इन्हीं की कृपा से युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन एवं नकुल-सहदेव की उत्पत्ति हुई। पति प्रिया कुन्ती ने पति के सबसे धर्म-रहस्य की बातें सुनकर पुत्र पाने की इच्छा से मन्त्र जाप पूर्वक स्तुति द्वारा धर्म, वायु और इन्द्र देवता का आवाहन किया। कुन्ती के उपदेश देने पर माद्री भी उस मन्त्र विद्या को जान गयी और उसने संतान के लिये दोनों अश्विनी कुमारों का आवाहन किया। इस प्रकार इन पाँचों देवताओं से पाण्डवों की उत्पत्ति हुई। पाँचों पाण्डव अपनी दोनों माताओं द्वारा ही पाले-पोसे गये। वे वनों में और महात्माओं के परम पुण्य आश्रमों मे ही तपस्वी लोगों के साथ दिनों- दिन बढ़ने लगे। (पाण्डु की मृत्यु होने के पश्चात) बड़े-बड़े ऋषि मुनि स्वयं ही पाण्डवों को लेकर धृतराष्ट्र एवं उनके पुत्रों के पास आये। उस समय पाण्डव नन्हे नन्हे शिशु के रूप में बड़े ही सुन्दर लगते थे। वे सिर पर जटा धारण किये ब्रह्मचारी के वेश में थे। ऋषियों ने वहाँ जाकर धृतराष्ट्र एवं उनके पुत्रों से कहा- ‘ये तुम्हारे पुत्र, भाई, शिष्य और सुहृद हैं। ये सभी महाराज पाण्डु के ही पुत्र हैं। इतना कहकर वे मुनि वहाँ से अंर्तधान हो गये। ऋषियों द्वारा लाये हुए उन पाण्डवों को देखकर सभी कौरव और नगर निवासी, शिष्ट तथा वर्णाश्रमी हर्ष से भरकर अत्यन्त कोलाहल करने लगे। कोई कहते, ’ये पाण्डु के पुत्र नहीं हैं।‘ दूसरे कहते, ‘अजी! ये उन्हीं के हैं।‘ कुछ लोग कहते, ‘जब पाण्डु को मरे इतने दिन हो गये, तब ये उनके पुत्र कैसे हो सकते हैं? फिर सब लोग कहने लगे, ‘हम तो सर्वथा इनका स्वागत करते हैं। हमारे लिये बड़े सौभाग्य की बात है कि आज हम महाराज पाण्डु की संतान को अपनी आँखों से देख रहे हैं।‘ फिर तो सब ओर से स्वागत बोलने वालों की ही बातें सुनायी देने लगीं। दर्शकों का वह तुमुल शब्द बंद होने पर सम्पूर्ण दिशाओं को प्रतिध्वनित करती हुई अद्दश्य भूतों-देवताओं की यह सम्मिलित आवाज (आकाशवाणी) गूँज उठी-‘ये पाण्डव ही हैं’। जिस समय पाण्डवों ने नगर में प्रवेश किया, उसीसमय फूलों की वर्षा होने लगी, सब ओर सुगन्ध छा गयी तथा शंख और दुन्दुभियों के मांगलिक शब्द सुनायी देने लगे। यह एक अदभुत चमत्कारी सी बात हुई। सभी नागरिक पाण्डवों के प्रेम से आनन्द में भरकर ऊँचे स्वर से अभिनन्दन ध्वनि करने लगे। उनका वह महान शब्द स्वर्गलोक तक गूँज उठा जो पाण्डवों की कीर्ति बढ़ाने वाला था। वे सम्पूर्ण वेद एवं विविध शास्त्रों का अध्ययन करके वहीं निवास करने लगे। सभी उनका आदर करते थे और उन्हें किसी से भय नहीं था। राष्ट्र की सम्पूर्ण प्रजा के शौचाचार, भीमसेन की धृति, अर्जुन के विक्रम तथा नकूल सहदेव की गुरू शुश्रूषा, क्षमाशीलता और विनय से बहुत ही प्रसन्न होती थी। सब लोग पाण्डवों के शौर्य गुण से संतोष का अनुभव करते थे[१]।
तदनन्तर कुछ काल के पश्चात राजाओं के समुदाय में अर्जुन ने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके स्वयं ही पति चुनने वाली द्रुपदकन्या कृष्णा को प्राप्त किया। तभी से वे इस लोक में सम्पूर्ण धर्नुधारियों के पूज्यनीय (आदरणीय) हो गये; और समरांगण में प्रचण्ड मार्तण्ड की भाँति प्रतापी अर्जुन की ओर किसी के लिये आँख उठाकर देखना भी कठिन हो गया। उन्होंने पृथक-पृथक तथा महान संघ बनाकर आये हुए सब राजाओं को जीतकर महाराज युधिष्ठिर के राजसूय नामक सहायज्ञ को सम्पन्न कराया। भगवान श्रीकृष्ण की सुन्दर नीति और भीमसेन तथा अर्जुन की शक्ति से बल के घमण्ड में चूर रहने वाले जरासन्ध और चेदिराज शिशुपाल को मरवाकर धर्मराज युधिष्ठिर ने महायज्ञ राजसूय का सम्पादन किया। वह यज्ञ सभी उत्तम[२] गुणों से सम्पन्न था। उसमें प्रचुर अन्न और पर्याप्त दक्षिणा का वितरण किया गया था। उस समय इधर- उधर विभिन्न देशों तथा नृपतियों के यहाँ से मणि सुवर्ण रत्न गाय, हाथी, घोड़े, धन-सम्पत्ति, विचित्र वस्त्र, तम्बू, कनात, परदे, उत्तम कम्बल, श्रेष्ठ मृगचर्म तथा रंकुनामक मृग के बालों से बने हुए कोमल बिछौने आदि जो उपहार की बहुमूल्य वस्तुएँ आतीं, वे दुर्योधन के हाथ में दी जातीं-उसी के देख-रेख में रखी जाती थीं।
|