"महाभारत भीष्म पर्व अध्याय 26 श्लोक 41-51" के अवतरणों में अंतर

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==षड्विंश (26) अध्‍याय: भीष्म पर्व (श्रीमद्भगवदगीता पर्व)==
 
==षड्विंश (26) अध्‍याय: भीष्म पर्व (श्रीमद्भगवदगीता पर्व)==
<div style="text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;">महाभारत: भीष्म पर्व: षड्विंश अध्याय: श्लोक 41-47 का हिन्दी अनुवाद </div>
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<div style="text-align:center; direction: ltr; margin-left: 1em;">महाभारत: भीष्म पर्व: षड्विंश अध्याय: श्लोक 41-51 का हिन्दी अनुवाद </div>
  
हे अर्जुन ! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्‍यों की बुद्धियाँ निश्‍चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्‍त होती हैं । सम्‍बन्‍ध – अब तीनों श्‍लोकों में सकाम भाव को त्‍याज्‍य बतलाने के लिये सकाम मनुष्‍यों के स्‍वभाव, सिद्धान्‍त और आचार व्‍यवहार का वर्णन करते हैं – हे अर्जुन ! जो भोगों में तन्‍मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेद वाक्‍यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्‍वर्ग ही परम प्राप्‍य वस्‍तु है और जो स्‍वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्‍तु ही नहीं है – ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकी जन इस प्रकार की जिस पुष्पित यानि दिखाऊ शोभायुक्त वाणी-को कहा करते हैं जो कि जन्‍मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्‍वर्य की प्राप्ति के लिये नाना प्रकार की बहुत सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है; उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्‍वर्य में अत्‍यन्‍त आसक्त हैं, उन पुरूषों की परमात्‍मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती । हे अजुर्न ! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्यरूप समस्‍त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं; इसलिये तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्ति‍हीन, हर्ष-शोकादी द्वन्‍द्वों से रहित, नित्‍यवस्‍तु परमात्‍मा में स्थित, योगक्षेमको न चाहने वाल<ref> अप्राप्‍त वस्‍तु की प्राप्त‍ि को योग कहते है और प्राप्त वस्‍तु की रक्षा का नाम क्षेम है; सांसारिक भोगों की कामना का त्‍याग कर देने के बाद भी शरीर निर्वाह के लिये मनुष्‍य की योगक्षेम में वासना रहा करती है; अतएव उस वासना का भी सर्वथा त्‍याग कराने के लिये यहाँ अर्जुन को निर्योगक्ष्‍ोम होने को कहा गया है ।</ref>और स्‍वाधीन अन्‍त:करण वाला हो । सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्‍त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्‍य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्त्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्‍त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता ह<ref>इस दृष्‍टान्‍त का अभिप्राय यह है कि जिस मनुष्‍य को अमृत के समान स्‍वादु और गुणकारी अथाह जल से भरा हुआ जलाशय मिल जाता है, उसको जैसे जल के लिये (वापी-कूप-तडागादि) छोटे-छोटे जलाशयों से कोई प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही जिसको परमानन्‍द के समुद्र पूर्णब्रह्म परमात्‍मा की प्राप्त‍ि हो जाती है, उसको आनन्‍द की प्राप्ति के लिये वेदोक्त कर्मों के फलरूप भोगों से कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता । वह सर्वथा पूर्णकाम और नित्‍यवृप्त हो जाता है ।</ref>। सम्‍बन्‍ध – इस प्रकार समबुद्धि रूप कर्मयोग का और उसके फल का महत्‍व बतलाकर अब दो श्‍लोकों में भगवान् कर्मयोग का स्‍वरूप बतलाते हुए अर्जुन को कर्मयोग में स्थित होकर कर्म करने के लिये कहते हैं –  तेरा कर्म करने में ही अधिकार ह<ref>जैसे सरकार के द्वारा लोगों को आत्‍मरक्षा के लिये या प्रजा की रक्षा के लिये अपने पास नाना प्रकार के शस्‍त्र रखने और उनके प्रयोग करने का अधिकार दिया जाता है और उसी समय उनके प्रयोग के नियम भी उनको बतला दिये जाते हैं, उसके बाद यदि कोई मनुष्‍य उस अधिकार का दुरूपयोग करता है तो उसे दण्‍ड दिया जाता है और उसका अधिकार भी छीन लिया जाता है, वैसे ही जीव को जन्‍म–मृत्‍यु रूप संसार बन्‍धन से मुक्त होने के लिये और दूसरों का हित करने के लिये मन, बुद्धि और इन्‍द्रियों के सहित यह मनुष्‍य शरीर देकर इसके द्वारा नवीन कर्म करने का अधिकार दिया गया है । अत: जो इस अधिकार का सदुपयोग करता है, वह तो कर्मबन्‍धन से छूटकर परमपद को प्राप्त हो जाता है और जो सदुपयोग करता है, वह दण्‍ड का भागी होता है तथा उससे यह अधिकार छीन लिया जाता है अर्थात उसे पुन: सूकर-कूकरादि योनियों में ढकेल दिया जाता है । इस रहस्‍य को समझकर मनुष्‍य को इस अधिकार का सदुपयोग करना चाहिये ।</ref>उसके फलों में कमी नहीं ह<ref>मनुष्‍य कर्मों का फल प्राप्त करने में कभी किसी प्रकार भी स्‍वतन्‍त्र नहीं है । उसके कौन से कर्म का क्‍या फल होगा और वह फल उसको किस प्रकार प्राप्‍त होगा – इसका न तो उसको कुछ पता है और न वह अपने इच्‍छानुसार समय पर उसे प्राप्त कर सकता है अथवा न उससे बच ही सकता है । मनुष्‍य चाहता कुछ और है और होता कुछ और ही है ।</ref>। इसलिये तू कर्मों के फलका हेतु मत ह<ref>मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा किये हुए शास्‍त्र विहित कर्मों में और उनके फल में ममता, आसक्त‍ि, वासना, आशा,</ref>तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्त‍ि न हो । हे धनंजय ! तू आसक्त‍ि को त्‍यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्‍य कर्मों को कर<ref> योग में स्थित होकर कर्म करने के लिये कहकर भगवान् ने यह भाव दिखलाया है कि केवल सिद्धि और असिद्धि में ही समत्‍व रखने से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रत्‍येक क्रिया के करते समय भी तुमको किसी भी पदार्थ में, कर्म में, या उसके फल में अथवा किसी भी प्राणी में विषमभाव न रखकर नित्‍य समभाव में स्थिर रहना चाहिये ।</ref>समत्‍व ही योग कहलाता है ।
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हे अर्जुन ! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्‍यों की बुद्धियाँ निश्‍चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्‍त होती हैं । सम्‍बन्‍ध – अब तीनों श्‍लोकों में सकाम भाव को त्‍याज्‍य बतलाने के लिये सकाम मनुष्‍यों के स्‍वभाव, सिद्धान्‍त और आचार व्‍यवहार का वर्णन करते हैं – हे अर्जुन ! जो भोगों में तन्‍मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेद वाक्‍यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्‍वर्ग ही परम प्राप्‍य वस्‍तु है और जो स्‍वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्‍तु ही नहीं है – ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकी जन इस प्रकार की जिस पुष्पित यानि दिखाऊ शोभायुक्त वाणी-को कहा करते हैं जो कि जन्‍मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्‍वर्य की प्राप्ति के लिये नाना प्रकार की बहुत सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है; उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्‍वर्य में अत्‍यन्‍त आसक्त हैं, उन पुरूषों की परमात्‍मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती । हे अजुर्न ! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्यरूप समस्‍त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं; इसलिये तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्ति‍हीन, हर्ष-शोकादी द्वन्‍द्वों से रहित, नित्‍यवस्‍तु परमात्‍मा में स्थित, योगक्षेमको न चाहने वाल<ref> अप्राप्‍त वस्‍तु की प्राप्त‍ि को योग कहते है और प्राप्त वस्‍तु की रक्षा का नाम क्षेम है; सांसारिक भोगों की कामना का त्‍याग कर देने के बाद भी शरीर निर्वाह के लिये मनुष्‍य की योगक्षेम में वासना रहा करती है; अतएव उस वासना का भी सर्वथा त्‍याग कराने के लिये यहाँ अर्जुन को निर्योगक्ष्‍ोम होने को कहा गया है ।</ref>और स्‍वाधीन अन्‍त:करण वाला हो । सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्‍त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्‍य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्त्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्‍त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता ह<ref>इस दृष्‍टान्‍त का अभिप्राय यह है कि जिस मनुष्‍य को अमृत के समान स्‍वादु और गुणकारी अथाह जल से भरा हुआ जलाशय मिल जाता है, उसको जैसे जल के लिये (वापी-कूप-तडागादि) छोटे-छोटे जलाशयों से कोई प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही जिसको परमानन्‍द के समुद्र पूर्णब्रह्म परमात्‍मा की प्राप्त‍ि हो जाती है, उसको आनन्‍द की प्राप्ति के लिये वेदोक्त कर्मों के फलरूप भोगों से कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता । वह सर्वथा पूर्णकाम और नित्‍यवृप्त हो जाता है ।</ref>। सम्‍बन्‍ध – इस प्रकार समबुद्धि रूप कर्मयोग का और उसके फल का महत्‍व बतलाकर अब दो श्‍लोकों में भगवान् कर्मयोग का स्‍वरूप बतलाते हुए अर्जुन को कर्मयोग में स्थित होकर कर्म करने के लिये कहते हैं –  तेरा कर्म करने में ही अधिकार ह<ref>जैसे सरकार के द्वारा लोगों को आत्‍मरक्षा के लिये या प्रजा की रक्षा के लिये अपने पास नाना प्रकार के शस्‍त्र रखने और उनके प्रयोग करने का अधिकार दिया जाता है और उसी समय उनके प्रयोग के नियम भी उनको बतला दिये जाते हैं, उसके बाद यदि कोई मनुष्‍य उस अधिकार का दुरूपयोग करता है तो उसे दण्‍ड दिया जाता है और उसका अधिकार भी छीन लिया जाता है, वैसे ही जीव को जन्‍म–मृत्‍यु रूप संसार बन्‍धन से मुक्त होने के लिये और दूसरों का हित करने के लिये मन, बुद्धि और इन्‍द्रियों के सहित यह मनुष्‍य शरीर देकर इसके द्वारा नवीन कर्म करने का अधिकार दिया गया है । अत: जो इस अधिकार का सदुपयोग करता है, वह तो कर्मबन्‍धन से छूटकर परमपद को प्राप्त हो जाता है और जो सदुपयोग करता है, वह दण्‍ड का भागी होता है तथा उससे यह अधिकार छीन लिया जाता है अर्थात उसे पुन: सूकर-कूकरादि योनियों में ढकेल दिया जाता है । इस रहस्‍य को समझकर मनुष्‍य को इस अधिकार का सदुपयोग करना चाहिये ।</ref>उसके फलों में कमी नहीं ह<ref>मनुष्‍य कर्मों का फल प्राप्त करने में कभी किसी प्रकार भी स्‍वतन्‍त्र नहीं है । उसके कौन से कर्म का क्‍या फल होगा और वह फल उसको किस प्रकार प्राप्‍त होगा – इसका न तो उसको कुछ पता है और न वह अपने इच्‍छानुसार समय पर उसे प्राप्त कर सकता है अथवा न उससे बच ही सकता है । मनुष्‍य चाहता कुछ और है और होता कुछ और ही है ।</ref>। इसलिये तू कर्मों के फलका हेतु मत ह<ref>मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा किये हुए शास्‍त्र विहित कर्मों में और उनके फल में ममता, आसक्त‍ि, वासना, आशा,</ref>तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्त‍ि न हो । हे धनंजय ! तू आसक्त‍ि को त्‍यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्‍य कर्मों को कर<ref> योग में स्थित होकर कर्म करने के लिये कहकर भगवान् ने यह भाव दिखलाया है कि केवल सिद्धि और असिद्धि में ही समत्‍व रखने से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रत्‍येक क्रिया के करते समय भी तुमको किसी भी पदार्थ में, कर्म में, या उसके फल में अथवा किसी भी प्राणी में विषमभाव न रखकर नित्‍य समभाव में स्थिर रहना चाहिये ।</ref>समत्‍व ही योग कहलाता है  <ref>योग में स्थित होकर कर्म करने के लिये कहकर भगवान् ने यह भाव दिखलाया है कि केवल सिद्धि और असिद्धि में ही समत्‍व रखने से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रत्‍येक क्रिया के करते समय भी तुमको किसी भी पदार्थ में, कर्म में, या उसके फल में अथवा किसी भी प्राणी में विषमभाव न रखकर नित्‍य समभाव में स्थिर रहना चाहिये ।जिसमें ममता, आसक्ति और कामना का त्‍याग करके समबुद्धिपूर्वक कर्तव्‍य कर्म का अनुष्ठान किया जाता है, उस कर्मयोग का वाचक यहाँ बुद्धियोगात् पद है; क्‍योंकि उनचालीसवें श्‍लोक में योगे त्विमां श्रृणु अर्थात् अब तुम मुझसे इस बुद्धि को योग में सुनो, यह कहकर भगवान् ने कर्मयोग का वर्णन आरम्‍भ किया है । इसके सिवा इस श्‍लोक में फल चाहने वालों को कृपण बतालाया गया है और अगले श्‍लोक में बुद्धियुक्त पुरूष की प्रशंसा करके अर्जुन को कर्मयोग के लिये आज्ञा दी गई है और यह कहा गया है कि बुद्धियुक्त मनुष्‍य कर्मफल का त्‍याग करके अनामय पद को प्राप्‍त हो जाता है (गीता २।५१); इस कारण भी यहाँ बुद्धियोगात् पद का अर्थ कर्मयोग ही है ।</ref> सम्‍बन्‍ध- इस प्रकार कर्मयोग की प्रक्रिया बतलाकर अब सकाम भाव की निन्‍दा और समभावरूप बुद्धि योग का महत्‍व प्रकट करते हुए भगवान् अर्जुन को उसका आश्रय लेने के लिये आज्ञा देते हैं –  इस समत्‍व रूप बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्‍यन्‍त ही निम्‍न श्रेणी का है । इसलिये हे धनजंय ! तु समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर; क्‍योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्‍यन्‍त दीन हैं। समबुद्धियुक्त पुरूष पुण्‍य और पाप दोनो को इसी लोक में त्‍याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है ।+ इससे तू समत्‍वरूप योग में लग जायेगा; यह समत्‍वरूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबन्‍धन से छूटने का उपाय है। क्‍योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्‍पन्‍न होने वाले फल को त्‍यागकर जन्‍मरूप बन्‍धन से मुक्त हो निर्विकार परमपद् को प्राप्त हो जाते हैं।
  
 
{{लेख क्रम |पिछला=महाभारत भीष्म पर्व अध्याय 26 श्लोक 31-40|अगला=महाभारत भीष्म पर्व अध्याय 26 श्लोक 49-52}}
 
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१२:०९, २२ अगस्त २०१५ का अवतरण

षड्विंश (26) अध्‍याय: भीष्म पर्व (श्रीमद्भगवदगीता पर्व)

महाभारत: भीष्म पर्व: षड्विंश अध्याय: श्लोक 41-51 का हिन्दी अनुवाद

हे अर्जुन ! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्‍यों की बुद्धियाँ निश्‍चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्‍त होती हैं । सम्‍बन्‍ध – अब तीनों श्‍लोकों में सकाम भाव को त्‍याज्‍य बतलाने के लिये सकाम मनुष्‍यों के स्‍वभाव, सिद्धान्‍त और आचार व्‍यवहार का वर्णन करते हैं – हे अर्जुन ! जो भोगों में तन्‍मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेद वाक्‍यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्‍वर्ग ही परम प्राप्‍य वस्‍तु है और जो स्‍वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्‍तु ही नहीं है – ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकी जन इस प्रकार की जिस पुष्पित यानि दिखाऊ शोभायुक्त वाणी-को कहा करते हैं जो कि जन्‍मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्‍वर्य की प्राप्ति के लिये नाना प्रकार की बहुत सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है; उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्‍वर्य में अत्‍यन्‍त आसक्त हैं, उन पुरूषों की परमात्‍मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती । हे अजुर्न ! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्यरूप समस्‍त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं; इसलिये तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्ति‍हीन, हर्ष-शोकादी द्वन्‍द्वों से रहित, नित्‍यवस्‍तु परमात्‍मा में स्थित, योगक्षेमको न चाहने वाल[१]और स्‍वाधीन अन्‍त:करण वाला हो । सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्‍त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्‍य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्त्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्‍त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता ह[२]। सम्‍बन्‍ध – इस प्रकार समबुद्धि रूप कर्मयोग का और उसके फल का महत्‍व बतलाकर अब दो श्‍लोकों में भगवान् कर्मयोग का स्‍वरूप बतलाते हुए अर्जुन को कर्मयोग में स्थित होकर कर्म करने के लिये कहते हैं – तेरा कर्म करने में ही अधिकार ह[३]उसके फलों में कमी नहीं ह[४]। इसलिये तू कर्मों के फलका हेतु मत ह[५]तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्त‍ि न हो । हे धनंजय ! तू आसक्त‍ि को त्‍यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्‍य कर्मों को कर[६]समत्‍व ही योग कहलाता है [७] सम्‍बन्‍ध- इस प्रकार कर्मयोग की प्रक्रिया बतलाकर अब सकाम भाव की निन्‍दा और समभावरूप बुद्धि योग का महत्‍व प्रकट करते हुए भगवान् अर्जुन को उसका आश्रय लेने के लिये आज्ञा देते हैं – इस समत्‍व रूप बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्‍यन्‍त ही निम्‍न श्रेणी का है । इसलिये हे धनजंय ! तु समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर; क्‍योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्‍यन्‍त दीन हैं। समबुद्धियुक्त पुरूष पुण्‍य और पाप दोनो को इसी लोक में त्‍याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है ।+ इससे तू समत्‍वरूप योग में लग जायेगा; यह समत्‍वरूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबन्‍धन से छूटने का उपाय है। क्‍योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्‍पन्‍न होने वाले फल को त्‍यागकर जन्‍मरूप बन्‍धन से मुक्त हो निर्विकार परमपद् को प्राप्त हो जाते हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अप्राप्‍त वस्‍तु की प्राप्त‍ि को योग कहते है और प्राप्त वस्‍तु की रक्षा का नाम क्षेम है; सांसारिक भोगों की कामना का त्‍याग कर देने के बाद भी शरीर निर्वाह के लिये मनुष्‍य की योगक्षेम में वासना रहा करती है; अतएव उस वासना का भी सर्वथा त्‍याग कराने के लिये यहाँ अर्जुन को निर्योगक्ष्‍ोम होने को कहा गया है ।
  2. इस दृष्‍टान्‍त का अभिप्राय यह है कि जिस मनुष्‍य को अमृत के समान स्‍वादु और गुणकारी अथाह जल से भरा हुआ जलाशय मिल जाता है, उसको जैसे जल के लिये (वापी-कूप-तडागादि) छोटे-छोटे जलाशयों से कोई प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही जिसको परमानन्‍द के समुद्र पूर्णब्रह्म परमात्‍मा की प्राप्त‍ि हो जाती है, उसको आनन्‍द की प्राप्ति के लिये वेदोक्त कर्मों के फलरूप भोगों से कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता । वह सर्वथा पूर्णकाम और नित्‍यवृप्त हो जाता है ।
  3. जैसे सरकार के द्वारा लोगों को आत्‍मरक्षा के लिये या प्रजा की रक्षा के लिये अपने पास नाना प्रकार के शस्‍त्र रखने और उनके प्रयोग करने का अधिकार दिया जाता है और उसी समय उनके प्रयोग के नियम भी उनको बतला दिये जाते हैं, उसके बाद यदि कोई मनुष्‍य उस अधिकार का दुरूपयोग करता है तो उसे दण्‍ड दिया जाता है और उसका अधिकार भी छीन लिया जाता है, वैसे ही जीव को जन्‍म–मृत्‍यु रूप संसार बन्‍धन से मुक्त होने के लिये और दूसरों का हित करने के लिये मन, बुद्धि और इन्‍द्रियों के सहित यह मनुष्‍य शरीर देकर इसके द्वारा नवीन कर्म करने का अधिकार दिया गया है । अत: जो इस अधिकार का सदुपयोग करता है, वह तो कर्मबन्‍धन से छूटकर परमपद को प्राप्त हो जाता है और जो सदुपयोग करता है, वह दण्‍ड का भागी होता है तथा उससे यह अधिकार छीन लिया जाता है अर्थात उसे पुन: सूकर-कूकरादि योनियों में ढकेल दिया जाता है । इस रहस्‍य को समझकर मनुष्‍य को इस अधिकार का सदुपयोग करना चाहिये ।
  4. मनुष्‍य कर्मों का फल प्राप्त करने में कभी किसी प्रकार भी स्‍वतन्‍त्र नहीं है । उसके कौन से कर्म का क्‍या फल होगा और वह फल उसको किस प्रकार प्राप्‍त होगा – इसका न तो उसको कुछ पता है और न वह अपने इच्‍छानुसार समय पर उसे प्राप्त कर सकता है अथवा न उससे बच ही सकता है । मनुष्‍य चाहता कुछ और है और होता कुछ और ही है ।
  5. मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा किये हुए शास्‍त्र विहित कर्मों में और उनके फल में ममता, आसक्त‍ि, वासना, आशा,
  6. योग में स्थित होकर कर्म करने के लिये कहकर भगवान् ने यह भाव दिखलाया है कि केवल सिद्धि और असिद्धि में ही समत्‍व रखने से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रत्‍येक क्रिया के करते समय भी तुमको किसी भी पदार्थ में, कर्म में, या उसके फल में अथवा किसी भी प्राणी में विषमभाव न रखकर नित्‍य समभाव में स्थिर रहना चाहिये ।
  7. योग में स्थित होकर कर्म करने के लिये कहकर भगवान् ने यह भाव दिखलाया है कि केवल सिद्धि और असिद्धि में ही समत्‍व रखने से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रत्‍येक क्रिया के करते समय भी तुमको किसी भी पदार्थ में, कर्म में, या उसके फल में अथवा किसी भी प्राणी में विषमभाव न रखकर नित्‍य समभाव में स्थिर रहना चाहिये ।जिसमें ममता, आसक्ति और कामना का त्‍याग करके समबुद्धिपूर्वक कर्तव्‍य कर्म का अनुष्ठान किया जाता है, उस कर्मयोग का वाचक यहाँ बुद्धियोगात् पद है; क्‍योंकि उनचालीसवें श्‍लोक में योगे त्विमां श्रृणु अर्थात् अब तुम मुझसे इस बुद्धि को योग में सुनो, यह कहकर भगवान् ने कर्मयोग का वर्णन आरम्‍भ किया है । इसके सिवा इस श्‍लोक में फल चाहने वालों को कृपण बतालाया गया है और अगले श्‍लोक में बुद्धियुक्त पुरूष की प्रशंसा करके अर्जुन को कर्मयोग के लिये आज्ञा दी गई है और यह कहा गया है कि बुद्धियुक्त मनुष्‍य कर्मफल का त्‍याग करके अनामय पद को प्राप्‍त हो जाता है (गीता २।५१); इस कारण भी यहाँ बुद्धियोगात् पद का अर्थ कर्मयोग ही है ।

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