महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 57 श्लोक 1-18

अद्‌भुत भारत की खोज
Bharatkhoj (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित ११:१२, ३ जुलाई २०१५ का अवतरण
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ

सत्तावनवाँ अध्‍याय: अनुशासनपर्व (दानधर्मपर्व)

महाभारत: अनुशासनपर्व: सत्तावनवाँ अध्याय: श्लोक 1-28 का हिन्दी अनुवाद

विविध प्रकार के तप और दानों का फल युधिष्ठिर ने कहा- पितामह। इस पृथ्वी को जब मैं उन सम्पतिशालीनरेशों से हीन देखता हूं तब भारी चिन्ता में पड़कर बारंबार मूर्छित-सा होने लगता हूं।भरतनन्दन। पितामह। यद्यपि मैंने इस पृथ्वी को जीतकर सैकड़ों देशों के राज्यों पर अधिकार पाया है तथापि इसके लिये जो करोड़ों पुरूषों की हत्सा करनी पड़ी है, उसके कारण मेरे मन में बड़ा संताप हो रहा है।हाय। उन बेचारी सुन्दरी स्त्रियों की क्या दशा होगी जो आज अपने पति, पुत्र, भाई और मामा आदि सम्बन्धियों से सदा के लिये विछुड़ गयी हैं । हम लोग अपने ही कुटुम्बीजन कौरवों तथा अन्य सुहृदों का वध करके नीचे मुंह किये नरक में गिरेंगे, इसमें संशय नहीं है। भारत। प्रजानाथ। मैं अपने शरीर को कठोर तपस्या के द्वारा सुखा डालना चाहता हूं और इसके विषय में आपका यथार्थ उपदेश ग्रहण करना चाहता हूं। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय। युधिष्ठिर का यह कथन सुनकर महामनस्वी भीष्मजी ने अपनी बुद्वि के द्वारा उस पर भलिभांति विचार करके उनसे इस प्रकार कहा-प्रजानाथ। मैं तुम्हे एक अद्भुत रहस्य की बात बताता हूं मनुष्य को मरने पर किस कर्म से कौन-सी गति मिलती है- इस विषय को सुनो। प्रभो तपस्या से स्वर्ग मिलता है, तपस्या से सुयश की प्राप्ति होती है तथा तपस्या से बड़ी आयु, ऊंचा पद और उत्तमोत्तम भोग प्राप्त होते हैं। ‘ भरतश्रेष्ठ। ज्ञान, विज्ञान, आरोग्य, रूप, संपत्ति तथा सौभाग्य भी तपस्या से प्राप्त होते हैं। मनुष्य तप करने से धन पाता है। मौन-व्रत के पालन से दूसरों पर हुक्म चलाता है। दान से उपभोग और ब्रम्हचर्य के पालन से दीर्घआयु प्राप्त करता है। अहिंसा का फल है रूप और दीक्षा का फल है उत्तम कुल में जन्म। फल-मूल खाकर रहने वालों को राज्य और पत्ता चबाकर तप करने वालों को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। ‘दूध पीकर रहने वाला मनुष्य स्वर्ग को जाता है और दान देने से वह अधिक धनवान होता है। गुरू की सेवा करने से विद्या और नित्य श्राद्व करने से संतान की प्राप्ति होती है। ‘जो केवल साग खाकर रने का नियम लेता है वह गोधन से सम्पन्न होता है। तृण खाकर रहने वाले मनुष्यों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। तीनों काल में स्नान करने से बहुतेरी स्त्रियों की प्राप्ति होती है और हवा पीकर रहने से मनुष्य को यज्ञ का फल प्राप्त होता है।राजन। जो द्विज नित्य स्नान करके दोनों समय संध्योपासना और गायत्री-जप करता है वह चतुर होता है। मरूकी साध्ना-जल का परित्याग करने वाले तथा निराहार रहने वाले को स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।‘मिट्टी की वेदी या चबूतरों पर सोने वालों को घर और शैय्याऐं प्राप्त होती हैं। चीर और वल्क के वस्त्र पहनने से उत्तमोत्तम वस्त्र और आभूषण प्राप्त होते हैं। ‘योगयुक्त तपोधन को शैय्या, आसन और वाहन प्राप्त होते हैं। नियमपूर्वक अग्नि में प्रवेश कर जाने पर जीव को ब्रह्मलोकमें सम्मान प्राप्त होता है। ‘रसों का परित्याग करने से मनुष्य वहां सौभाग्य का भागी होता है। मांस-भक्षण का त्याग करने से दीर्घायु संतान उत्पन्न होती है । ‘जो जल में निवास करता है वह राजा होता है। नरश्रेष्ठ सत्यवादी मनुष्य स्वर्ग में देवताओं के साथ आनन्द भोगता है। ‘दान से यश, अहिंसा से अरोग्य तथा ब्राह्माणों की सेवा में राज्य एवं अतिशयब्राह्माणत्व की प्राप्ति होती है।‘जल दान करने से मनुष्य को अक्षय कीर्ति प्राप्त होती है, तथा अन्न-दान करने से मनुष्य को काम और भोग से पूर्णतः तृप्ति मिलती है । ‘जो समस्त प्राणियों को सान्त्वना देता है, वह सम्पूर्ण शोकों से मुक्त हो जाता है, देवाताओं की सेवा से राज्य और दिव्य रूप प्राप्त होते हैं । ‘मन्दिर में दीपक का प्रकाश दान करने से मनुष्य का नेत्र नीरोग होता है। दर्षनीय वस्तुओं का दान करने से मनुष्य स्मरण शक्ति और मेधा प्राप्त कर लेता है। ‘गन्ध और पुण्य-माला दान करने से प्रचुर यश की प्राप्ति होती है। सिर के बाल और दाढ़ी-मूंछ धारण करने वालों को श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होती है । ‘पृथ्वीनाथ। बारह वर्षों तक सम्पूर्ण भोगों का त्याग, दीक्षा (जप आदि नियमों का ग्रहण) तथा तीनों समय स्नान करने से वीर पुरूषों की अपेक्षा भी श्रेष्ठ गति प्राप्ति होती है। ‘नरश्रेष्ठ। जो अपनी पुत्री का ब्रह्म विवाह की विधि से सुयोग्य वर को दान करता है, उसे दास-दासी, अलंकार, क्षेत्र और घर प्राप्त होते हैं । ‘भारत। यज्ञ और उपवास करने से मनुष्य स्वर्गलोक में जाता है तथा फल-फूल का दान करने वाला मानव कल्याणमय मोक्षस्वरूप ज्ञान प्राप्त कर लेता है । ‘सोने से मढ़े हुए सींगों द्वारा सुशोभित होने वाली एक हजार गौओं का दान करने से मनुष्य स्वर्ग में पुण्यमय देवलोक को प्राप्त होता है- ऐसा स्वर्गवासी देववृन्द कहते हैं। जिसके सींगों के अग्र भाग में सोना मढ़ा हुआ हो, ऐसी गाय का कांस से बने हुए दुग्धपात्र और बछड़े समेत जो दान करता है, उस पुरूष के पास वह गौ उन्हीं गुणों से युक्त कामधेनु होकर आती हैं ।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्व के अन्‍तगर्त दानधर्मपर्वमें च्‍यवन और कुशिका का संवादविषयक सत्तावनवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।


« पीछे आगे »

टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख