"महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 61 श्लोक 15-21": अवतरणों में अंतर

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==एकाषष्टितम (61) अध्याय: शान्ति पर्व (राजधर्मानुशासन पर्व)==
==एकषष्टितम (61) अध्याय: शान्ति पर्व (राजधर्मानुशासन पर्व)==
<div style="text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;">महाभारत: शान्ति पर्व: एकाषष्टितम अध्याय: श्लोक 15-21 का हिन्दी अनुवाद</div>
<div style="text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;">महाभारत: शान्ति पर्व: एकषष्टितम अध्याय: श्लोक 15-21 का हिन्दी अनुवाद</div>


श्रेष्ठ आश्रम गार्हस्थ्य में निवास करने वाले द्विजों के लिये महर्षिगण यह कर्तव्य बताते हैं कि वह स्त्री और पुत्रों का भरण-पोषण तथा वेदशास्त्रों का स्वाध्याय करे। जो ब्राह्मण इस प्रकार स्वभावतः यज्ञपरायण हो, गृहस्थ-धर्म का यथावत् रुप से पालन करता है, वह गृहस्थ वृत्ति का अच्छी तरह शोधन करके स्वर्गलोक में विशुद्ध फल का भागी होता है। उस गृहस्थ को देह-त्याग के पश्चात् उसके अभीष्ट मनोरथ अक्षयरुप से प्राप्त होते हैं। वे उस पुरुष का संकल्प जानकर इस प्रकार अनन्तकाल तक के लिये उसकी सेवा में उपस्थित हो जाते हैं, मानो उनके नेत्र, मस्तक और मुख सभी दिशाओं की ओर हों। युधिष्ठर ! ब्रह्मचारी को चाहिये कि वह अकेला ही वेदमन्त्रों का चिन्तन और अभीष्ट मन्त्रों का जप करते हुए सारे कार्य सम्पन्न करे, अपने शरीर में मैल और कीचड लगी हो तो भी वह सेवा के लिये उद्यत हो एकमात्र आचार्य की ही परिचर्या में संलग्न रहे। बह्मचारी नित्य निरन्तर मन और इन्द्रियों को वश में रखते हुए व्रत एवं दीक्षा के पालन में तत्पर रहे। वेदों का स्वाध्याय करते हुए सदा कर्तव्य-कर्मों के पालनपूर्वक गुरु-गृह में निवास करे। निरन्तर गुरु की सेवा में संलग्न रहकर उन्हें प्रणाम करे। जीवन-निर्वाह के उद्देश्य से किये जाने वाले यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन तथा दान और प्रतिग्रह-इन छः कर्मों से अलग रहे और किसी भी असत् कर्म में वह कभी प्रवृत्त न हो। अपने अधिकार का प्रदर्शन करते हुए व्यवहार न करे; द्वेष रखने वालोंका सडंग न करें। वत्स युधिष्ठिर! ब्रह्मचारी के लिये यही आश्रम-धर्म अभीष्ट है।
श्रेष्ठ आश्रम गार्हस्थ्य में निवास करने वाले द्विजों के लिये महर्षिगण यह कर्तव्य बताते हैं कि वह स्त्री और पुत्रों का भरण-पोषण तथा वेदशास्त्रों का स्वाध्याय करे। जो ब्राह्मण इस प्रकार स्वभावतः यज्ञपरायण हो, गृहस्थ-धर्म का यथावत् रुप से पालन करता है, वह गृहस्थ वृत्ति का अच्छी तरह शोधन करके स्वर्गलोक में विशुद्ध फल का भागी होता है। उस गृहस्थ को देह-त्याग के पश्चात् उसके अभीष्ट मनोरथ अक्षयरुप से प्राप्त होते हैं। वे उस पुरुष का संकल्प जानकर इस प्रकार अनन्तकाल तक के लिये उसकी सेवा में उपस्थित हो जाते हैं, मानो उनके नेत्र, मस्तक और मुख सभी दिशाओं की ओर हों। युधिष्ठर ! ब्रह्मचारी को चाहिये कि वह अकेला ही वेदमन्त्रों का चिन्तन और अभीष्ट मन्त्रों का जप करते हुए सारे कार्य सम्पन्न करे, अपने शरीर में मैल और कीचड लगी हो तो भी वह सेवा के लिये उद्यत हो एकमात्र आचार्य की ही परिचर्या में संलग्न रहे। बह्मचारी नित्य निरन्तर मन और इन्द्रियों को वश में रखते हुए व्रत एवं दीक्षा के पालन में तत्पर रहे। वेदों का स्वाध्याय करते हुए सदा कर्तव्य-कर्मों के पालनपूर्वक गुरु-गृह में निवास करे। निरन्तर गुरु की सेवा में संलग्न रहकर उन्हें प्रणाम करे। जीवन-निर्वाह के उद्देश्य से किये जाने वाले यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन तथा दान और प्रतिग्रह-इन छः कर्मों से अलग रहे और किसी भी असत् कर्म में वह कभी प्रवृत्त न हो। अपने अधिकार का प्रदर्शन करते हुए व्यवहार न करे; द्वेष रखने वालोंका सडंग न करें। वत्स युधिष्ठिर! ब्रह्मचारी के लिये यही आश्रम-धर्म अभीष्ट है।

०८:२१, ५ अगस्त २०१५ के समय का अवतरण

एकषष्टितम (61) अध्याय: शान्ति पर्व (राजधर्मानुशासन पर्व)

महाभारत: शान्ति पर्व: एकषष्टितम अध्याय: श्लोक 15-21 का हिन्दी अनुवाद

श्रेष्ठ आश्रम गार्हस्थ्य में निवास करने वाले द्विजों के लिये महर्षिगण यह कर्तव्य बताते हैं कि वह स्त्री और पुत्रों का भरण-पोषण तथा वेदशास्त्रों का स्वाध्याय करे। जो ब्राह्मण इस प्रकार स्वभावतः यज्ञपरायण हो, गृहस्थ-धर्म का यथावत् रुप से पालन करता है, वह गृहस्थ वृत्ति का अच्छी तरह शोधन करके स्वर्गलोक में विशुद्ध फल का भागी होता है। उस गृहस्थ को देह-त्याग के पश्चात् उसके अभीष्ट मनोरथ अक्षयरुप से प्राप्त होते हैं। वे उस पुरुष का संकल्प जानकर इस प्रकार अनन्तकाल तक के लिये उसकी सेवा में उपस्थित हो जाते हैं, मानो उनके नेत्र, मस्तक और मुख सभी दिशाओं की ओर हों। युधिष्ठर ! ब्रह्मचारी को चाहिये कि वह अकेला ही वेदमन्त्रों का चिन्तन और अभीष्ट मन्त्रों का जप करते हुए सारे कार्य सम्पन्न करे, अपने शरीर में मैल और कीचड लगी हो तो भी वह सेवा के लिये उद्यत हो एकमात्र आचार्य की ही परिचर्या में संलग्न रहे। बह्मचारी नित्य निरन्तर मन और इन्द्रियों को वश में रखते हुए व्रत एवं दीक्षा के पालन में तत्पर रहे। वेदों का स्वाध्याय करते हुए सदा कर्तव्य-कर्मों के पालनपूर्वक गुरु-गृह में निवास करे। निरन्तर गुरु की सेवा में संलग्न रहकर उन्हें प्रणाम करे। जीवन-निर्वाह के उद्देश्य से किये जाने वाले यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन तथा दान और प्रतिग्रह-इन छः कर्मों से अलग रहे और किसी भी असत् कर्म में वह कभी प्रवृत्त न हो। अपने अधिकार का प्रदर्शन करते हुए व्यवहार न करे; द्वेष रखने वालोंका सडंग न करें। वत्स युधिष्ठिर! ब्रह्मचारी के लिये यही आश्रम-धर्म अभीष्ट है।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वं के अन्तर्गत राजधर्मांनुशासनपर्वं में चारों आश्रमों के धर्मों का वर्णनविषयक एकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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