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लेख सूचना
अंग्रेज़ी भाषा
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1
पृष्ठ संख्या 17,18,19
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पाण्डेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1973 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक फ़ीरोज ईदुलजी दस्तूर

अंग्रेजी भाषा अंग्रेजी का इतिहास एक ऐसी भाषा का इतिहास है जिसका यदि अकिंचन है, पर जो विकसित होते-होते संसार की किसी भी अन्य भाषा की अपेक्षा विश्व भाषा बन जाने के समीप आ पहुँची है। भारत यूरोपीय (इंडो-यूरोपियन) भाषा परिवार की जर्मन भाषा की बोलियों के एक समूह के रूप में इसका जन्म हुआ। आधुनिक डच तथा फ्ऱीजियाई भाषाओं के अनेक रूपों से इसका घनिष्ट संबंध था। डेनमार्क, नार्वे और स्वीडन में बोली जाने वाली भाषाओं का प्रारंभिक रूप इसके निकट के नातेदार थे और आधुनिक जर्मन के पूर्व रूप से भी इसका दूर का संबंध था। ऐंग्ल, सैक्सन तथा जूट नामक जर्मन कबीलों के आक्रमण के साथ यह भाषा ईसा की पाँचवीं तथा छठी शताब्दी में ब्रिटेन पहुँची। इन कबिलों ने ब्रिटेन के आदिवासियों को भगा दिया था गुलाम बना लिया, और वे स्वयं देश में बस गए। मूल ब्रिटेनवासियों की कल्टी बोली को हटाकर विजेताओं की इंग्लिश भाषा स्थानापन्न हुई और उसी के नाम से देश का नाम भी बदलकर इंग्लैंड पड़ गया।

विजेताओं की तीन प्रमुख बोलियों में से पश्चिमी सैक्सन नामक बोली की कालांतर में प्रधानता हो गई। उस युग की अंग्रेजी को हम आज प्राचीन अंग्रेजी (ओल्ड इंग्लिश) अथवा ऐंग्लो-सैक्सन कहते हैं। प्राचीन अंग्रेजी की सभी बोलियाँ आज की अंग्रेजी से दो-तीन महत्वपूर्ण बातों में भिन्न थीं। आधुनिक अंग्रेजी की अपेक्षा प्राचीन अंग्रेजी का व्याकरण संबंधी गठन कहीं अधिक जटिल था। संज्ञा के अनेक रूप बनते थे और कारक भी अनेक होते थे जिनका एक-दूसरे से भेद विविध संयोगात्मक रूपों से जाना जाता था। निस्संदेह यह संस्कृत भाषा के रूप विधान की भाँति जटिल नहीं था, फिर भी पर्याप्त क्लिष्ट था। इसके विपरीत आधुनिक अंग्रेजी में रूपात्मक जटिलता बहुत कम पाई जाती है और उसका गठन फारसी की सरलता के समीप है। प्राचीन और अर्वाचीन अंग्रेजी के रूपों में एक और अंतर है जो भारत यूरोपीय परिवार की भाषाओं में समानत: प्रतिबिंबित है। भारत यूरोपीय परिवार की अनेक भाषाओं में आज भी आधुनिक अंग्रेजी के प्राकृतिक लिंगभेद के विपरीत व्याकरणीय लिंगभेद वर्तमान है। यह व्याकरणीय लिंगभेद प्राचीन अंग्रेजी में भी विद्यमान था। उदाहरणार्थ प्राचीन अंग्रेजी में लिंग का निर्धारण पुरुषवाचक या स्त्रीवाचक शब्द के आधार पर नहीं किया जाता था, जैसा आज की अंग्रेजी में किया जाता है, बल्कि शब्द के रूप अथवा रूपात्मक प्रत्यय के आधार पर होता था, आधुनिक अंग्रेजी के शब्द ¢ वाइफ़¢ (पत्नी) का प्राचीन अंग्रेजी रूप ¢ विफ¢ (WIF) नपुंसक लिंग था, जब कि इसी शब्द का पूर्ण रूप ¢ विफमन¢ (wifman), जिसका आधुनिक अंग्रेजी रूप, ¢ वूमन¢ (स्त्री) है, पुल्लिंग ¢ मोन¢ जाता था। इसी प्रकार ¢ मोना¢ (mona), आधुनिक ¢ मून¢ (चंद्रमा), पुल्लिंग था, लेकिन ¢ सन्न¢ (sunna), आधुनिक ¢ सन¢ (सूर्य), स्त्रीलिंग था।

प्राचीन अंग्रेजी और उसकी वंशज आधुनिक अंग्रेजी में तीसरा भेद शब्दावली की प्रकृति का है। प्राचीन अंग्रेजी का शब्दावली की प्रकृति का है। प्राचीन अंग्रेजी का शब्द भंडार अपेक्षाकृत अमिश्रित था, जब कि आधुनिक का अतिमिश्रित है। यह सच है कि प्राचीन अंग्रेजी में जर्मन शब्दों के अतिरिक्त अन्य उद्गमों के भी कुछ शब्द थे। उदाहरणार्थ ऐंग्लो-सैक्सन जातियों के पूर्वजों ने अपने यूरोपीय निकायकाल में कतिपय लातीनी शब्द ले लिए थे। तदुपरांत ब्रिटेन में बसने पर कुछ और लातीनी राज्य अपना लिए गए थे, क्योंकि चार शताब्दियों तक ब्रिटेन रोमन साम्राज्य के अधीन रह चुका था। ईसाई धर्म स्वीकार कर लेने के बाद तो लातीनी शब्दों की संख्या और भी अधिक बढ़ गई। आदिवासी ब्रिटेनों की बोली के भी लगभग एक दर्जन केल्टी शब्द प्राचीन अंग्रेजी में प्रविष्ट हो गए थे। आठवीं शताब्दी के बाद से ब्रिटेन में स्कैंडिनेवियाइयों की संख्या में यथेष्ट वृद्धि होते रहने के कारण प्राचीन अंग्रेजी के इतिहास के उत्तरार्ध में डेनी तथा नार्वेई भाषाओं के शब्द भी आ मिले थे।

आठवीं शताब्दी के बाद से अंग्रेजों के ही भाई बंधु डेनमार्क तथा नार्वे के निवासियों ने उनकी मातृभूमि इंग्लैंड पर आक्रमण करना प्रारंभ कर दिया और अंत में सन्‌ 1017 से 1042 ई. तक उन्होंने उस पर अपना प्रभुत्व जमा लिया। फिर भा प्राचीन अंग्रेजी में संपूर्ण शब्दकोश में सब मिलाकर भी शेष योग इन ऐतिहासिक परिवर्तनों के फलस्वरूप नहीं हुआ, क्योंकि आज के जर्मनों की भाँति ऐंग्लो-सैक्सन भी अन्य भाषाओं में शब्द ग्रहण करने के प्रतिकूल थे, और अपने आज के वंशजों की अपेक्षा वे कहीं अधिक अपनी भाषा के मूल स्रोतों पर निर्भर रहते थे। जब कभी कोई नवीन विचार अथवा अभिनय अनुभव अभिव्यक्ति की अपेक्षा करता था, तब वे विदेशी शब्द उधार लेने के स्थान पर अधिकतर अपनी ही मूल भाषा की सामग्री के आधार पर शब्द गढ़ लेते थे। इसके विपरीत आधुनिक अंग्रेजी अपने शब्दकोश में विदेशी शब्दों का स्वागत करती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इसके फलस्वरूप आज अंग्रेजों के शब्दकोश में प्रति चार शब्दों में लगभग तीन शब्द विदेशी उद्गम के हैं। गणना करने से विदित हुआ कि आज की अंग्रेजी में लगभग 15 प्रतिशत शब्द ही प्राचीन अंग्रेजी के रह गए हैं।

जिस प्राचीन अंग्रेजी की चर्चा हम करते आए हैं, उसका काल लगभग सन्‌ 450 से 1100 ई. तक रहा, क्योंकि 1066 में इंग्लैंड में नार्मन विजयी हुए। इसके फलस्वरूप भाषा के गठन और शब्द भंडार दोनों में प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से विलक्षण परिवर्तन हुए। इस भाषा के इतिहास ने अब एक नए युग में प्रवेश किया। यह स्थिति प्राय: 1500 ई. तक रही। सुविधानुसार इसे मध्य अंग्रेजी (मिडिल इंग्लिश) काल कहा जाता है। इसी काल में भाषा में वे विशेषताएँ विकसित हुईं अब वह प्राचीन अंग्रेजी से स्पष्ट रूप से भिन्न हो गई।

नार्मन विजय के फलस्वरूप इंग्लैंड पर फ्रांस के राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा भाषा संबंधी प्रभत्व के एक सुदीर्घ युग का सूत्रपात हुआ। इंग्लिश चैनल पार के विदेशियों द्वारा इंग्लैंड के राजदरबार, गिरजाघर, स्कूल, न्यायालय आदि सभी दीर्घ काल तक शासित रहे। इस विजय का भाषा संबंधी तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि पश्चिमी सैक्सन को हटाकर फ्रेंच ही शासन और सभ्यता की भाषा बन बैठी। पराजित तथा तिरस्कृत ऐंग्लो-सैक्सन जाति की मातृभाषा अपनी समस्त बोलियों के साथ इस प्रकार अपदस्थ होकर जनसाधारण की ¢ वर्नाक्यूलर¢ मानी जाने लगी। बहुत समय तक इसका उपयोग न तो फ्रांसीसी शासकों ने किया और न उनके घनिष्ठ संपर्क में रहने वाले इंग्लैंड निवासियों ने। शासक और शासकीय वर्ग केवल फ्रेंच बोलते थे, फ्रेंच लिखते थे, अथवा इसके उस रूप का प्रयोग करते थे जिसे ऐंग्लो-फ्रेंच अथवा ऐंग्लो-नार्मन कहते हैं। पराजित होने के कारण अंग्रेजी में लिखना पूर्ण रूप में बंद नहीं हुआ, किंतु यह अकिंचन स्वदेशवासियों तक ही सीमित रहा। उसके पाठक भी लेखकों के समान ही अकिंचन थे। इसके अतिरिक्त यह लिखना प्रधानतया पश्चिमी सैक्सन में नहीं होता था, बल्कि प्रत्येक लेखक अपने-अपने क्षेत्र की बोली में लिखता था।

किंतु शासकीय अल्पवर्ग की भाषा पर शासित बहुसंख्यक लोगों की स्वदेशी भाषा की विजय देर-सवेर अवश्यंभावी थी। १३वीं शताब्दी के प्रारंभ (1206) में इंग्लैंड के फ्रांसीसी प्रभु नार्मडी हार गए, और सन्‌ 1244 ई. में फ्रांसीसियों की इंग्लैंड स्थित कुल जागीरें और संपत्ति जब्त कर ली गई। इन राजनीतिक घटनाओं के फलस्वरूप देश के स्वदेशी एक विदेशी दोनों ही वर्ग मिलकर एक हो गए। शीघ्र ही वह समय आ गया जब अंग्रेजी न बोल सकने वाले हीन और घृणित समझे जाने लगे। यह सही है कि बहुत समय तक फ्रेंच न जानने वालों को गंवार समझा जाता रहा और फ्रेंच ही संस्कृति की भाषा बनी रही। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि 14वीं शताब्दी के मध्य तक यह स्थिति आ पहुँची कि अनेक सामंत भी फ्रेंच नहीं जानते थे, किंतु अंग्रेजी सभी जानते थे। लहर धीरे-धीरे पलट रही थी। इस शताब्दी के अंत तक, अंग्रेजी फिर से विद्यालयों में अधिकांश शिक्षा का माध्यम बन गई और संभ्रांत कुलों के बच्चों ने भी फ्रेंच पढ़ना छोड़ दिया। जब यह सब हो रहा था उसी समय एक महान प्रतिभा ने अंग्रेजी में साहित्य सृजन आरंभ किया जिसका प्रभाव उसके समकालीन लेखकों पर ही नहीं बल्कि भावी साहित्यकारों पर भी एक शताब्दी तक रहा। इस महान लेखक का नाम ज्योफ़े चॉसर था, जो ¢ कैटरबरी टेल्स¢ के अमर कवि के रूप में सुविख्यात हुआ। यह अमर काव्य अंग्रेजी की पूर्वी मध्यदेशी बोली में लिखा गया जिससे सहज ही इस बोली और अंग्रेजी को अपूर्व गौरव प्राप्त हुआ और इसकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई।

जिस पूर्वी मध्यदेशी (मिडलैंड) बोली में चॉसर ने अपने काव्य की पुष्टि की, वही लंदन, आक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज में बी बोली जाती थी। आक्सफर्ड और कैंब्रिज में ही उस समय इंग्लैंड के मात्र दो विश्वविद्यालय थे। अत: कालांतर में यही बोली साहित्यिक अभिव्यक्ति की मान्य भाषा हुई। यह सत्य है कि अगली कई शताब्दियों तक अंग्रेज जनसाधारण अपनी-अपनी स्थानीय बोलियाँ बोलते रहे, और वे इसकी चिंता नहीं करते थे कि उनकी बोली भाषा के किसी मान्य आदर्श के अनुरूप है अथवा नहीं। किंतु १२वीं शताब्दी तक यह मान्यता प्रतिष्ठित हो गई थी कि जो दोनों लंदन और उसके पड़ोस में बोली जाती है, वही समस्त साहित्यिक रचना के लिए टकसाली भाषा है। तब से अब तक बहुत थोड़े से हेरफेर के बाद यहाँ बोली अंग्रेजी भाषा का सर्वाधिक प्रांजल रूप मानी जाती है। किंतु 14वीं शताब्दी को चॉसर की अंग्रेज़ी नवीं शताब्दी के राजा अल्फ्रडे की अंग्रेजी से बहुत भिन्न थी। आधुनिक अंग्रेजी से यह जितनी भिन्न है, उससे कहीं अधिक वह प्राचीन अंग्रेजी से भिन्न थी। निस्संदेह उसका गठन शेक्सपियर अथवा शा की भाषा की तुलना में अधिक संयोगात्मक था।किन्तु अलफ्ऱेड एल्फ़िक अथवा प्राचीन अंग्रेजी के अन्य लेखकों की तुलना में कम संयोगात्मक था। उसका शब्द समूह नार्मन विजय से पूर्व की अंग्रेजी के प्राय: विशुद्ध शब्दभांडार की अपेक्षा आज के ही बहुमिश्रित शब्दकोश की ओर झुकता हुआ था।

अंग्रेजी भाषा के शब्दकोश और गठन के इन परिवर्तनों पर नार्मन विजय का प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव विस्तृत रूप से पड़ा। संयोगात्मक गठन के ह्रास में यह परोक्ष रूप से सहायक हुई और आगे चलकर अधिकांश संयोगात्मक रूपों का लोप हो गया। संयोगात्मक गठन का अंतत: विग्रह अवश्यंभावी था, और वास्तव में वह प्राचीन अंग्रेजी के उत्तरार्धकाल में ही प्रारंभ हो चुका था। परंतु यदि नार्मन विजयी न होते तो यह विग्रह न इतना अधिक होता और न इतना शीघ्र। पश्चिमी सैक्सन की सुप्रतिष्ठित साहित्यिक परंपरा का नाश और अंग्रेजी को अपदस्थ कर इस विजय ने उन सभी रुढ़ियों का उन्मूलन कर दिया जो भाषा को उसके प्राचीन रूप के निकट रखती है। भाषा में सरलता तथा एकरूपता लाने वाली प्रवृत्तियों को पूर्ण रूप में विकसित होने का अवसर मिल गया। विजय के फलस्वरूप जो अंतर्जातीय मिश्रण हुआ, उसने भी संयोगात्मक रूपों के उच्छेदन में योग दिया क्योंकि एक ओर तो विजयी विदेशियों द्वारा नई भाषा के प्रयोग में उसके रूप और व्यवहार की पकड़ और समझ में कमी हुई और दूसरी ओर देशवासियों की ओर से प्रयत्न हुआ कि उन्हें अपनी बात समझाने के लिए अपनी भाषा को सरल करें, किंतु केवल इतनी सरल कि उसका अर्थ लुप्त न हो जाए। फलस्वरूप संयोगात्मक रूपों की जटिलता का अधिक से अधिक परित्याग किया गया। उपर्युक्त दोनों कारणों से संयोगात्मक रूप घटते गए, और व्याकरण भी सरल होता गया।

नार्मन विजय ने शीघ्रतापूर्वक अंग्रेजी भाषा के संयोगात्मक रूपों को कम करके उसके गठन को सरल बनाया। साथ ही, इस विजय के बिना भाषा के शब्दकोश में भी क्रांतिकारी परिवर्तन न होता। लगभग दो शताब्दियों तक निरंतर फ्रेंच प्रभुत्व के कारण ही मूल अंग्रेजी के सैकड़ों प्रचलित शब्द निकाल फेंके गए, साथ ही हजारों फ्रेंच शब्द नवीन विचारों को अभिव्यक्त करने और नई-नई वस्तुओं तथा वस्तुस्थितियों का नामकरण करने के निमित्त प्रचलित कर दिए गए। आज अंग्रेजी के भाषाभांडार में न्याय, शासन तथा सेना, अभिजात उच्च वर्ग तथा फैशन, कला एवं साहित्य संबंधी जो अनेक प्रचलित शब्द हैं, उनमें से अधिकतर फ्रेंच भाषा के ही हैं। प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली संबंधबोधक तथा अन्य शब्द, जैसे मैडम, मास्टर, सर्वेंट, अंकिल, एयर, सेकंड आदि भी फ्रेंच हैं। गणना के अनुसार ऐसे फ्रांसीसी शब्दों की संख्या लगभग दस हजार है जिनमें साढ़े सात हजार शब्द आज इस प्रकार प्रचलित हो गए हैं कि उनका विदेशी बाना बिलकुल नहीं पहचाना जाता, क्योंकि अंग्रेजी ने उन्हें अपनी बोली और उच्चारण के अनुसार आत्मसात्‌ कर लिया है।

विदेशी शब्दों का यह प्रवेश इतना गहरा और विस्तृत है कि फ्रेंच उद्गम के शब्दों का प्रयोग किए बिना अधिकतर विषयों पर अभिव्यक्ति प्राय: संभव हो गई है। यही नहीं, अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करना अंग्रेजी का विशेष गुण हो गया। क्योंकि फ्रांसीसी प्रभत्व काल में गृहीत अधिकांश फ्रेंच शब्दों का लातीनी था, इसलिए सीधे लातीनी से शब्द लेने का द्वार प्रशस्त हो गया। ¢ ज्ञान के पुनर्जागरण काल¢ (रिवाइवल ऑव लर्निंग) में अनेक लातीनी तथा यूनानी शब्द अंग्रेजी भाषा में प्रविष्ट हुए। सन्‌ 1660 ई. में इंग्लैंड में राजतंत्र के पुन:स्थापन (दि रेस्टोरेशन) के पश्चात्‌ फ्रेंच शब्दों की दूसरी बार चार्ल्स द्वितीय के फ्रेंच प्रवास से स्वदेश पुनरागमन के साथ आई, क्योंकि उसने अपने राजदरबार को फ्रांसीसी रंग में रंग दिया। 19वीं शताब्दी में फिर फ्रांसीसी, लातीनी और यूनानी शब्दों के बड़े-बड़े समूह अंग्रेजी में आकर मिले। किंतु आधुनिक अंग्रेजी के शब्दभांडार में वृद्धि करने वाली केवल ये ही भाषाएँ नहीं हैं। यूरोपीय भाषाओं में से शब्द देने वाली अन्य उल्लेखनीय भाषाएँ डच, जर्मन, इतालोय, स्पेनी और पुर्तगाली हैं। एशिया की भाषाओं में चीनी, जापानी, फारसी, अरबी, मलयालम, संस्कृत तथा उसकी वंशज आधुनिक भारतीय भाषाओं, द्रविड़ तथा पोलोनेशियाई भाषाओं को भी यह गौरव प्राप्त है।

इस वृहत्‌ शब्दकोश से भाषा के मुहावरे को शुद्धता दूषित होने लगी जिसके कारण कितने ही वर्गों की ओर से स्वाभाविक विरोध उठ खड़ा हुआ। पुनर्जागरण काल में (15वीं शताब्दी के यूरोप में वह युग जिसमें कला तथा साहित्य का पुनर्जन्म हुआ और जिससे मध्ययुगीन यूरोपीय सभ्यता का अंत तथा आधुनिक सभ्यता का आरंभ हुआ) ऐसे विशुद्धतावादी थे जो लातीनी शब्दों को भारी संख्या में ग्रहण करने के विरोधी थे। 17वीं सदी के उत्तरार्ध तथा 18वीं शताब्दी में निरंतर अनेक आलोचकों तथा साहित्यकारों को शिकायत थी कि शब्दों और भाषा के मुहावरों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। वास्तव में 18वीं शताब्दी में ही भाषा को प्रांजल तथा परिमार्जित करके उसे अपरिवर्तनशील और टकसाली बनाने के सतत प्रयत्न किए गए। कतिपय सम्मानित लेखकों ने तो भाषा के विकास पर नज़र रखने और उसको नियंत्रित करने के लिए फ्रेंच अकादमी की ही भाँति एक अकादमी स्थापित करने के पक्ष में आवाज उठाई। इस काल में प्रथम बार यथेष्ट संख्या में जो शब्दकोश और व्याकरण प्रकाशित हुए, वे भाषा को नियंत्रित करने में बहुत कुछ सहायक हुए, किंतु उसे अपरिवर्तनशील बनाने के सभी प्रयत्न विफल हुए।

विशेष रूप से 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शक्ति तथा प्रभाव के फलस्वरूप सभी भागों से न केवल अनेक शब्द ही अंग्रेजी में प्रविष्ट हुए, वरन्‌ संसार के विभिन्न भागों में अंग्रेजी के नवीन रूपों का प्रार्दुभाव भी होने लगा। फलस्वरूप आज अंग्रेजी भाषा के इंग्लिश रूप के अतिरिक्त अमरीकी, आस्ट्रेलियाई तथा भारतीय आदि रूप भी हैं।

समस्त संसार की भाषाओं से शब्द लेकर बनी अंग्रेजी की मिश्रित शब्दराशि ने सम्यक्‌ रूप से इस भाषा को अत्यंत संपन्न बना दिया है और इसे वह लोच और शक्ति प्रदान की है जो अन्यथा उपलब्ध न होती। उदाहरणार्थ अंग्रेजी में आज अनेक पर्यायवाची शब्द मिलते हैं जिनके परस्पर अर्थों में बारीक भेद है, यथा ब्रदरली और फैटरनल, हार्टी और कॉर्डियल, लोनली और सॉलिटरी। अनेक उदाहरण वर्णसंकर शब्दों के भी हैं जिनका एक अंग अंग्रेजी है तो दूसरा लातीनी या फ्रांसीसी, जैसे ईटेबिल या श्रिंकेज, (shrinkage) जिनमें मूल शब्द देशी हैं, और प्रत्यय विदेशी। इसके विपरीत ब्यूटीफूल या कोटली जैसे शब्दों में मूल शब्द विदेशी हैं और प्रत्यय देशी। विशुद्धतावादियों ने समय-समय पर इस प्रकार के शब्द निर्माण का और देशी शब्दों के स्थान पर विदेशी शब्दों को ग्रहण करने की प्रवृत्ति का भी विरोध किया, जैसे हैंडबुक के स्थान पर मैनुअल अथवा लीचक्राफ्ट (leachcraft) के स्थान पर मेडिसिन का प्रयोग करना। यद्यपि यह अवश्य सच है कि अंग्रेजी भाषा ने समस्त पद बनाने एवं धातु से शब्द निर्माण करने की अपनी उस सहजता को बहुत कुछ खो दिया जो जर्मन वंशज होने के नाते इसका एक विशेष गुण रहा, तथापि विविध स्रोतों से अपना शब्दकोश संपन्न करने के फलस्वरूप इसे अत्यधिक लाभ भी हुआ है।

चीनी भाषा के बाद आज अंग्रेजी ही दूसरी ऐसी भाषा है जो सर्वाधिक व्यक्तियों द्वारा बोली जाती है। विगत डेढ़ सौ वर्षों में ही इसका प्रयोग दस गुना बढ़ गया है, और विस्तार की दृष्टि से यह संसार में चीनी से भी अधिक भूभागों में बोली जाती है। इस प्रकार अंग्रेजी किसी भी अन्य भाषा की अपेक्षा अंतरराष्ट्रीय भाषा होने के निकट है। उसका साहित्य संसार में सर्वाधिक संपन्न है, और यह निश्चय ही प्रथम श्रेणी का है। इसका व्याकरण अत्यंत सरल है। इसकी विपुल शब्द राशि विश्वव्यापी है।

साथ ही इसमें भी कोई संदेह नहीं कि यदि कोई विदेशी इस भाषा में पारंगत होना चाहता है तो इसके शब्दों का अराजक वर्णविन्यास, जिसके संबंध में उच्चारण पर कम-से-कम भरोसा किया जा सकता है, और इसके मुहावरों कीे बारीकी उसके मार्ग में रोड़े बनकर सामने आती है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संपर्क के निर्मित सार्वभौमिक माध्यम के रूप में अधिक-से-अधिक लोग अंग्रेजी भाषा सीखने के लिए आकर्षित हो रहे हैं और भविष्य में भी होति रहेंगे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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