आय का बहुत बड़ा भाग इन्होंने चिकित्सालयों की स्थापना में व्यय किया। इनके श्रद्धायुक्त उपदेश इनकी महत्ता के आधार बने। उन्होंने भौतिकतावादी साधुओं और पादरियों के साथ कठोर अनुशासन का व्यवहार किया। छोटे पादरियों को धर्मवहनों को नौकर रखना मना कर दिया; साधु जो इधर उधर व्यर्थ घूमा करते थे उनको मठों में ही रहने का आदेश दिया; दरबार की फजूलखर्जी और धनिक वर्ग की विलासिता की बुरी तरह की भर्त्सना की। इससे कुस्तुंतुनिया के बहुत से लोग उनके शत्रु बन बैठे। इससे शत्रु प्रतिशोध का मौका खोजने लगे जो उन्हें शीघ्र ही मिल भी गया। कुस्तुंतुनिया के पादरी थियोफिलस ने चार निचियन साधुओं को धर्म से बहिष्कृत कर दिया था, उन्हें क्रिस्तोस्तम ने अपने यहाँ आश्रय दे दिया। अत: 403 ई. में कैल्सिडान में थियोफिलस (धर्मसभा) आमंत्रित किया गया। उसमें क्रिसोस्तम पर धर्मद्रोह का अपराध लगाया गया और उन्हें धर्मसभा के सम्मुख उपस्थित होनेका आदेश दिया गया। अस्वीकार करने पर उन्हें बंदी बना देशनिकाला दे दिया गया उनके नगर छोड़ने के दो -चार दिन बाद ही कुस्तुंतुनियाँ में प्रचंड भूकंप आया। उसे लोगों ने क्रिसोस्तम के देशनिकाले के विरुद्ध दैवी कोप माना। जनता में घोर असंतोष फैलने लगा। जनता की धमकियों के कारण साम्राज्ञी यूदोक्सियों को नगर निष्कासन की आज्ञा उठाकर उन्हें वापस बुलाना पड़ा। दो मास बाद ही वे फिर एक वक्तव्य के कारण निष्कासित किए गए। जनता ने गिरजाघर एवं सभाभवन में आग लगा दी और क्रिसोस्तम को शीघ्रतापूर्वक काकेशस पहुँचा दिया। विभिन्न चर्चों से पत्रव्यवहार एवं रूढिवादिता के कारण सम्राट आरकेदियस ने इन्हें सुदूर रेगिस्तान पाइथस में भेज दिया। 407 ई. में जब वे यात्रा पर थे कोमन नामक स्थान पर 60 वर्ष की अवस्था में उनकी मृत्यु हुई। इनके देशनिकाले ने धर्मभेद को जन्म दिया तथा इनके अनुयायी, जो जॉनिस्त कहलाते थे, कुस्तुंतूनिया के पादरी के साथ तभी एक हुए जब उनके अस्थि अवशेष को 432 ई. में कुस्तुंतुनिया लाया गया और उन्हें संत के रूप में सम्मानित किया गया। संत जॉन क्रिसोस्तम का भंडारा यूनानी गिरजाघरों में 13 नवंबर को होता है तथा रोमन गिरजाघरों में 27 जनवरी को ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रिसोस्तम धर्म में तपस्वी जीवन को बहुत ऊँचा स्थान देते थे, एवं धर्मश्रुकितयों के ज्ञान पर बहुत बल देते थे। श्रुतिभाष्य में वे सर्वथा अंतिओकिन है तथा अपनी व्याख्या को शुद्ध व्याकरणीय अध्ययन पर आधारित किया है, सिकंदरिया पद्धति अथवा ‘ओरिगेन’ के लाक्षणिक भावानुवाद पर नहीं। इनके लेखों में कालांतर में आनेवाले उपदेश एवं स्तुति के बीज दृष्टिगोचर होते हैं। परंतु पोप की प्राथमिकता एवं व्यक्तिगत पापस्वीकरण का महत्व स्पष्ट परिलक्षित नहीं होता। सन 425 के आसपास से ही क्रिसोस्तम यूनानियों एवं रोमनों द्वारा महान्‌ विज्ञ माने जाने लगे थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनके लिखे ग्रंथों की संख्या बहुत अधिक है। उनकी रचनाओं का एक संग्रह 13 खंडों में 17.18-38 ई. में पेरिस से प्रकाशित हुआ था। इनमें कुछ आरंभ में लिखें मठों सम्बंधी लेख हैं जिनमें पुरोहित पद पर लिखें लेख, बहुत से उपदेश एवं पुरोहित-पद काल में लिखे कुछ लेख थे, सर्वोत्तम हैं। उनमें कुछ पत्र भी हैं, जिन्हें इन्होंने अपने देशनिकाले की अवधि में लिखा था। ये सभी इतिहास के मूल्यवान्‌ स्रोत हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रिसोस्तम पर्यटक भी थे और भारत का भी उन्होंने भ्रमण किया था। उस संबंध में उनके लेखों से भारतीय इतिहास पर भी कुछ प्रकाश पड़ा है। रामायण और महाभारत के कथाप्रबंधों की ईलियद और ओदेसी से समानता के कारण इनका विश्वास था कि भारतीयों ने इन ग्रीक काव्यों की छाया में ही अपने काव्यों की छाया में ही अपने काव्यों का निर्माण किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी_विश्वकोश]][[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Bharatkhoj</name></author>
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