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आर्केसिलाउस
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| पुस्तक नाम | हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1 |
| पृष्ठ संख्या | 430 |
| भाषा | हिन्दी देवनागरी |
| संपादक | सुधाकर पाण्डेय |
| प्रकाशक | नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी |
| मुद्रक | नागरी मुद्रण वाराणसी |
| संस्करण | सन् 1964 ईसवी |
| उपलब्ध | भारतडिस्कवरी पुस्तकालय |
| कॉपीराइट सूचना | नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी |
| लेख सम्पादक | भोलानाथ शर्मा |
आर्केसिलाउस (अथवा सिसरोया किकरो के अनुसार आर्केसिलास्) एक यूनानी दार्शनिक जो संदेहवाही अकादेमी के प्रवर्तक थे। इनका समय ई.पू. 315 से ई.पू. 214-5 तक है। इनका जन्मस्थान पिताने नगर था। एथेंस में आकर प्रथम यह अरस्तू के लीकियुम में थियफ्रोास्तस् के शिष्य बने, पर क्रांतर नामक विद्धान् इन्हें प्लातोन की आकदेमी में ले आया। ई. पू. 238-8 के लगभग ये अपनी प्रतिभा के कारण अकादेमी के अध्यक्ष बन गए। इनकी कोई भी रचना नहीं मिलती। इन्होंने स्तोइक (विरक्तिवादी) दार्शनिकों के 'विश्वासोत्पादक प्रत्यक्ष' का खंडन कर संदेहवाद का प्रतिपादन किया और सुकरात की विवेचनापद्धति को पुन: प्रतिष्ठित किया। पर यह समझ में नहीं आता कि इस संदेहवाद की संगति अकादमी के संस्थापक प्लातोन के विचारों के साथ कैसे संभव हुई।
टीका टिप्पणी और संदर्भ