महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 1 श्लोक 19-33

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प्रथम अध्याय: शान्तिपर्व (राजधर्मानुशासनपर्व)

महाभारत: शान्तिपर्व : प्रथम अध्याय: श्लोक 25- 44 का हिन्दी अनुवाद

कुन्ती नन्दन श्वेतवाहन अर्जुन भी उन्हें भाई के रूप में नहीं जानते थे। मुझको, भीमसेन तथा नकुल- सहदेव को भी इस बात का पता नहीं था; किंतु उत्तम व्रत का पालन करने वाले कर्ण हमें अपने भाई के रूप में जानते थे। सुनने में आया है कि मेरी माता कुन्ती हम लोगों में संधि कराने की इच्छा से उनके पास गयीं थीं और उन्हें बताया था कि ’तुम मेरे पुत्र हो',परंतु महामनस्वी कर्ण ने माता कुन्ती की यह इच्छा पूरी नहीं की। हमने यह भी सुना है कि उन्होनें पीछे माता कुन्ती को यह जबाव दिया कि 'मैं युद्ध के समय राजा दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ सकता; क्यों कि ऐसा करने से मेरी नीचता, क्रूरता और कृतघ्नता सिद्ध होगी।' माता जी! यदि तुम्हारे मत के अनुसार मैं इस समय युधिष्ठिर के साथ संधि कर लूं तो सब लोग यही समझेंगे कि ’कर्ण युद्ध में अर्जुन से डर गया।' अतः मैं पहले समरांग्डण में श्रीकृष्ण सहित अर्जुन को परास्त करके पीछे धर्मपुत्र यधिष्ठिर के साथ संधि करूंगा, ऐसी बात उन्होने कही। तब कुन्ती ने चौड़ी छाती वाले कर्ण से फिर कहा- ’बेटा! तुम इच्छानुसार अर्जुन से युद्ध करो; किंतु अन्य चार भाइयों को अभय दे दो’। इतना कहकर माता कुन्ती थर्थर कांपने लगीं। तब बुद्धिमान कर्ण ने हाथ जोड़कर माता से कहा- ’देवि! तुम्हारे चार पुत्र मेरे वश में आ जायेंगे तो भी मैं उनका वध नहीं करूंगा। तुम्हारे पाँच पुत्र निश्चित रूप से बने रहेंगे। यदि कर्ण मारा गया तो अर्जुन सहित तुम्हारे पाँच पुत्र होंगे और यदि अर्जुन मारे गये तो वे कर्ण सहित पाँच होंगे। तब पुत्रों का हित चाहने वाली माता ने पुनः अपने ज्येष्ठ पुत्र से कहा- ’बेटा जिन चारों भाइयों का कल्याण करना चाहते हो, उनका अवश्य भला करना’ ऐसा कहकर माता कर्ण को छोड़कर लौट आयीं। उस वीर सहोदर भाई को भाई अर्जुन ने मार डाला।

प्रभो! इन गुप्त रहस्यों को न तो माता कुन्ती ने प्रकट किया और न कर्ण ने ही। द्विजश्रेष्ठ! तदनन्तर युद्धस्थल में महाधनुर्धर शूरवीर कर्ण अर्जुन के हाथ से मारे गये। प्रभो! मुझे तो माता कुन्ती के ही कहने से बहुत पीछे यह बात मालूम हुई है कि ’कर्ण हमारे ज्येष्ठ एवं सहोदर भाई थे।’ मैंने भाई की हत्या करायी है; इसलिये मेरे हृदय को तीव्र वेदना हो रही है। कर्ण और अर्जुन की सहायता पाकर तो मैं देवराज इन्द्र को भी जीत सकता था। कौरव सभा में जब दुरात्मा धृतराष्ट-पुत्रों ने मुझे बहुत क्लेश पहुंचाया, तब सहसा मेरे हृदय में क्रोध प्रकट हो गया; परंतु कर्ण को देखकर वह शान्त हो गया। जब धृतराष्ट सभा में दुर्योधन के हित की इच्छा से वे बोलने लगते और मैं उनकी कड़बी एवं रूखी बातें सुनता, उस समय उनके पैरों को देखकर मेरा बढ़ा हुआ रोष शान्त हो जाता था। मेरा विश्वास है कि कर्ण के दोनों पैर माता कुन्ती के चरणों के सदृश थे। कुन्ती और कर्ण के पैरों में इतनी समानता क्यों है? इसका कारण ढूँढता हुआ मैं बहुत सोचता- विचारता, परंतु किसी तरह कोई कारण नहीं समझ पाता था। नारद जी! संग्राम में कर्ण के पहिये को पृथ्वी क्यों निगल गयी और मेरे बड़े भाई कर्ण को कैसे यह शाप प्राप्त हुआ? इसे आप ठीक-ठीक बताने की कृपा करें। भगवन! मैं आपसे यह सारा वृत्तान्त यथार्थ रूप से सुनना चाहता हॅूं; क्यों कि आप सर्वश विद्वान हैं और लोक में जो भूत और भविष्य काल की घटनाएं हैं, उन सबको जानते हैं।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासन पर्व में कर्ण की पहचान विषयक पहला अध्याय पूरा हुआ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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