"गीता प्रबंध -अरविन्द पृ. 169": अवतरणों में अंतर
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०८:१४, २२ सितम्बर २०१५ के समय का अवतरण
दिव्य जन्म को प्राप्त होना - अर्थात् जीव का किसी उच्चतर चेतना में उठकर दिव्य अवस्था को प्राप्त कराने वाले नवजन्म को प्राप्त होना - और दिव्य कर्म करना , सिद्धि से पहले साधन के तौर पर और पीछे उस दिव्य जन्म की अभिव्यक्ति के तौर पर , यही गीता का संपूर्ण कर्मयोग है। गीता दिव्य कर्म के ऐसे बाह्म लक्षण नहीं बतलाती जिनसे बाह्म दृष्टि से उसकी पहचान की जा सके या लौकिक आलोचना - दृष्टि से उसकी जांच की जा सके ; सामान्य नीति धर्म के जो लक्षण हैं जिनसे मनुष्य अपनी बुद्धि के अनुसार कर्तव्याकर्तव्य निश्चित करते हैं उन लक्षणों को भी गीता ने जान - बूझकर त्याग दिया है । गीता जिन लक्षणों से दिव्य कर्म की पहचान कराती है वे अत्यंत निगूढ और अंत: स्थित हैं ; जिस मुहर से दिव्य कर्म पहचाने जाते हैं वह अलक्ष्य, आध्यात्मिक और नीतिधर्म से परे है। दिव्य कर्म आत्मा से उद्भूत होते हैं ओर केवल आत्मा के प्रकाश से ही पहचाने जा सकते हैं । ‘‘ बड़े - बड़े ज्ञानी भी , ‘ कर्म क्या है और अकर्म क्या है ” , इसका निश्चय करने में मोहताज हो जाते हैं ”क्योंकि व्यवहारिक , सामाजिक , नैतिक और बौद्धिक मानदंड से वे इनके बाह्म लक्षणों को ही पहचान पाते हैं , इनकी जड़ तक नहीं पहुच पाते ; ‘मैं तुझे वह कर्म बतलाऊंगा जिसे जानकर तू अशुभ से मुक्त हो जायेगा। कर्म क्या है इसको जानना होगा , विकर्म क्या है इसको भी जनाना होगा और अकर्म क्या है यह भी जान लेना होगा ; कर्म की गति गहन है।”२ संसार में कर्म जंगल - सा है , जिसमें मनुष्य अपने काल की विचारधारा , अपने व्यक्तित्व के मानदंड और अपनी परिस्थिति के अनुसार लुढ़कता - पुढ़कता चलता है ; ओर ये विचार और मान शासक एक ही काल या एक ही व्यक्तित्व को नहीं , बल्कि अनेक कालों और व्यक्तित्वों को लिये हुए होते है , अनेक सामाजिक अवस्थाओं के विचार और नीति - धर्म तह - पर - तह जमरक आपस में बंधे होते और यद्यपि इनका दावा होता है कि ये निरपेक्ष ओर अविनाशी है फिर भी तात्कालिक और रूढिगत ही होते हैं , यद्यपि ये अपने को सद्युक्ति की तरह दिखाने का ढोंग करते हैं पर होते अशास्त्रीय ओर अयौक्तिक ही। इस सबके बीच सुनिश्चित कर्म - विधान के किसी महत्म आधार और मूल सत्य को ढूंढता हुआ ज्ञानी अंत में ऐसी जगह जा पहुंचता है जहां यही अंतिम प्रश्न उसके सामने आता है कि यह सारा कर्म और जीवन केवल एक भ्रमजाल तो नहीं है और कर्म को सर्वथा परित्याग कर अकर्म को प्राप्त होना ही क्या इस थके हुए , भ्रांतियुक्त मानवजीव के लिये अंतिम आश्रय नहीं है। परंतु श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस बारे में ज्ञानी भी भ्रम में पड़ते और मोहित हो जाते हैं। क्योंकि ज्ञान और मोक्ष कर्म से मिलते है, अकर्म से नहीं ।
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