अंग्रेज़ी साहित्य

अद्‌भुत भारत की खोज
यहां जाएं: भ्रमण, खोज
गणराज्य इतिहास पर्यटन भूगोल विज्ञान कला साहित्य धर्म संस्कृति शब्दावली विश्वकोश भारतकोश

साँचा:भारत कोश पर बने लेख

लेख सूचना
अंग्रेज़ी साहित्य
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1
पृष्ठ संख्या 20-33
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पाण्डेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1973 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक चंद्रवती सिंह, प्रकाश चंद्र गुप्ता, विक्रमादित्य राय

अंग्रेजी साहित्य के प्राचीन एवं अर्वाचीन काल कई आयामों में विभक्त किए जा सकते हैं। यह विभाजन केवल अध्ययन की सुविधा के लिए किया जाता है; इससे अंग्रेजी साहित्य प्रवाह को अक्षुण्णता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। प्राचीन युग के अंग्रेजी साहित्य के तीन स्पष्ट आयाम है: ऐंग्लो-सैक्सन; नार्मन विजय से चॉसर तक; चॉसर से पुनर्जागरण काल तक।

ऐंग्लो-सैक्सन

इंग्लैंड में बसने के समय ऐंग्लो-सैक्सन कबीले बर्बरता और सभ्यता के बीच की स्थिति में थे। आखेट, समुद्र और युद्ध के अतिरिक्त उन्हे कृषि जीवन का भी अनुभव था। अपने साथ वे अपने वीरों की कथाएँ भी लेते आए। ट्यूटन जाति के सारे कबीलों में ये कथाएँ सामान्य रूप से प्रचलित थीं। वे देशों की सीमाओं में नहीं बँधी थीं। इन्हीं भाषाओं से सातवीं शताब्दी में कविता के रूप में अंग्रेजी साहित्य का प्रारंभ हुआ। इसलिए डब्ल्यू.पी. कर के शब्दों में ऐंग्लो-सैक्सन साहित्य पुरानी दुनिया का साहित्य है। लेकिन इस समय तक ऐंग्लो-सैक्सन लोग ईसाई बन चुके थे। इन भाषाओं के रचयिता भी आम तौर से पुरोहित हुआ करते थे। इसलिए इन भाषाओं में वर्णित शौर्य और पराक्रम पर धार्मिक रहस्य, विनय, करुणा, सेवा इत्यादि के भाव भी आरोपित हुए। ऐंग्लो-सैक्सन कविता का शुद्ध धर्मविषयक अंश भी इन गाथाओं के रूप से प्रभावित है

इन गाथाओं में शौर्य के साथ शैली का भी अतिरंजन है। ऐंग्लो-सैक्सन भाषा काफी अनगढ़ थी। गाथाओं में कवि उसे अत्यंत कृत्रिम बना देते थे। छंद के आनुप्रासिक आधार के कारण भरती के शब्दों का आ जाना अनिवार्य था। मुखर व्यंजनों की प्रचुरता से संगीत या लय में कठोरता है। विषयों और शैली को संकीर्णंता के बीच अंग्रेजी कविता का विकास असंभव था। नार्मन विजय के बाद इसका ऐसा कायाकल्प हुआ कि अनेक विद्वानों ने इसमें और बाद की कविता में वंशगत संबंध जोड़ना अनुचित कहा है।

दूसरी ओर अंग्रेजी गद्य में, जिसका उदय कविता के बाद हुआ, विकास की क्रमिक और अटूट परंपरा है। ईसाई संसार की भाषा लातीनी थी और इस काल का प्रसिद्ध गद्य लेखक बीड इसी भाषा में लिखता था। ऐंग्लो-सैक्सन में गद्य का प्रारंभ अलफ्रेड के जमाने में लातीनी के अनुवादों तथा उपदेशों और वार्ताओं की रचना से हुआ। गद्य की रचना शिक्षा और ज्ञान के लिए हुई थी। इसलिए इसमें ऐंग्लो-सैक्सन कविता की कृत्रिमता और अन्य शैलीगत दोष नहीं हैं। उनकी भाषा लोकभाषा के अधिक समीप थी। ऐंग्लो-सैक्सन कविता की तरह बाद वाले युगों में उसका संबंध विच्छेद करना असंभव है। लेकिन इस युग के पूरे साहित्य में लालित्य का अभाव है

नार्मन विजय से चॉसर तक

चॉसर पूर्व मध्यदेशीय अंग्रेजी काल न केवल इंग्लैंड में ही बल्कि यूरोप के अन्य देशों में भी फ्रांस के साहित्यिक नेतृत्व का काल है। १२वीं से लेकर 14वीं शताब्दी तक फ्रांस ने इन देशों को विचार, संस्कृति, कल्पना, कथाएँ और कविता के रूप दिए। धर्मयुद्धों के इस युग में सारे ईसाई देशों को बौद्धिक एकता स्थापित हुई। यह सामंती व्यवस्था तता शौर्य और औदार्य की केंद्रीय मान्यताओं के विकास का युग है। नारी के प्रति प्रेम और पूजाभाव, साहस और पराक्रम, धर्म के लिए प्राणोत्सर्ग, असहायों के प्रति करुणा, विनय आदि ईसाई नाइटों (सूरमाओं) के जीवन के अभिन्न अंग माने गए। इसी समय फ्रांस के चारणों ने प्राचीनकालीन पराक्रम गाथाओं (chanson dageste) और प्रेम गीतों की रचना की, तथा लातीनी, ट्यूटनों, केल्टी, आयरी, कार्नी और फ्रेंच गाथाओं का व्यापक उपयोग हुआ। फ्रांस की गाथाओं में कर्म की, ब्रिटेन की गाथाओं में भावुकता और श्रृंगार की ओर लातीनी गाथाओं में इन सभी तत्वों की प्रधानता थी। साहित्य में कोमलता, माधुर्य और गीतों पर जोर दिया जाने लगा।

इस युग में अंग्रेजी भाषा ने अपना रूप संवारा। उसमें रोमांस भाषाओं, विशेषत; फ्रेंच के शब्द आए, उसने कविता में कर्णकटु आनुप्रासिक छंद रचना की जगह तुर्कों को अपनाया, उसके विषय व्यापक हुए-संक्षेप में, उसने चॉसर युग की पूर्वपीठिका तैयार की।

गद्य के लिए भाषा के मँजे-मँजाए और स्थिर रूप की आवश्यकता होती है। पुरानी अंग्रेजी के रूप में विघटन के कारण इस युग का गद्य पुराने गद्य जैसा संतुलित और स्वस्थ नहीं है। लेकिन रूपगत अस्थिरता के बावजूद इस युग के धार्मिक और रोमानी गद्य में विचारों की दृष्टि से ऐंग्लो-सैक्सन गद्य की परंपरा को विकसित किया।

चॉसर से पुनर्जागरण तक

चॉसर ने इस युग की काव्य परंपरा को आधुनिक युग से समन्वित किया। उसने फ्रेंच कविता से लालित्य और इटली की समकालीन कविता से आधुनिक बोध’ लिया। कविता में यथार्थवाद को जन्म देकर उसने अंग्रेजी कविता को यूरोप की कविता से भी आगे कर दिया। इसलिए उसे समझने के लिए पुरानी ऐंग्लो-सैक्सन दुनिया और उसकी कविता की जगह मध्ययुगीन फ्रांस और आधुनिक इटली की साहित्यिक हलचल को जान लेना जरूरी है। उसके बाद और एलिजाबेथ युग से पहले कोई बड़ा कवि नहीं हुआ।

इस युग में लातीनी और फ्रेंच साहित्य के अनुवादों और मौलिक रचनाओं के माध्यम से गद्य का रूप निखर चला। लेखकों ने लातीनी और फ्रेंच गद्य की वाक्य रचना और लय को अंग्रेजी रूप में उतारा। 1350 में अंग्रेजी को राजभाषा का सम्मान मिला और धर्म के घेरे को तोड़कर गद्य का रूप आम लोगों की ओर हुआ। गद्य ने विज्ञान, दर्शन, धर्म, इतिहास, राजनीति, कथा और यात्रा वर्णन के द्वारा विविधता प्राप्त की। 15वीं शताब्दी के अंत तक आते-आते मैंडेविल, चॉसर, विकलिफ, फार्टेस्क्यू, कैक्स्टन और मैलोरी जैसे प्रसिद्ध गद्य निर्माताओं ने अंग्रेजी गद्य की नींव मजबूत बना दी।

15वीं शताब्दी

अंग्रेजी नाटक का शैशव काल है। धर्मोपदेश और सदाचार शिक्षा की आवश्यकता, नगरों के विकास और शक्तिशाली श्रेणियों (शिल्ड) के उदय के साथ नाटक गिरजाघर के प्राचीरों से निकलकर जनपथ पर आ खड़ा हुआ। इन नाटकों का संबंध बाइबिल की कथाओं (मिस्ट्रीज़), कुमारी मेरी और संतों की जीवनियों (मिरैकिल्स), सदाचार (मोरैलिटीज़) और मनोरंजक प्रहसनों (इंटरल्यूड्स) से है। धर्म के संकुचित क्षेत्र में रहने वाले और रूप में अनगढ़ इन नाटकों को एलिज़ाबेथ युग के महान नाटकों का पूर्वज कहा जा सकता है।

पुनर्जागरण

विचारों और कल्पना के अविराम मंथन, विधाओं में प्रयोगों की विविधता और कृतित्व की प्रौढ़ता की दृष्टि से पुनर्जागरण काल अंग्रेजी साहित्य का स्वर्ण युग है। सांस्कृतिक दृष्टि से यह युग आधि भौतिकता के विरुद्ध भौतिकता, मध्ययुगीन सामंती अंकुशों के विरुद्ध मननशील व्यक्तिवाद, अंधविश्वास के विरुद्ध विज्ञान के संघर्ष का युग है। पुनर्जागरण ने इंग्लैंड को इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी के काफी बाद आंदोलित किया। 1500 से 1580 तक का समय मानवतावाद के विकास और प्राचीन यूनान तथा इटली के साहित्यिक आदर्शों को आत्मसात करने का है। लेकिन 1580 और 1660 के बीच कविता, नाटक और गद्य में अद्भुत उत्कर्ष हुआ। 1580 के पूर्व महान व्यक्तित्व केवल चॉसर का है। 1580 के बाद स्पेंसर, शेक्सपियर, बेकन और मिल्टन की महान प्रतिभाओं से कुछ ही नीचे स्तर पर नाटक में मार्लो, बेन जॉन्सन और बेब्स्टर, गद्य में हूकर, बर्टेन और टॉमस ब्राउन, कविता में बेन जॉन्सन और डन हैं। शैली और वस्तु में चित्र-विचित्रता की दृष्टि से नाटकों में लिली, पील और ग्रीन की ‘दरबारी कामेडी’, शेक्सपियर की ‘रोमानी कामेडी’, बोमांट और फ्लेचर की ‘ट्रैजी कामेडी’ और बेन जॉन्सन की ‘यथार्थवादी कामेडी’, कविता में अनेक कवियों के प्रेम संबंधों कथाबद्ध सॉनेट, स्पेंसर की रोमानी कविता, डन और अन्य आध्यात्मिक (मेटाफिजिकल) कवियों की दुरूह कल्पनापूर्ण कविताएँ, बेन जॉन्सन और दरबारी कवियों के प्रांजल गीत तथा मिल्टन के भव्य और उदात्त महाकाव्य, गद्य में इटली और स्पेन से प्रभावित लिलो और सिडनी को अलंकृत शैली की रोमानी कथाएँ तथा नैश और डेलोनी के साहसिकतापूर्ण यथार्थवादी उपन्यास, बेकन के निबंध (एसे), बाइबिल का महान अनुवाद, बर्टन का मनोवैज्ञानिक, सूक्ष्म किंतु सुहृद सा अंतरंग गद्य, सिडनी और बेन जॉन्सन की गद्य आलोचनाएँ, मिल्टन का ओजपूर्ण और आक्रोशपूर्ण प्रलंबित वाक्यों का भव्य गद्य, टॉमस ब्राउन का चिंतनपूर्ण किंतु संगीत तरल गद्य इस युग की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हैं। मानव बुद्धि और कल्पना की तरह ही यह युग अभिव्यक्ति के महत्वाकांक्षी प्रसार का युग है।

1660 और 1700 ई. के अंत के बीच वाले वर्ष बुद्धिवाद के अंकुरण के हैं। परंतु पुनर्जागरण का प्रभाव शेष रहता है; उसके अंतिम और महान कवि मिल्टन के महाकाव्य 1660 के बाद ही लिखे गए; स्वयं ड्राइडन में मानवतावादी प्रवृत्तियाँ हैं। लेकिन एक नया मोड़ सामने है। बुद्धिवाद के अतिरिक्त यह चार्ल्स द्वितीय के पुनर्राज्यारोहण के बाद फ्रेंच रीतिवाद के उदय का युग है। फ्रेंच रीतिवाद तथा ‘प्रेम और सम्मान’ (लव ऐंड ऑनर) के दरबारी मूल्यों से प्रभावित इस युग का नाटक अनुभूति और अभिव्यक्ति में निर्जीव है। दूसरी ओर मध्यवर्गीय यथार्थवाद से प्रभावित विकर्ली और कांग्रोव के सामाजिक प्रहसन अपनी सजीवता, परिष्कृत किंतु पैनी भाषा और तीखे व्यंग्य में अद्वितीय है। ऊँचे मध्यवर्ग के यांत्रिक बुद्धिवाद और अनैतिकता के विरूद्ध निम्न मध्यवर्गीय नैतिकता और आदर्श का प्रतीक जॉन वन्यन का रूपक उपन्यास ‘दि पिल्ग्रिम्स प्रोसेस’ है। आलोचना में रीतिवाद का प्रभाव शेक्सपियर के रोमानी नाटकों के विरूद्ध राइमर की आलोचना से स्पष्ट है। उस युग की सबसे महत्वपूर्ण आलोचनाकृति मानवतावादी स्वतंत्रता और रीतिवाद के समन्वय पर आधारित ड्राइडन का नाटक-काव्य-संबंधी निबंध है। वर्णन में यथार्थवादी गद्य के विकास में सैमुएल पेपीज़ की डायरी की भूमिका भी स्मरणीय है। संक्षेप में, १७वीं शताब्दी के इन अंतिम वर्षों के गद्य और पद्य में स्वच्छता और संतुलन है, लेकिन कुल मिलाकर यह महत्ता-विरल-युग है।

18वीं शताब्दी

रीतिवादी युग यह शताब्दी तर्क और रीति का उत्कर्षकाल है। लायबनीज़, दकार्त और न्यूटन ने कार्य कारण की पद्धति द्वारा तर्कवाद और यांत्रिक भौतिकवाद का विकास किया था। उनके अनुसार सृष्टि और मनुष्य नियमानुशासित थे। इस दृष्टिकोण में व्यक्तिगत रुचि के प्रदर्शन के लिए कम जगह थी। इस युग पर हावी फ्रैंच रीतिकारों ने भी साहित्यिक प्रक्रिया को रीतिबद्ध कर दिया था।

इस युग ने धर्म की जगह रखा और मनुष्य के साधारण सामाजिक जीवन, राजनीति, व्यावहारिक नैतिकता इत्यादि पर जोर दिया। इसलिए इसका साहित्य काम की बात का साहित्य है। इस युग ने बात को साफ-सुथरे, सीधे, नपे-तुले, पैने शब्दों में कहना अधिक पसंद किया। कविता में यह पोप और प्रायर के व्यंग्य का युग है।

तर्क की प्रधानता के कारण 18वीं शताब्दी को गद्ययुग कहा जाता है। सचमुच यह आधुनिक गद्य के विकास का युग है। दलगत संघर्षों, कॉफीहाउसों और क्लबों में अपनी शक्ति के प्रति जागरूक मध्यवर्ग की नैतिकता ने इस युग में पत्रकारिता को जन्म दिया। साहित्य और पत्रकारिता के समन्वय में एडिसन, स्टील, डिफो, स्विफ्ट, फील्डिंग, स्मालेट, जॉनसन और गोल्डस्मिथ की शैली का निर्माण किया। इससे कविता के व्यामोह से मुक्त, रचना के नियमों में दृढ़, बातचीत की आत्मीयता लिए हुए छोटे-छोटे वाक्यों के प्रवाहमय गद्य का जन्म हुआ। जहर में बुझे तीर की तरह स्विफ्ट के गद्य को छोड़कर अधिकांश लेखकों में व्यंग्य की उदार शैली है।

आलोचना में पहली बार चॉसर, स्पेंसर, शेक्सपियर, मिल्टन इत्यादि को विवेक की कसौटी पर कसा गया। रीति और तर्क की पद्धति रोमैंटिक साहित्यकारों के प्रति अनुदार हो जाया करती थी, लेकिन आज भी एडिसन, पोप और जॉन्सन की आलोचनाओं का महत्व है। गद्य में शैली की अनेकरूपता की दृष्टि से इस युग ने ललित पत्रलेखन में चेस्टरफील्ड और वालपोल, संस्मरणों में गिबन, फैनी बर्नी और बॉज़वेल, इतिहास में गिबन, दर्शन में बर्कले और ह्यूम, राजनीति में बर्क और धर्म में बटलर जैसे शैलीकार पैदा हुए

यथार्थवादी दृष्टिकोण के विकास ने आधुनिक अंग्रेजी उपन्यासों की चार प्रसिद्ध धुरियाँ दीं डिफो, रिचर्ड्‌सन, फोल्डिंग और स्मॉलेट। उपन्यास में यही युग स्विफ्ट, स्टर्न और गोल्डस्मिथ का भी है। अंग्रेजी कथा साहित्य को यथार्थवाद ने ही, गोल्डस्मिथ और शेरिडन के माध्यम से, कृत्रिम भावुकता के दलदल से उबारा। किंतु यह युग मध्यवर्गीय भावुक नैतिकता से भी अछूता न था। इसके स्पष्ट लक्षण भावुक कामेडी और स्टर्न, रिचर्ड्‌सन इत्यादि के उपन्यासों में मौजूद है। शताब्दी के अंतिम वर्षों में रोमैंटिक कविता की जमीन तैयार थी। ब्लेक और बर्न्स इस युग की स्थिरता में आँधी की तरह आए।

19वीं शताब्दी

रोमैंटिक युग पुनर्जागरण के बाद रोमैंटिक युग में फिर व्यक्ति की आत्मा का उन्मेषपूर्ण और उल्लसित स्वर सुन पड़ता है। प्राय: रोमैंटिक साहित्य को रीतियुग (क्लासिसिज़्म) की प्रतिक्रिया कहा जाता है और उसकी विशेषताओं का इस प्रकार उल्लेख किया जाता है- तर्क की जगह सहज गीतिमय अनुभूति और कल्पना; अभिव्यक्ति में साधारणीकरण की जगह व्यक्ति निष्ठता; नगरों के कृत्रिम जीवन से प्रकृति और एकांत की ओर मुड़ना; स्थूलता की जगह सूक्ष्म आदर्श और स्वप्न; मध्ययुग और प्राचीन इतिहास का आकर्षण; मनुष्य में आस्था; ललित भाषा की जगह साधारण भाषा का प्रयोग; इत्यादि। निश्चय ही इनमें से अनेक तत्व रोमानी कवियों में मिलते हैं, लेकिन उनकी महान्‌ सांस्कृतिक भूमिका को समझने के लिए आवश्यक है कि 19वीं शताब्दी में जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, इटली, इंग्लैंड, रूस और पोलैंड में जनवादी विचारों के उभार को ध्यान में रखा जाए। इस उभार ने सामाजिक और साहित्यिक रूढ़ियों के विरुद्ध व्यक्ति स्वातंत््रय का नारा लगाया। रूसी और फ्रांसीसी क्रांति उसकी केंद्रीय प्रेरणा थे। इंग्लैंड में १९वीं शताब्दी के पूर्वार्ध के कवि-- वर्ड्‌स्वर्थ, कोलरिज, शेली, कीट्स, और बायरन-- इसी नए उन्मेष के कवि हैं। लैंब, हंट और हैज़लिट के निबंधों, कीट्स के प्रेमपत्रों, स्कॉट के उपन्यासों, डी क्विंसी के ‘कन्फेशंस ऑव ऐन ओपियम’ ईटर में गद्य की भी अनुभूति, कल्पना और अभिव्यक्ति का वही उल्लास प्राप्त हुआ। आलोचना में कोलरिज, लैंब, हैज़लिट और डी क्विंसी ने रीति से मुक्त होकर शेक्सपियर और उसके चरित्रों की आत्मा का उद्घाटन किया। लेकिन व्यक्तित्व आरोपित करने के स्वभाव ने नाटक के विकास में बाधा पहुँचाई।

विक्टोरिया के युग में जहाँ एक ओर जनवादी विचारों और विज्ञान का अटूट विकास हो रहा था, वहाँ अभिजात वर्ग क्रांतिभीरु भी हो उठा। इसलिए इस युग में कुछ साहित्यकारों में यदि स्वस्थ सामाजिक चेतना है तो कुछ में निराशा, संशय, अनास्था, समन्वय, कलावाद, वायवी आशावाद की प्रवृत्तियाँ भी हैं। व्यक्तिवाद शताब्दी के अंतिम दशक तक पहुँचते-पहुँचते कैथालिक धर्म, रहस्यवाद, आत्मरति या आत्मपीड़न में इस तरह लिप्त हो गया कि इस दशक को खल दशक भी कहते हैं। जनवादी, यथार्थवादी और वैज्ञानिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व मॉरिस ने कविता में, रस्किन ने गद्य में और ब्रांटे बहनों, थैकरे, डिकेन्स, किंग्सली, रीड, जॉर्ज इलियट, टॉमस हार्डी, बटलर आदि ने उपन्यास में किया। निराशा और पीड़ा के बीच में इनमें मानव के प्रति गहरी सहानुभूति और विश्वास है। शताब्दी के अंतिम वर्षों में विक्टोरिया युग के रिक्त आदर्शों के विरुद्ध अनेक स्वर उठने लगे थे।

20वीं शताब्दी

19वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में मध्यवर्गीय व्यक्तिवाद के उभरते हुए अंतर्विरोध 20वीं शताब्दी में संकट की स्थिति में पहुँच गए। यह इस शताब्दी के साहित्य का केंद्रीय तथ्य है। इस शताब्दी के साहित्य को समझने के लिए उसके विचारों, भावों और रूपों को प्रभावित करने वाली शक्तियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। वे शक्तियाँ हैं नीत्शे, शॉपेनआवर, स्पिनोज़ा, कर्कगार्ड, फ्रायड और मार्क्स; इब्सन, चेखव, फ्रेंच अभिव्यंजनावादी और प्रतीकवादी, गोर्की, सार्त्र और इलियट; दो हो चुके युद्ध और तीसरे की आशंका, फासिज्म, रूस की समाजवादी क्रांति, गए देशों में समाजवाद की स्थापना और पराधीन देशों के स्वातंत््रय संग्राम; प्रकृति पर विज्ञान की विजय से सामाजिक विकास की अमित संभावनाएँ और उनके साथ व्यक्ति की संगति की समस्या।

20वीं शताब्दी में व्यक्तिवादी आदर्श का विघटन तेजी से हुआ है। शा, वेल्स और गार्ल्सवर्दी ने शताब्दी के प्रारंभ में विक्टोरिया युग के व्यक्तिवादी आदर्शों के प्रति संदेह प्रकट किया और सामाजिक समाधानों पर जोर दिया। हार्डी की कविता में भी उसके विघटन का चित्र है। लेकिन किसी तरह पहले युद्ध के पहले कविता ने विक्टोरिया युग के पैस्टरल आदर्शों को जीवित रखा। जो युद्धों में व्यक्तिवाद समाज से बिल्कुल टूटकर अ्‌लग हो गया। अपनी ही सीमाओं में संकुचित साहित्यिक ने प्रयोगों का सहारा लिया। टी.एस. इलियट के ‘वेस्टलैंड’में व्यक्ति की कुंठा और दीक्षागम्य कविता का जन्म हुआ और आज भी व्यक्तिवाद से प्रभावित अंग्रेजी कवि उसका नेतृत्व स्वीकार करते हैं। 1930 के बाद मार्क्सवादी विचारधारा और स्पेन के गृहयुद्ध ने अंग्रेजी कविता की नई स्फूर्ति दी। लेकिन दूसरे युद्ध के बाद तीव्र सामाजिक संघर्षों के बीच इस काल के अनेक कवि फिर व्यक्तिवादी प्रवृत्ति के उपासक हो गए। साथ ही, ऐसे कवियों का भी उदय हुआ जो अपनी व्यक्तिगत मानसिक उलझनों के बावजूद युग की मानव आस्था को व्यक्त करते रहे।

आदर्शवाद के टूटने के साथ ही उपन्यासों में व्यक्ति की मानसिक गुत्थियों, विशेषत: यौन कुंठाओं के विरुद्ध भी आवाज उठी। लॉरेंस, जेम्स, ज्वॉयस और वर्जीनिया वुल्फ इसी धारा की प्रतिनिधि हैं। नाटकों के क्षेत्र में भी यथार्थवादी प्रवृत्तियों का विकास हुआ है। नाटकों में काव्य और रोमानी क्रांतिकारी विचारों को व्यक्त करने में सबसे अधिक सफलता अंग्रेजी में लिखने वाले आयरलैंड के नाटककारों को मिली है। आलोचना में शोध से लेकर व्याख्या तक का बहुत बड़ा कार्य हुआ। प्रयोगवादी साहित्यकारों के प्रधान शिक्षक टी.एस. इलियट, रिचर्र्ड्‌स, एम्पसन और लिविस है। इन्होंने जीवन के मूल्यों से अधिक महत्व कविता की रचना प्रक्रिया को दिया है। साधारणत: कहा जा सकता है कि 20वीं शताब्दी के साहित्य में विचारों की दृष्टि से चिंता, भय और दिशाहीनता की और रूप की दृष्टि से विघटन की प्रधानता है। उसमें स्वस्थ तत्व भी है और उन्हीं पर उसका आगे का विकास निर्भर है।

गद्य

अंग्रेजी गद्य ने अंग्रेजी कविता, नाटक और उपन्यास के समान ही अंग्रेजी साहित्य को समृद्ध किया है। बाइबिल के अनेक वाक्य अंग्रेजी राष्ट्र के मानस पर सदा के लिए गहरे अंकित हो गए हैं। इसी प्रकार शेक्सपियर, मिल्टन, गिबन, जॉन्सन, न्यूमैन, कार्लाइल और रस्किन के वाक्य अंग्रेज जाति को स्मृति में गूंजते हैं। अंग्रेजी गद्य अनेक साहित्यिक विधाओं द्वारा समृद्ध हुआ है। इनमें उपन्यास, कहानी और नाटक के अतिरिक्त निबंध, जीवनी, आत्मकथा, आलोचना, इतिहास, दर्शन और विज्ञान भी सम्मिलित हैं।

अंग्रेजी गद्य का संगीत अनेक शताब्दियों से पाठकों को मोहता रहा है। यह संगीत बहुधा रोमांसवादी और भावना प्रधान रहा है। इस गद्य में काव्य का गुण प्रचुर मात्रा में मिलता है। अंग्रेजी गद्य की तुलना में फ्रेंच गद्य की गति अधिक संतुलित और संयत रही है। एक आलोचक का कहना है कि कविता भावना को भाषा देती है, किंतु गद्य विवेक और बुद्धि की वाणी है।

अंग्रेजी गद्य ऐंग्लो-सैक्सन साहित्य की परंपरा का ही विकास है। मध्य युग के बीड (672-735) अंग्रेजी गद्य के पितामह कहे जा सकते हैं। बीड की ‘एक्सेज़िएस्टिकल हिस्ट्री’ जूलियस सीज़र के आक्रमण से लेकर 735 ई. तक के इंग्लैंड का प्राय: आठ सौ वर्षों का इतिहास प्रस्तुत करती है। अंग्रेजी गद्य का सर्वप्रथम महत्वपूर्ण ग्रंथ सर जॉन मेंडेविल की यात्राएँ हैं। यात्रा वर्णन के रूप में यह पुस्तक वास्तव में काल्पनिक गाथा है। सन्‌ 1377 में मूल फ्रांसीसी से अनूदित होकर यह अंग्रेजी में प्रकाशित हुई। अंग्रेजी कविता के जनक चॉसर (1340-1400) का गद्य साहित्य भी परिमाण में काफी है। उनकी कैटरबरी टेल्स में दो कहानियाँ गद्य में लिखी है।

अंग्रेजी गद्य को विक्लिफ (1324-1384) की रचनाओं से बहुत प्रेरणा मिली। विक्लिफ अंधविश्वासों पर कठोर आघात करता है। उसने सर्वप्रथम बाइबिल का सन्‌ 1611 का विख्यात संस्करण तैयार हुआ। विक्लिफ धर्म के क्षेत्र में स्वतंत्र विचारक था। उसके गद्य में बड़ी शक्ति है।

15वीं शताब्दी तक इंग्लैंड के लेखक लातीनी गद्य में ही लिखना पसंद करते थे और शक्ति तथा प्रतिभा से संपन्न कम गद्य अंग्रेजी में लिखा गया। ऐसे लेखकों में सर जॉन फॉर्टेस्क्यू (1394-1476) का नाम उल्लेखनीय है। इन्होंने अंग्रेजी विधान की प्रशंसा में एक पुस्तक ‘दि गवर्नेन्स ऑव इंग्लैंड’ लिखी। अंग्रेजी गद्य के इतिहास में कैक्स्टन (1421-91) का नाम विशेष महत्वपूर्ण है। उन्होंने 1476 में मुद्रण कार्य आरंभ किया और अंग्रेजी गद्य को स्थानीय बोलियों के प्रभाव से मुक्त करके एक निश्चित रूप देने में बड़ी मदद की। कैक्स्टन ने मध्य युग के अनेक रोमांस अंग्रेजी गद्य में अनुवाद करके प्रकाशित किए। उन्होंने फ्रेंच गद्य को अपना आदर्श बनाया और अंग्रेजी गद्य के विकास में बड़ा हिस्सा लिया। कैक्स्टन के महत्वपूर्ण प्रकाशनों में सर टॉमस मैलोरी का ‘मार्त द आर्थर’भी था। मैलोली की पुस्तक अंग्रेजी गद्य के इतिहास में एक स्मरणीय मील स्तंभ है।

अंग्रेजी पुनर्जागरण के पहले बड़े लेखक सर टॉमस मोर (1478-1535) है। उनकी पुस्तक युटोपिया विश्वविख्यात है, किंतु दुर्भाग्य से इस पुस्तक को उन्होंने लातीनी में लिखा। अंग्रेजी में उनकी केवल कुछ मामूली रचनाएँ हैं। उन्हीं के बाद इलियट, चीक, एस्कम और विल्सन ने अपनी शिक्षा संबंधी पुस्तकें लिखीं।

विलियम टिंडेल (1484-1536) ने सन्‌ 1522 से बाइबिल का अनुवाद अंग्रेजी में करना शुरू किया। इस प्रशंसनीय कार्य के बदले टिंडेल को निर्वासन और मत्युदंड मिला।

एलिज़ाबेथ के युग का गद्य कविता के स्वर का ही है। इसके उदाहरण लिलि (1574-1606) और सर फिलिप सिडनी (1554-86) की रचनाओं में हो पाते हैं। लिली की ‘यूफुइस’और सिडनी की ‘आर्केडिया’काव्य के गुणों से समन्वित रचनाएं हैं। सिडनी की ‘डिफेंस ऑव पोएजी’अंग्रेजी आलोचनाओं की पहली महत्वपूर्ण पुस्तक है।

अंग्रेजी गद्य के विकास में अगला कदम ग्रीन, लॉज, नैश, डैलूनी आदि के उपन्यासों का प्रकाशन है। इन लेखकों ने आत्मकथाएँ और अनेक विवादपूर्ण पुस्तकें भी लिखीं। उदाहरण के लिए ग्रीन के ‘कन्फेशंस’ का उल्लेख हो सकता है। ‘ओबरवरी’और अर्ल नाम के लेखकों ने चारित्रिक स्केच लिखे, जिसकी प्रेरणा उन्हें ग्रीक लेखक थियफ्रोॉस्तस से मिली।

अंग्रेजी गद्य साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंश हमें एलिज़ाबेथकालीन नाटकों में मिलता है। भावना के गहरे क्षणों में शेक्सपियर के पात्र गद्य में बोलने लगते हैं। ग्रीन, जॉन्सन, मालों आदि के नाम भी अंग्रेजी गद्य के इतिहास में महत्वपूर्ण है।

रिचर्ड हूकर

अंग्रेजी गद्य के महान्‌ लेखकों में पहला बड़ा नाम रिचर्ड हूकर (1554-1600) का है। उनकी पुस्तक ‘दि लॉज ऑव एक्लेजिएस्टिकल पॉलिटी’अंग्रेजी गद्य की उन्नायक हैं। इसी समय (1611) बाइबिल का सुप्रसिद्ध अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। बाइबिल की भाषा अंग्रेजी गद्य के अनुपम साँचों में ढालती है। वास्तव में यह गद्य काव्य के संगीत से अनुप्राणित है। प्रांसिस बेकन (1561-1626) अंग्रेजी निबंध के जनक तथा इतिहास के दर्शन के गंभीर लेखक थे। उनकी रचनाओं में ‘दि ऐडवांस्मेंट ऑव लर्निंग’, ‘दि न्यू ऐटलैंटिस’, ‘हेनरी सेवेंथ’, ‘दि एसेज़ नोवम्‌ ओगनिम’आदि सुप्रसिद्ध है। बेकन की भाषा ठोस, गंभीर और सूत्र शैली की है।

रिचर्ड बर्टन

रिचर्ड बर्टन (1576-1640) की पुस्तक ‘दि एनाटॉमी ऑव मेलैकली’अंग्रेजी गद्य के इतिहास में एक विख्यात रचना है। इसका पाडित्य अपूर्व है और एक गहरी उदासी पुस्तक भर में छाई रहती है। इस युग के एक महान्‌ गद्य लेखक ‘सर टॉमस ब्राउन’(1605-82) है। इनके गद्य का संगीत पाठकों को शताब्दियों से मुग्ध करता रहा है। इनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में ‘रिलीजिओ मेडिसी’और ‘हाइड्रोटैफिया’उल्लेखनीय है। जैरेमी टेलर (1613-77) प्रसिद्ध धर्म शिक्षक और वक्ता थे। उनकी उपमाएँ बहुत सुंदर होती थीं, उनका गद्य कल्पना और भावना से अनुरंजित है। उनकी पुस्तकों में ‘होली लिविंग’और ‘होली डाइंग’प्रसिद्ध है।

इस काल के लेखकों में मिल्टन का जन्म अग्रगण्य है। तीस से लेकर पचास वर्ष की आयु तक मिल्टन ने केवल गद्य लिखा और तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक विवादों में जमकर भाग लिया। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एरोपाजिटिका’में वे विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न को ऊँचे धरातल पर उठाते हैं और आज भी उनके विचारों में सत्य की गूँज है। मिल्टन के गद्य में शक्ति और ओज का अद्भुत संयोग है। १७वीं शताब्दी के गद्य लेखकों में अन्य उल्लेखनीय नाम फुलर (1608-61) और वाल्टन (1593-1683) के हैं। फुलर धार्मिक विषयों पर लिखते थे। उनकी पुस्तक, ‘दि बर्दीज ऑव इंग्लैंड’प्रसिद्ध है। वाल्टन की पुस्तक, ‘दि कंप्लीट ऐंग्लर’अंग्रेजी साहित्य की अमर रचनाओं में से है।

ड्राइडन

ड्राइडन (1631-1700) अंग्रेजी के प्रमुख गद्यकारों में थे। उनकी आलोचना शैली सुलझी हुई और सुव्यवस्थित थी। उनकी गद्य शैली भी फ्रेंच परंपरा के निकट है। वह चिंतन को सहज और तर्कसंगत अभिव्यक्ति देते हैं। ड्राइडन की भूमिकाओं के अतिरिक्त उनकी पुस्तक, ‘एसे ऑव ड्रैमेटिक पोएज़ी’सुप्रसिद्ध है। हॉब्स (1588-1679) के राजनीतिक विचारों का ऐतिहासिक महत्व है और उनकी पुस्तक ‘दि लेवायथान’अंग्रेजी भाषा की एक सुप्रसिद्ध रचना है। पेपीज़ (1632-1704) और एवलिन (1632-1706) की डायरियाँ अंग्रेजी साहित्य की निधि हैं। हॉब्स के समान ही लॉक (1623-1704) के राजनीतिक विचारों का भी ऐतिहासिक महत्व बहुत है।

18वीं शताब्दी में अंग्रेजी गद्य जीवन की गति के सबसे अधिक निकट आया। इसका कारण फ्रेंच साहित्य का बढ़ता हुआ प्रभाव था। स्विफ़्ट (1667-1745) अपनी अमर कृति ‘गुलिबर्ग ट्रैवेल्स’में अपने समय के मानवीय व्यापारों पर कठोर व्यंग करते हैं। उनके गद्य में बड़ा ओज और बल है। उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाओं में ‘ए टेल ऑव ए टब’और ‘दि बैटिल ऑव दि बुक्स’भी उल्लेखनीय है। 18वीं शताब्दी का साहित्य उठते हुए मध्य वर्ग की भावनाओं को व्यक्त करता है और इसके गद्य की शैली भी इस वर्ग की आवश्यकताओं के अनुरूप सरल और स्पष्ट है। इस युग के सफल गद्यकारों में डिफो, एडिसन और स्टील हैं। डिंफो (1660-1731) का उपन्यास ‘रॉबिन्सन कूसो’अंग्रेजी भाषा की विशेष लोकप्रिय रचनाओं में से हैं। उनके अन्य उपन्यास ‘मॉल फ्लैंडर्स’, ‘ए जर्नल ऑव दि प्लेग ईगर’आदि यथार्थवादी शैली में ढले हैं। एडिसन (1672-1719) और स्टील (1672-1729) मुख्यत: निबंधकार है। उन्होंने ‘दि टैटलर’ और ‘दि स्पेक्टेटर’ नाम के पत्र निकाल कर अंग्रेजी साहित्य में उच्च कोटि की पत्रकारिता की भी नींव रखी।

डॉ. जॉन्सन

अंग्रेजी साहित्य के इतिहास में डॉ. जॉन्सन (1709-84) का नाम अविस्मरणीय रहेगा। वे इतिहासकार, निबंधकार, आलोचक, कवि और उपन्यासकार थे। उन्होंने एक कोश की भी रचना की। इनकी गद्य कृतियों में ‘लाइव्ज़ ऑव दि पोएट्स’, ‘रासेलस’और ‘प्रीफेसेज़ टु शेक्सपियर’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। जॉन्सन की बातचीत भी, जो बॉजवेल लिखित जीवनी में संकलित है, उनके लेखन से कम महत्व की नहीं होती थी।

18वीं शताब्दी में अंग्रेजी उपन्यास का अपूर्व विकास हुआ। इस काल के उपन्यासकारों में गोल्डस्मिथ (1728-1774) भी थे जिन्होंने जल के समान तरल गति का गद्य लिखा और अनेक सुंदर निबंधों की रचना की। इनकी रचनाओं में ‘दि सिटिज़न ऑव दि वर्ल्ड’, ‘दि विकार ऑव बेकफील्ड’आदि सुविख्यात है। इतिहासकारों में हयूम, रॉबर्टसन और गिबन के नाम महत्वपूर्ण है। गिबन (1737-1784) अंग्रेजी गद्य के इतिहास के अमर हैं। शैली और निर्माण शक्ति की दृष्टि से उनका ग्रंथ ‘डिक्लाइन ऐंड फ़ाल ऑव दि रोमन एम्पायर’ एक स्मरणीय कृति है। इसी श्रेणी में प्रसिद्ध विचारक और वक्ता वर्क (1729-1797) का नाम भी आता है। उनके गद्य में बड़ी प्रवहमान शक्ति थी। उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिफ्लेक्शंस ऑन दि फ्रेंच रिवल्यूशन’है।

फ्रांसीसी क्रांति से प्रभावित रोमैंटिक साहित्य में मूलत: कविता प्रमुख है। रोमैंटिक कवियों ने अपने कृतित्व के बचाव में भूमिकाएँ आदि लिखीं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण वक्तव्य वर्ड सवर्थ का ‘प्रीफेस टु दि लिरिकल बैलड्स’, कोलरिज की ‘बायोग्रैफिया लिटरेरिया’और शेली की पुस्तक ‘ए डिफ़ेंस ऑव पोएट्री’है। रोमैंटिक युग का गद्य भावना और कल्पना से अनुरंजित है।

समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र पर जेरेमी बेंथम, रिकार्डो और एडस स्मिथ ने ग्रंथ लिखे। १९वीं शताब्दी में ‘एडिनबरा रिव्यू’, ‘क्वार्टर्ली’और ‘ब्लैकबुड’ के समान पत्रिकाओं का जन्म हुआ जिन्होंने गद्य साहित्य के बहुमुखी विकास में मदद की। १९वीं शताब्दी के प्रमुख निबंधकारों और आलोचकों में लैंब, हैज़लिट, ली हंट और डी क्विंसी के नाम अग्रगण्य है। लैंब (1775-1834) अंग्रेजी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ निबंधकार हैं। उनके निबंध ‘एसेज़ ऑव इलिया’के नाम से प्रकाशित हुए। हैज़लिट (1778-1830) उच्च कोटि के निबंधकार और आलोचक थे। डी क्विंसी (1785-1859) की पुस्तक ‘कन्फेशंस ऑव ऐन ओपियम ईटर’ अंग्रेजी साहित्य का अनुपम रत्न है।

विक्टोरिया युग के प्रारंभ से अंग्रेजी साहित्य अधिक संतुलन और संयम की ओर अग्रसर होता है और गद्य की शैली भी अधिक संयत हो जाती है, यद्यपि कार्लाइल और रस्किन के से गद्यकारों की रचना में हम रोमांटिक शैली का प्रभाव फिर देखते हैं।

मिल

मिल (1806-1873) ने अनेक ग्रंथ लिखकर दार्शनिक गद्य को समृद्ध किया। इतिहासकारों में मैकाले (1800-1859) का गद्य बहुरंगी और सबल था। उनके ऐतिहासिक निबंध बहुत ही लोकप्रिय हैं। साहित्यालोचन के क्षेत्र में मैथ्यू आर्नल्ड (1822-88) का कार्य विशेष महत्व का है। आर्नल्ड का चिंतन सुस्पष्ट था और यही स्पष्टता उनकी गद्य शैली की भी विशेषता है। विचारों के क्षेत्र में भी डारविन, हक्सले और हर्बर्ट स्पैंसर की कृतियाँ अंग्रेजी गद्य को महत्वपूर्ण देन है।

19वीं शताब्दी के गद्यकारों में कार्लाइल, न्यूमैन और रस्किन का उल्लेख अनिवार्य है। इनके लेखन में हमें अंग्रेजी गद्य की सर्वोच्च उड़ानें मिलती हैं। कार्लाइल (1795-1881) इतिहासकार और विचारक थे। उनके ग्रंथ ‘दि फ्रेंच रिवल्यूशन, पास्ट ऐंड प्रेज़ंट, हिरोज़ ऐंड हिरो वर्शिप’अंग्रेजी साहित्य के उत्कृष्ट नमूने हैं। उनकी आत्मकथा अंग्रेजी गद्य का उत्कृष्ट रूप प्रस्तुत करती है। रस्किन कलात्मक और सामाजिक प्रश्नों पर विचार करते हैं। उनकी कृतियों में ‘मॉडर्न पेंटर्स’, ‘दि सेविन लैप्स ऑव आर्किटेक्चर’, ‘दि स्टोन्स ऑव वनिस अंटू दिस लास्ट’, आदि विख्यात है।

सन्‌ 1890 के लगभग अंग्रेजी साहित्य एक नया मोड़ लेता है। इस युग के पितामह पेटर (1839-94) थे। उनके शिष्य ऑस्कर वाइल्ड (1856-1900) ने कलावाद के सिद्धांत को विकसित किया। उनका गद्य सुंदर और भड़कीला था और उनके अनेक वाक्य अविस्मरणीय होते थे। इस युग के लेखक इतिहास में ह्रासवादी कहे जाते हैं।

जनक येट्स

आयरिश गद्य के जनक येट्स (1865-1939) थे। उनका गद्य अनुपम साँचों में ढला है। उनके अनुगामी सिंज की देन भी महत्वपूर्ण है। नाटक के क्षेत्र में इन दोनों का बड़ा महत्व है। येट्स उच्च कोटि के कवि और चिंतक भी थे।

20वीं शताब्दी युद्ध, आर्थिक संकट और विद्रोही विचारधाराओं की शताब्दी है। विद्रोही स्वरों में सबसे सशक्त स्वर इस युग के प्रमुख नाटककार बर्नाड शा (1856-1950) का था। शा और वेल्स (1866-1946) दोनों को ही समाजवादी कहा गया है। इनके विपरीत चेस्टरटन, (1874-1936) और बेलॉक (1870-1953) वैज्ञानिक दर्शन के विरुद्ध खड़े हुए। वे दोनों ही उच्च कोटि के निबंधकार और आलोचक थे।

आधुनिक अंग्रेजी गद्य अनेक दिशाओं में विकसित हो रहा है। उपन्यास, नाटक, आलोचना, निबंध, जीवनी, विविध साहित्य, विज्ञान और दर्शन सभी क्षेत्रों में हम जागृति और प्रगति के लक्षण देखते हैं। लिटन स्ट्रैची (1880-1932) के समान जीवनी लेखक और टी.एस. इलियट (1888-1965) के समान आलोचक और चिंतक आज अंग्रेजी गद्य को नई तेजस्विता और शक्ति प्रदान कर रहे हैं। आज के प्रमुख निबंधकारों में ए.जी. गार्डिनर, ई.वी. ल्यूकस और रॉबर्ट लिंड विशेष उल्लेखनीय है। अनेक कहानीकार भी आधुनिक अग्रेजी गद्य को भरा-पूरा बना रहे हैं। अंग्रेजी का आधुनिक गद्य सुस्पष्ट, निर्मल और सुगठित है।

उपन्यास

अंग्रेजी उपन्यास विश्व के महान्‌ साहित्य का विशिष्ट अंग है। फील्डिंग, जेन ऑस्टिन, जार्ज इलियट, मेरेडिथ, टॉमस हार्डी, हेनरी जेम्स, जॉन गाल्सवर्दी और जेम्स ज्वॉयस के समान उत्कृष्ट कलाकारों की कृतियों ने उसे समृद्ध किया है। अंग्रेजी उपन्यास जीवन पर मर्मभेदी दृष्टि डालता है, उसकी समुचित व्याख्या करता है, सामाजिक अनाचारों पर कठोर आघात करता है और जीवन के मर्म को ग्रहण करने का अप्रतिम प्रयास करता है। अंग्रेजी उपन्यास ने अमर पात्रों को एक लंबी पंक्ति भी विश्व साहित्य को दी है। वह इंग्लैंड के सामाजिक इतिहास को एक अपूर्व झाँकी प्रस्तुत करता है।

अंग्रेजी उपन्यास की प्रेरणा के स्रोत मध्यकालीन ऐंग्लो-सैक्सन रोमांस थे, जिनकी अद्भुत घटनाओं और कथाओं ने परवर्ती कथाकारों की कल्पना को उड़ने के लिए पंख दिए। यह रोमांस जीवन की वास्तविकताओं के अतिरंजित चित्र थे और अलेक्सांदर अथवा ट्रॉय आदि के युद्धों से संबंध होते थे। ऐसे प्राचीन रोमांस आगे चलकर गद्य रूप में भी प्रस्तुत हुए। इनमें सर टॉमस मैलरी का ‘मौर्त द आर्थर’ (1484) विशेष उल्लेखनीय है। गद्य में कथा कहने का इंग्लैंड में यह पहला प्रयास था। अंग्रेजी उपन्यास के इतिहास में इसी प्रकार की अन्य कृतियाँ सर टॉमस मोर की ‘यूटोपिया’(1516) और सर फिलिप सिडनी की ‘आर्केडिया’(1590) थी।

कुछ इतिहासकार जॉन लिली (1554-1606) के उपन्यास ‘यूफुइस’(1580) को पहला अंग्रेजी उपन्यास कहते हैं। किस रचना को पहला अंग्रेजी उपन्यास कहा जाय, इस संबंध में बहुत कुछ मतभेद संभव है, किंतु अंग्रेजी उपन्यास के इतिहास में युफुइस का उल्लेख अनायास हो जाता है। इस उपन्यास की भाषा बहुत कुछ कृत्रिम और आलंकारिक है तथा अँग्रेजी गद्य के विकास पर इस शैली का बहुत प्रभाव पड़ा था। अंग्रेजी दरबारी जीवन का इस उपन्यास में सजीव और यथार्थ चित्रण है।

एलिज़ाबेथ के युग में शेक्सपियर के पूर्ववर्ती लेखकों ने अनेक उपन्यास लिखे, जिनमें से कुछ ने शेक्सपियर को उनके नाटकों के कथानक भी प्रदान किए। ऐसी रचनाओं में रॉबर्ट ग्रीन (1562-92) को ‘पैडोस्टो’और टॉमस लॉज (1558-1625) की ‘रोज़ेलिंड’उल्लेखनीय है। टॉमस नैश (1567-1601) पहले अंग्रेजी कथाकार थे जिन्होंने यथार्थवाद और व्यंग को अपनाया। उनके उपन्यास ‘दि अन्फार्चुनेट ट्रैवेलर ऑर दि लाइफ ऑव जैक विल्टन’में जीवन के बहुरंगी चित्र हैं। कथा का नायक विल्टन देश-विदेशों में घूमता-फिरता है और कथानक घटनाओं के विचित्र जाल में गुँथा है। एलिज़ाबेथ युगीन लेखकों में टॉमस डेलानी (1543-1600) को भी उपन्यासकार कहा गया है। उनके उपन्यास ‘जैक ऑव न्यूवरी’में एक तरुण जुलाहे का वर्णन है जो अपने स्वामी की विधवा से विवाह करके समृद्ध जीवन बिताता है।

17वीं शताब्दी में रोमांस का पुनरुत्थान हुआ, ऐसी कथाओं का जिनका उपहास ‘डॉन क्विग्ज़ोट ’ में किया गया है। अंग्रेजी उपन्यास की इन रचनाओं का कोई विशेष महत्व नहीं है। अंग्रेजी उपन्यास में एक महत्वपूर्ण कदम जॉन बन्यन (1628-1688) का उपन्यास ‘दि पिलग्रिम्स प्रोग्रेस’था। यह कथा रूपक है जिसमें कथा नायक क्रिश्चियन अनेक बाधाओं का सामना करता हुआ अपने लक्ष्य तक पहुँचता है।

डिफो (1661-1731) की रचनाओं का अंग्रेजी उपन्यास के विकास पर बहुत प्रभाव पड़ा। उन्होंने यथार्थवादी शैली को अपनाया, और जीवन की गति की भाँति ही उनके उपन्यासों की गति थी। उनका उपन्यास ‘रॉबिन्सन क्रूसो’अत्यंत लोकप्रिय हुआ। इसके अतिरिक्त भी उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण रचनाओं की सृष्टि की।

स्विफ्ट (1667-1745) अपने उपन्यास ‘गुलिवर्स ट्रैवेल्स’में मानव जाति पर कठोर व्यंग प्रहार करते हैं, यद्यपि उस व्यंग को अनदेखा करके अनेक पीढ़ियों के पाठकों ने उनकी कथाओं का रस लिया है।

18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में चार उपन्यासकारों ने अंग्रेजी उपन्यास को प्रगति का मार्गं दिखाया। रिचर्ड्‌सन (1689-1761) ने अपने उपन्यासों से मध्यम वर्ग के नए पाठकों को परितोष प्रदान किया। इनके तीन उपन्यासों के नाम हैं-‘पैमेला’, ‘क्लैरिसा हालों’और ‘सर चार्ल्स ग्रांडीसन’। रिचर्ड्‌सन की रचनाएँ भावुकता से भरी थीं और उनकी नैतिकता संदिग्ध थी। इन त्रुटियों की आलोचना के लिए फील्डिंग (1707-1754) ने अपने उपन्यास, ‘जोजेफ ऐंड्र्यूज’, ‘टाम जोन्स’, ‘एमिलिया’और ‘जोनेथन वाइल्ड’लिखे। इन रचनाओं ने अंग्रेजी उपन्यास को दृढ़ धरातल और विकास के लिए ठोस परंपरा प्रदान की। 18वीं शताब्दी में जिन चार उपन्यासकारों ने अंग्रेजी उपन्यास की विशेष समृद्ध किया उनमें दो अन्य नाम स्मॉलेट (1721-1771) और स्टर्न (1713-1768) के हैं। इस शताब्दी का एक और महत्वपूर्ण उपन्यास था गोल्डस्मिथ (1728-1774) का ‘दि विकार ऑव वेकफील्ड’।

सर वाल्टर स्कॉट (1771-1832) और जेन मास्टिन (1775-1817) की कृतियाँ अंग्रेजी उपन्यास की निधि है। स्कॉट ने अंग्रेजी इतिहास का कल्पनारंजित और रोमानी चित्रण अपने उपन्यासों में किया। स्काटलैंड के जनजीवन का अनुपम अंकन भी हमें उनकी कृतियों में मिलता है। स्कॉट इंग्लैंड के सबसे सफल ऐतिहासिक उपन्यासकार है। उनकी रचनाओं में ‘आइवनहो’, ‘केनिथवर्थ’और ‘दि टैलिस्मान’की बहुत ख्याति है। जेन आस्टिन मध्यवर्गीय नारी जीवन की कुशल कलाकार हैं। वे व्यंग और निर्ममता से पात्रों को प्रस्तुत करती है। बाह्य जीपन का इतना सजीव अंकन साहित्य में दुर्लभ है। जेन ऑस्टिन की रचनाओं में ‘प्राइड ऐंड प्रेजुडिस’, ‘एमा’और ‘पर्सुएशन’ की विशेष ख्याति है।

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अंग्रेजी उपन्यास प्रगति के शिखर पर पहुँचा। यह डिफेन्स (1812-1870) और थैकरे (1811-1863) का युग है। इस युग के अन्य महान उपन्यासकार जॉर्ज इलियट, जॉर्ज मेरेडिक, ट्रोलोप, हेनरी जेम्स आदि है। डिकेन्स इंग्लैंड के सबसे अधिक लोकप्रिय उपन्यासकार है। उन्होंने पिकविक के समान अमर पात्रों की सृष्टि की जो अंग्रेजी के पाठकों की स्मृति में सदा के लिए घर कर चुके हैं। डिकेन्स ने अपने काल की कुरीतियों पर भी अपने साहित्य में कठोर प्रहार किया। उन्होंने बच्चों की वेदना को अपनी कृतियों में मार्मिक अभिव्यक्ति दी। कानून की उलझनों, सरकारी दफ्तरों केचक्र, फ़ैक्टरियों में मजदूरों के कष्ट आदि विषयों का भी डिकेन्स की कृतियों में सशक्त अंकन है। उनके उपन्यासों में ‘पिकनिक पेपर्स’, ‘ऑलिवर ट्विस्ट’, ‘ओल्ड क्यूरिऑसिटी शॉप’, ‘डेविड कॉपरफील्ड’, ‘ए टेल ऑव टू सिटीज’, ‘ग्रेट एक्सपेक्टेशन्स’, आदि विशेष महत्वपूर्ण है।

डिकेन्स के समकालीन थैकरे ने अपने युग के महत्वाकांक्षी और पाखंडी लोगों पर अपनी कृतियों में कठोर प्रहार किए। थैकरे का साहित्य परिमाण में अपेक्षाकृत कम है, किंतु आधे दर्जन स्मरणीय उपन्यासों में उन्होंने बेकी शार्प और बिट्रिक्स जैसे पात्रों की विफलता का मार्मिक अंकन किया। थैैकरे के उपन्यासों में गहरी वेदना छिपी है। संसार उन्हें एक विराट् मेला प्रतीत होता था। उनके उपन्यासों में ‘वैनिटी फेयर’, ‘हेनरी एस्मंड’, ‘पेन्डेनिस’ तथा ‘दि न्यूकम्स’विशेष महत्वपूर्ण के हैं।

विक्टोरिया युग में अनेक महत्वपूर्ण कलाकारों ने अंग्रेजी उपन्यास को समृद्ध किया। डिज़रेली (1804-1881) ने राजनीतिक उपन्यास लिखे, बुलबर लिटन (1803-1873) ने ‘दि लास्ट डेज़ ऑव पांपेई’के से सफल ऐतिहासिक उपन्यास लिखे। चार्ल्स किंग्सली (1891-1875) ने ‘वेस्टवर्ड’हो और ‘हिपैशिया’के से उत्कृष्ट ऐतिहासिक उपन्यास अंग्रेजी को दिए। इसी प्रकार चार्ल्स रोड (1814-1884), चार्लेट ब्रौन्टे (1816-1855), ऐमिली ब्रौन्टे (1818-1848), मिसेज गैस्केल (1810- 1908), विल्की कॉलिन्स (1824-1889) आदि के नाम अंग्रेजी उपन्यास के इतिहास में स्मरणीय है।

जार्ज इलियट (1819-1880) की गणना इंग्लैंड के महान्‌ उपन्यासकारों में है, यद्यपि काल के प्रवाह ने आज उनकी कला का मूल्य कम कर दिया है। उनके विशेष सफल उपन्यासों में ‘साइलस मार्नर’, ‘ऐडम बीड’, ‘दि मिल ऑन दि फ्लास’और ‘रामोला’के नाम हैं। ऐंटनीट्रौलौप (1815-82) ने बारसेट नाम के क्षेत्र का अंतरंग चित्रण अपने उपन्यासों में किया और स्थानीय रंग का महत्व उपन्यास साहित्य में प्रतिष्ठित किया। मेरेडिथ (1828-1909) ने अपने पात्रों की मानसिक उलझनों की विशद व्याख्या अपने उपन्यासों में प्रस्तुत की। इनमें ‘इगोइस्ट’की बहुत ख्याति हुई। मनोवैज्ञानिक गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास हेनरी जेम्स (1843-1916) की कला में उपन्यास को अंतर्मुखी रूप देता है। टॉमस हार्डी (1840-1928) विश्व के विधान पर कठोर आघात करते हैं और मनुष्य को जीवन शक्तियों के असहाय शिकार के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हार्डी ने अंग्रेजी उपन्यास को गाढ़े क्षेत्रीय रंग में भी रँगा। उनके उपन्यासों में ‘दि रिटर्न ऑव दि नेटिव’, ‘दि मेयर ऑव कैस्टरब्रिज’, ‘टेस’, और ‘ज्यूड दि आब्सक्योर’ महत्वपूर्ण है।

आधुनिक काल में एक ओर तो मनोविश्लेषणवाद का महत्व बढ़ा जिसके कारण अंग्रेजी उपन्यास में ‘चेतना के प्रवाह’नाम की प्रवृत्ति का उदय हुआ. दूसरी ओर जीवन के सूक्ष्म किंतु व्यापक रूप को समझने के प्रयास, का भी विकास हुआ। जेम्स ज्वॉयस (1882-1942) रचित ‘यूलिसीज़’उपन्यास मन के सूक्ष्म और महान व्यापारों का अध्ययन प्रस्तुत करता है। उन्हीं के समान वर्जीनिया वुल्फ (1882-1941) और डॉरोथी रिचर्ड्‌सन भी ‘चेतना के प्रवाह’की शैली को अपनाती है। एच. जी. वेल्स (1866-1946), आर्नल्ड बैनेट (1867-1931) और जॉन गाल्सवर्दी (1867-1933) की कृतियाँ अंग्रेजी उपन्यास की आधुनिक शक्ति का अनुभव पाठक को कराती हैं। वेल्स सामाजिक और वैज्ञानिक समस्याओं को अपनी रचनाओं में उठाते हैं। आर्नल्ड बैनेट यथार्थवादी दृष्टि से इंग्लैंड के ‘पाँच नगर’ शीर्षक क्षेत्र का सूक्ष्म चित्रण करते हैं। गाल्सवर्दी इंग्लैंड के उच्च मध्यवर्गीय जीवन की व्यापक झाँकी फोर्साइट नाम के परिवार के माध्यम से देते हैं। डी.एच. लॉरेन्स (1885-1930) और आल्डस हक्सले (1894-1963) आज के प्रमुख अंग्रेजी उपन्यासकारों में उल्लेखनीय हैं। इसी श्रेणी में ई.एम. फॉर्स्टर (1871-1970), ह्यू वालपोल (1889-1941), जे.बी. प्रीस्टले (1894) और सॉमरसेट मॉम (1874-1958) भी हैं।

कहानी

कहानी की जड़ें हजारों वर्ष पूर्व धार्मिक गाथाओं और प्राचीन दंत कथाओं तक जाती है, किंतु आज के अर्थ में कहानी का आरंभ कुछ ही समय पूर्व हुआ। अंग्रेजी साहित्य में चॉसर की कहानियाँ अथवा जुलाहों के जीवन से संबंधित डेलानी की कहानियाँ पहले भी मिलती हैं, किंतु वास्तव में कहानी की लोकप्रियता १९वीं शताब्दी में बढ़ी। पत्र-पत्रिकाओं की स्थापना और आधुनिक जीवन की भाग-दौड़ के साथ कहानी का विकास हुआ। १८वीं शताब्दी में निबंध के साथ हमें कहानी के तत्व लिपटे हुए मिलते हैं। इस प्रकार की रचनाओं में सर रॉजर डि कवर्ली से संबद्ध स्केच उल्लेखनीय है। १९वीं शताब्दी में हमें पूर्णत: विकसित कहानी मिलती है।

कहानी जीवन की एक झाँकी मात्र हमें देती है। उपन्यास से सर्वथा अलग इसका रूप है। कहानी की सबसे सफल परिभाषा जीवन का एक अंश है। स्कॉट और डिकेन्स ने कहानियाँ लिखी थीं। डिकेन्स ने अपना साहित्यिक जीवन ही ‘स्केचेज बाइ बौज़’नाम की रचना से शुरू किया था, यद्यपि इनकी वास्तविक देन उपन्यास के क्षेत्र में है। ट्रोलोप और मिसेज़ गैस्केल ने भी कहानियाँ लिखी थीं, किंतु कहानी के सर्वप्रथम बड़े लेखक वाशिंगटन अरविग, हॉर्थार्न, ब्रेट हार्ट और पो अमरीका में हमें मिलते हैं। अरविंग (1783-1859) की ‘स्केच बुक’अपूर्व कहानियों का भांडार है। इनमें सबसे सफल ‘रिप वान विंकिल’है। हाथार्न (1804-64) की कहानियाँ हमें परीलोक के स्वप्न दिखाती हैं। ब्रेट हार्ट (1829-1902) की कहानियों में अमरीका की पश्चिम की बस्तियों के अव्यवस्थित जीवन का दिग्दर्शन है। पो (1809-1849) विश्व के सर्वश्रेष्ठ कहानी लेखक कहे जाते हैं। उनकी कहानियाँ भय, आतंक और आश्चर्य से पाठक को अभिभूत कर डालती है।

इंग्लैंड में स्टीवेन्सन (1850-1894) ने कहानी की प्रौढ़ता प्रदान की। उनकी ‘मार्खेइम’, ‘विल ओ दि मिल’और ‘दि बाटल इम्प’आदि कहानियाँ सुप्रसिद्ध हैं। हेनरी जेम्स (1843-1916) उपन्यासों के अतिरिक्त कहानी लिखने में भी बहुत कुशल थे। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में उनकी सफलता अपूर्व थी। ऐंब्रोज़ बीअर्स (1842-1913) कोमल और संश्लिष्ट भावनाओं को व्यक्त करने में अत्यंत कुशल थे। कैथरीन मैन्सफ़ील्ड (1889-1923) सुकुमार क्षणों का चित्रण वुरुश के हल्के आघातों के समान करती है।

20वीं शताब्दी के सभी बड़े उपन्यासकारों ने कहानी को अपनाया। यह १९वीं सदी की परंपरा में ही एक आगे बढ़ा हुआ कदम था। टॉमस हार्डी की ‘वेसेक्स टेल्स’के समान एच.जी. वेल्स, कॉनरड, आर्नल्ड बेनेट, जॉन गाल्सवर्दी, डी.एच. लारेन्स, आल्डस हक्स्ले, जेम्स ज्वॉयस, सॉमरसेट मॉम आदि के लिए अनेक सफल कहानियाँ लिखीं।

एच.जी. वेल्स (1866-1946) वैज्ञानिक विषयों पर कहानी लिखने में सिद्धहस्त थे। उनकी ‘स्टोरीज़ ऑव टाइम ऐंड स्पेस’बहुत ख्याति पा चुकी है। कॉनरड (1856-1924) पोलैंड निवासी थे, किंतु अंग्रेजी कथा साहित्य को उनकी अद्भुत देन है। आर्नल्ड बैेनेट (1867-1931) पाँच कस्बों के क्षेत्रीय जीवन से संबंधित कहानियाँ, जैसे ‘टेल्स ऑव दि फ़ाइव टाउन्स’ लिखते थे। जॉन गाल्सवर्दी (1867-1933) की कहानियाँ गहरी मानवीय संवेदना में डूबी हैं। उनका कहानी संग्रह, ‘दि कैरवन’अंग्रेजी में कहानी के अत्यंत उच्च स्तर का हमें परिचय देता है। डी.एच. लॉरेन्स (1885-1930) की कहानियों का प्रवाह धीमा है और वे उलझी मानसिक गुत्थियों के अध्ययन प्रस्तुत करती हैं। उनका कहानी संग्रह ‘दि वूमन हू रोड अवे’सुप्रसिद्ध है। आल्डस हक्स्ले (1894-1963) अपनी कहानियों में मनुष्य के चरित्र पर व्यंग भरे आघात करते हैं। उन्हें जीवन में मानो श्रद्धा के योग्य कुछ भी नहीं मिलता। जेम्स ज्वॉयस (1882-1941) अपनी कहानियों ‘डब्लिनर्स’में डब्लिन के नागरिक जीवन की यथार्थवादी झाँकियाँ पाठक को देते हैं। सॉमरसेट मॉम (1874-1958) अपनी कहानियों में ब्रिटिश साम्राज्य के दूरस्थ उपनिवेशों का जीवन व्यकत करते हैं। आज की अंग्रेजी कहानी मानव चरित्र के निकृष्टतम रूपों पर ध्यान केंद्रित करती है। इसके कारण युद्ध का संकट, पाश्चात्य जीवन की विश्रृंखलता, और मानवीय मूल्यों का विघटन हैं। शिल्प की दृष्टि से आज कहानी का पर्याप्त परिमार्जन हो चुका है, किंतु साथ ही उसके भीतर निहित मूल्यों का ्ह्रास भी हुआ है।

कविता

प्राचीन काल (650-1350 ई.)–बहुत समय तक 14वीं सदी के कवि चॉसर को ही अंग्रेजी कविता का जनक माना जाता था। अंग्रेजी कविता की केंद्रीय परंपरा की दृष्टि से यह धारणा सर्वथा निर्मूल भी नहीं है। लेकिन वंशानुगतिकता के आधार पर अब चॉसर के पूर्व की सारी कविता का अध्ययन प्राचीनकाल के अंतर्गत किया जाने लगा है।

नार्मन विजय ने इंग्लैंड की प्राचीन ऐंग्लो-सैक्सन संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला और उसे नई दिशा दी। इसलिए प्राचीन काल के भी दो स्पष्ट विभाजन किए जा सकते हैंउद्भव से नार्मन विजय तक (650-1066 ई.), और नार्मन विजय से चॉसर के उदय तक (1066-1350 ई.) भाषा की दृष्टि से हम इन्हें क्रमश: ऐंग्लो-सैक्सन या प्राचीन अंग्रेजी काल और प्रारंभिक मध्यदेशीय अंग्रेजी (मिडिल इंग्लिश) काल भी कह सकते हैं।

प्राचीन अंग्रेजी कविता–लगभग 500 वर्षों तक प्राचीन अंग्रेजी में कविताएँ लिखी जाती रहीं लेकिन आज उनका अधिकांश केवल चार हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त है। उस काल की सारी कविता का ज्ञान इनके अतिरिकत दो-चार और रचनाओं तक ही सीमित है।

ऐंग्लो-सैक्सन कबीले ट्यूटन जाति के थे जो प्रकृति और प्राकृतिक देवी-देवताओं के पूजक थे। वे अपने साथ साहसिक जीवन और युद्धों के बीच पैदा हुई कविता की मौखिक परंपरा भी इंग्लैंड ले आए। छठी शताब्दी के अंतिम वर्षों में उन्होंने व्यापक पैमाने पर इतिहास की दीक्षा ली। इस प्रकार प्राचीन अंग्रेजी कविता सांस्कृतिक दृष्टि से बर्बर सभ्यता और ईसाइयत का संगम है। एक ओर ‘विडसिथ’, ‘वाल्डियर’, ‘बैेवुल्फ’, ‘दि फाइट ऐट फ़िन्सबर्र’, ब्रुनबर्र और ‘दि बैटिल ऑव माल्डॉन’ जैसी, पराक्रमपूर्ण अभियानों और युद्धों की गाथाओं में ईसाई धर्म की सदाशयता, करुणा, रहस्यात्मकता, आध्यात्मिक निराशा और नैतिकता की छाया है तो दूसरी ओर सातवीं शताब्दी के कैडमन और आठवीं नवीं के सिनउल्फ की बाइबिल की कथाओं और संतों की जीवनियों पर लिखी कविताओं में पुरानी वीर गाथाओं का रूप अपनाया गया है। उपदेश की प्रवृत्ति के कारण प्राचीन अंग्रेजी कविता में गीतिकाव्य डियोर्स लेमेंट जैसे नाटकीय गीतों और ‘दि वांडरर’, ‘दि सीफेयरर’, ‘दि गइन’, ‘दि वाइफूस कंप्लेंट’जैसे शोक गीतों तक सीमित हैं। एक छोटा-सा अंश पहेलियों और हास्यपूर्ण कथोपकथनों का भी है। प्राचीन अंग्रेजी कविताएँ अत्यंत अलंकृत और अस्वाभाविक भाषा में लिखी गई हैं। शब्दक्रीड़ा इन कवियों का स्वभाव है और एक-एक शब्द के कई पर्याय देने में उन्हें बड़ा आनंद आता है। प्राचीन अंग्रेजी कविता में पद्मरचना का आधारभूत सिद्धांत अनुप्रास है। यह व्यंजन मुखर भाषा है और व्यंजनों के अनुप्रास पर ही पंक्तियों की रचना होती है। प्रत्येक पंक्ति के दो भाग होते हैं जिनमें से पहले में दो और दूसरे में एक निकटतम वर्णों में यह स्वराघातपूर्ण अनुप्रास रहता है। इन कविताओं में तुकों का सर्वथा अभाव है।

प्रारंभिक मध्यदेशीय अंग्रेजी काल नार्मन विजय इंग्लैंड पर फ्रांस की सांस्कृतिक विजय भी थी। इसके बाद लगभग 200 वर्षों तक फ्रेंच भाषा अभिजातों की भाषा बनी रही। पुरानी आनुप्रासिक कविता की परंपरा लगभग समाप्त हो गई। दूसरे शब्दों में, यह पुरानी गाथाओं पर रोमानियत की विजय थी। साथ ही अनुप्रासों की जगह अब तुकों ने ले ली। 12वीं शताब्दी में इस प्रकार की नई कविता का अद्भुत विकास फ्रांस और स्पेन में हुआ। यह युग इस्लाम के विरूद्ध ईसाइयों के धर्मयुद्धों (क्रुसेंडों) का था और प्रत्येक ईसाई सरदार अपने की नाइट (सूरमा) के रूप में चित्रित देखना चाहता था। फ्रांस के वैतालिकों और चारणों ने गाथाओं का निर्माण किया। इनके प्रधान तत्व शौर्य, प्रेम, ईश्वर भक्ति, अज्ञात के प्रति आकर्षण और कभी-कभी कवि की व्यक्तिगत अनुभूतियों की अभिव्यक्ति थे। फ्राँस के रोलाँ और इंग्लैंड के आर्थर की गाथाओं तथा केल्टी दंतकथाओं के अतिरिकत लातीनी प्रेमगाथाओं ने भी इस काल की कविता को समृद्ध किया। इस तरह 13वीं शताब्दी में लौकिक और धार्मिक दोनों तरह की गीतिप्रधान कविताओं के कुछ उत्कृष्ट नमूने प्रस्तुत हुए। यूरोपीय संगीत, फ्रेंच छंद और पदरचना तथा वैतालिकों और चारणों की उदात्त कल्पना ने मिलकर इस युग की कविता को सँवारा। 12वीं और 13वीं सदी की कुछ प्रसिद्ध रचनाओं में ‘द आउल ऐंड दि नाइटइंगेल’, ‘आरम्युलम’, ‘कर्सर मंडाइ’, ‘हैवेलाक दि डेन’, ‘आर्थर ऐंड मर्लिन’, ‘ग्रिक ऑव कान्शंस’, ‘डेम सिरिथ’, ब्रुुट इत्यादि हैं। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इस युग की अधिकांश कविता उच्च कोटि की नहीं है। 14वीं सदी के उत्तरार्ध ने पहले पहल चॉसर और उनके अतिरिकत कुछ और महत्वपूर्ण कवियों का उदय देखा। इस प्रकार मध्यदेशीय अंग्रेजी (मिडिल इंग्लिश) का प्रारंभिक काल उपलब्धियों से अधिक प्रयत्नों का था।

चॉसर से पुनर्जागरण तक

चॉसर (1340 ई.? -1400 ई.) ने मध्यदेशीय अंग्रेजी कविता के अनेक तत्व ग्रहण किए। लेकिन उसने उसके रूप और वस्तु में क्रांति कर बाद के अंग्रेजी कवियों के लिए एक नई परंपरा स्थापित की। उसकी समृद्ध भाषा और शैली को स्पेंसर ने ²अंग्रेजी का पावन स्रोत² कहा और उसमें काव्य और जीवन की विविधता की ओर संकेत करते हुए ड्राइडन ने कहा ²यहाँ पर ईशसुलभ प्रचुरता है।²

चॉसर की कविता रस और अनुभवसिद्ध उदारचेता व्यक्ति की कविता है। उसे दरबार, राजनीति, कूटनीति, युद्ध, धर्म, समाज और इटली तथा फ्रांस जैसे सांस्कृतिक केंद्रों का व्यापक ज्ञान था। उसने अंग्रेजी कविता को एकांतिकता और संकुचित दृष्टिकोण से मुक्त किया। मध्ययुगीन यूरोप की सामंती संस्कृति के दो प्रमुख रोमानी तत्वों, दाक्षिण्य (कटसा) और माधुर्य (ग्रेस) का आदर्श फ्रेंच, जर्मन और स्पेनी भाषाओं में प्रस्तुत हो चुका था। इंग्लैंड में चॉसर और उसके समसामयिक कवि गॉवर (1330-1408) ने उस आदर्श को समान सफलता के साथ अंग्रेजी कविता में प्रतिष्ठित किया।

मध्यदेशीय अंग्रेजी को फ्रेंच कविता के उदात्त भाव और उसकी अभिव्यक्ति की स्वच्छता, सुघरता और सरसता देने के कारण प्राय चॉसर को अंग्रेजी में लिखने वाला फ्रेंच कवि कहा जाता है। इसमें संदेह नहीं कि चॉसर ने प्रसिद्ध प्रेमगाथा ¢ दि रोमांस ऑव्‌ दि रोज़¢ और अपने पूर्ववर्ती या समकालीन फ्रेंच कवियों, माशो (Machaut), दशाँ, (Daschamps) फ़्वासार (Froissart), और ग्राँजों (Granson) से बहुत कुछ सीखा। ¢ दि बुक ऑव डचेंस¢ , ¢ दि पार्लियामेंट ऑव फाउल्स¢ , ¢ दि हाउस ऑव फैम¢ आदि उसकी प्रारंभिक रचनाओं और ¢ दि लीजेंड ऑव गुड विमेन¢ को प्रस्तावना मे यह प्रभाव देखा जा सकता है। इनमें प्रतीक योजना या रूपक (अलेगरी), स्वप्न, आदर्श प्रेम, मधु प्रात, कलरवमग्न पक्षी इत्यादि फ्रेंच कविता की अनेक विशेषताओं का समावेश है। चॉसर की छंद रचना पर भी उसका व्यापक प्रभाव है।

1372 ई. में चॉसर की प्रथम इटली यात्रा के बाद उसकी कविता में एक और नया तत्व आता है । दांते , पेत्रार्क और बोक्काच्चो ने उसे न केवल नए विषय दिए बल्कि नई दृष्टि भी दी । इनमें से अंतिम कवि ने उसे सबसे अधिक प्रभावित किया। बोक्काच्चो से अनेक कथाएँ लेने के अतिरिक्त चॉसर ने वर्णन की निपुणता, आकर्षक चित्र योजना और आवेग-पूर्ण अभिव्यक्ति की कला सीखी। उसकी प्रसिद्ध रचना फ़ ट्रायलस ऐंड क्रेसिडफ़ पर यह नया प्रभाव स्पष्ट है। लेकिन चॉसर की प्रतिभा केवल ऋणों पर जीवित रहने वाली नहीं थी; उसने अनेक प्राचीन कथाओं को यथार्थ और नाटकीय चरित्र-चित्रण, विनोद और व्यंग्य और उत्साहपूर्ण वर्णन से अत्यंत सजीव कर दिया।

चॉसर की अंतिम और महान कृति फ़ दि कैंटरबरी टेल्सफ़ में उसकी प्रतिभा अपनी सारी शक्ति के साथ प्रकट हुई। यह रचना उसके समाज का चित्र है और अपने यथार्थवाद के कारण इसने फ्रांस और इटली की तत्कालीन कविता को बहुत पीछे छोड़ दिया। इस रचना में चॉसर ने अपना सारा ज्ञान और मानव जीवन का अध्ययन उँडेल दिया। इसमें यथार्थ चरित्र-चित्रण और चरित्रों के पारस्परिक सघंर्ष द्वारा चॉसर ने नाटक और उपन्यास के भावी विकास को भी प्रभावित किया। उदार व्यंग्य और विद्रूप की परंपरा भी इसी कृति से प्रारंभ हुई।

चॉसर में छदों के प्रयोग की अद्भुत क्षमता थी। फ़ ट्रायलस ऐंड क्रेसिडफ़ में प्रयुक्त सात पंक्तियों का फ़ राइम रायलफ़ और फ़ दि कैंटरबरी टेल्सफ़ में प्रयुक्त दशवर्णी तुकांत द्विपदी का व्यापक प्रयोग आगे की अंग्रेजी कविता में हुआ।

चॉसर के समसामयिकों में गॉवर का स्थान भी ऊँचा है। उसकी रचना फ़ कन्.फेसियो अमांटिसफ़ की प्रेम कहानियों पर नैतिकता का गहरा पुट है। इसलिए उसे फ़ सदाचारी गॉवरफ़ भी कहा गया। उसमें चॉसर की यथार्थवादिता और विनोदप्रियता नहीं है। वह प्रतिभा से अधिक स्वच्छ शिल्प का कवि है।

विलियम लैंगलैंड 14वीं शताब्दी की अत्यंत प्रसिद्ध रचना फ़ पियर्स प्लाउमनफ़ का कवि है। उसने अंग्रेजी की सानुप्रासिक शैली का व्यवहार किया। लेकिन उसकी कविता उस युग के सामाजिक और धार्मिक पाखंडों के विरुदध चुनौती है। उसमें जीवन के लिए धर्म और उसकी रहस्यभावना के महत्व की स्थापना है। पूरी रचना रूपक है और उसके अर्थ के कई स्तर हैं। लेकिन लैंगलैंड ने कथा के अंशों को सफलता के साथ एकान्वित किया है। लैंगलैंड में चॉसर और गॉवर का माधुर्य नहीं, वह आक्रोश और ओज का कवि है।

इसी युग में कुछ और भी सानुप्रासिक रचनाएँ हुई जिनमें फ़ सर ग्वाइन ऐंड दि ग्रीन नाइटफ़ और फ़ पर्लफ़ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ये क्रमश आथर की गाथा और फ़ दि रोमांस ऑव दि रोज़फ़ पर आधारित है। पहली में चरित्र-चित्रण की सूक्ष्म दृष्टि और प्रकृति के असाधारण रूपों और स्थितियों के प्रति मोह व्यक्त होता है और दूसरी रचना अवसादपूर्ण कोमल भावनाओं और रहस्यानुभूति से ओत प्रोत है।

चॉसर की म्रत्यु और पुनर्जागरण के बीच का समय अर्थात्‌ पूरी 15वीं शताब्दी कविता की दृष्टि से अनुर्वर है। चॉसर के अनेक और लैंगलैंड के कुछ अनुयायी इंग्लैंड और स्कॉटलैंड में हुए। लेकिन उनमें से अधिकांश की कविता निर्जीव है। आक्लीव, लिडगेट, हॉज, बार्कले और स्केल्टन जैसे अंग्रेज अनुयायियों से कहीं अधिक शक्तिशाली स्कॉटलैंड के अनुयायी राबर्ट हेनरीसन, विलियम डनबर और जेम्स प्रथम थे, क्योंकि उन्होंने अपनी बोली, अपनी भूमि के प्राकृतिक सौंदर्य और अनुभूतियों की सच्चाई का अधिक ध्यान रखा। इस शताब्दी की महत्वपूर्ण रचनाओं में धर्म, प्रेम तथा पराक्रम संबंधी गीतों और बैलडों का उल्लेख किया जा सकता है। व्यंग्य और विनोदपूर्ण कविताएँ भी लिखी गईं ।

पुनर्जागरण युग

मध्ययुगीन संस्कृति के अवशेषों के बावजूद १६वीं शताब्दी इंग्लैंड में पुनर्जागरण के मानवतावाद का उत्कर्ष काल है। यह मानवतावाद सामंती व्यवस्था के धर्म, समाज, नैतिकता और दर्शन के विरूद्ध व्यापारी पूँजीपतियों के नए वर्ग की विचारधारा थी। इसी वर्ग की प्रेरणा से धर्म-सुधार-आंदोलन (रिफार्मेशन) हुआ, ज्योतिष और विज्ञान में क्रांतिकारी अनुसंधान हुए, धन और नए देशों की खोज में साहसिक सामुद्रिक यात्राएँ हुईं। मानवतावाद ने व्यक्ति के ज्ञान और कर्म की अमित संभावनाओं के साथ-साथ साहित्य में प्रयोगों और कल्पना की मुक्ति की घोषणा की।

16वीं शताब्दी

इंग्लैंड में इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी के काफी बाद आने के कारण यहाँ का पुनर्जागरण इन देशों, विशेषत इटली,से अत्यधिक प्रभावित हुआ। पुनर्जागरण के प्रथम दो कवियों में सर टॉमस वायट (1503-42) और अर्ल ऑव सरे (1517-47) हैं। वायलट ने पेत्रार्क के आधार पर अंग्रेजी में सॉनेट लिखे और इटली से अनेक छंद उधार लिए। सरे ने सॉनेट के अतिरिक्त इटली से अतुकांत छंद लिया। इन कवियों ने प्राचीन यूनानी साहित्य और पेत्रार्क इत्यादि को पैस्टरल कविता की रूढ़ियों को अंग्रेजी में आत्मसात्‌ किया तथा अनेक सुंदर और तरल गीत लिखे।

इस तरह उन्होंने एलिज़ाबेथ के शासनकाल के अनेक बड़े कवियों के लिए जमीन तैयार की। इनमें सबसे पहले एडमंड स्पेंसर (1552-99) और सर फिलिप सिडनी उल्लेखनीय हैं। मृत्यु के बाद प्रकाशित सिडनी की रचना फ़ ऐसट्रोफेल ऐंड स्टेलाफ़ (1591) ने कथाबद्ध सॉनेट की परंपरा को जन्म दिया। इसके पश्चात्‌ तो ऐसे सॉनेटों की एक परंपरा चल निकली और डेनियल, लॉज, ड्रेटन, स्पेंसर, शेक्सपियर और अन्य कवियों ने इसे अपनाया। इनमें रूढ़ियों के कारण वास्तविक और काल्पनिक प्रेमी-प्रेमिकाओं का भेद करना आसान नहीं, लेकिन सिडनी और कई अन्य कवियों, जैसे ड्रेटन, स्पेंसर और शेक्सपियर का प्रेम केवल वायवी प्रेम नहीं है। सिडनी ने लिखा फ़ फूलफ़ , फ़ सेड माइ म्यूज टु मीफ़ , फ़लुक इन दाइ हार्ट ऐंड राइट।फ़

विचारों में संस्कार तथा चारुता और काव्य में व्यापकता और विविधता की दृष्टि से स्पेंसर को इंग्लैंड में पुनर्जागरण का प्रतिनिधि कवि कहा जा सकता है। उसने प्राचीन यूनान से लेकर आधुनिक यूरोप की साहित्यिक जागरण से समन्वित किया। उदाहरण के लिए उसकी प्रसिद्ध रचना दि फ़ेयरी क्वीन का कथानक मध्ययुगीन है, लेकिन उसकी आत्मा मानवतावाद की है। गोपगीत (पैस्टरल), मर्सिया (एलेजी), व्यंग्य और विद्रूप, सॉनेट, रूपक, प्रेमकाव्य, महाकाव्य जैसे अनेक रूपों से उसने अंग्रेजी कविता की सीमाओं का विस्तार किया। उसने भाषा को इंद्रियबोध, संगीत और चित्रमयता दी। छंदों के प्रयोग में भी वह अद्वितीय है। इसीलिए उसे फ़ कवियों का कविफ़ कहा जाता है।

एलिज़ाबेथ के शासनकाल में गीति की परंपरा और भी विकसित हुई। एक ओर ओविद् के अनुकरण पर श्रृंगारपूर्ण गीतों, जैसे मार्लों के हीरो ऐंड लियंडर और शेक्सपियर के वीनस ऐंड अडॉनिस और रेप ऑव लुक्रीस की रचना हुई, तो दूसरी ओर बैलडों और लोकगीतों की परंपरा में ऐसे गीतों की जिनमें उस काल के अनेक पक्ष--युद्ध और प्रेम से लेकर तंबाकू तक--प्रतिबिंबित हुए। इन पर इटली के संगीत का प्रभाव स्पष्ट है। ऐसे मस्ती भरे, सरल, मधुर और सुघर गीत लिली, पील, ग्रीन, डेकर और शेक्सपियर के नाटकों के अतिरिक्त विलियम बर्ड, टॉमस मार्लों, टॉमस कैंपियन, लॉज, राली, ब्रेटन, वाट्सन, नैश, डन और कांस्टेबिल की रचनाओं में बड़ी संख्या में प्राप्त होते हैं। इन कवियों ने अंग्रेजी कविता में फ़ वैतालिक पखेरुओं का घोंसलाफ़ बनाया।

16वीं शताब्दी की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में अतुकांत छंद का विकास भी है। मार्लों और शेक्सपियर ने अरुद्धचरणांत वाक्यों द्वारा इसमें आर्केस्ट्रा के संगीत अनुच्छेद की शैली का विकास किया। मार्लो ने यदि इसे प्रपात का वेग और उच्च स्वरता दी तो शेक्सपियर ने यतियों की विविधता से इसे सूक्ष्म चिंतन से लेकर साधारण वार्तालाप तक की क्षमता दी। संक्षेप में 16वीं सदी के कवियों में आत्मविश्वास का स्वर है। उनकी कविता निसर्ग (फ़ नेचरफ़ ) की तरह नियमबद्ध किंतु उन्मेषपूर्ण, शब्दों और चित्रों में उदार और अलंकृत, संगीत, लय और ध्वनि में मुखर, तुकों और छंदों में व्यवस्थित और स्पर्श, रूप, रस और गंध में प्रबुद्ध है।

17वीं सदी पूर्वार्ध एलिज़ाबेथ के बाद का समय धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में संघर्ष और संशय का था। कवि अपने परिवेश की अतिशय बौद्धिकता और अनुदारता से त्रस्त जान पड़ते हैं। स्पेंसर के शिष्य ड्रमंड, डैनियल, चैपमन और ग्रेविल भी इससे अछूते नहीं हैं। इस सदी के पूर्वार्ध में कविता का नेतृत्व वेन जॉन्सन (1572-1637) और जॉन डन (1572-1631) ने किया। उनकी काव्य धाराओं को क्रमश फ़ कैवेलियरफ़ (दरबारी) और फ़ मेटाफ़िज़िकलफ़ (अध्यात्मवादी) कहा जाता है। इस विभाजन के बावजूद उनमें बौद्धिकता, कविताओं और गीतों की लघुता, रति और श्रृंगार, ईश्वर के प्रति भक्ति और उससे भय इत्यादि समान गुण हैं। एलिज़ाबेथ युग की कविता के औदार्य के स्थान पर उनमें घनत्व है।

वेन जॉन्सन इंग्लैंड का प्रथम आचार्य कवि है। उसने कविता को यूनानी और लातीनी काव्यशास्त्र के साँचे में ढाला। उसकी कविता में बुद्धि और अनुभूति के संयम के अनुरूप नागरता, रचना संतुलन और प्रांजलता है। इसी प्रवृत्ति से बेन जॉन्सन की संतुलित, स्वायत्त और सूक्ति प्रधान दशवर्णी द्विपदी (हिरोइक कपलेट) का जन्म हुआ, जो चॉसर की द्विपदी से बिलकुल भिन्न प्रकार की है और जो १८वीं शताब्दी की कविता पर छा गई। उसके प्रसिद्ध आत्मजों में रॉबर्ट हेरिक, टॉमस केरी, जॉन सकलिंग और रिचर्ड लवलस हैं। इनकी कला और अनुभूति में भी मूलत वही आदर्शवादी और व्यक्तिवाद से परांगमुखी स्वर है।

मेटाफ़िज़िकल कविता की प्रवृत्ति व्यक्तिगत अनुभव और अभिव्यक्ति के अन्वेषण की है। डन के शब्दों में यह फ़ नग्न चिंतनशील हृदयफ़ की कविता है। डॉ. जॉन्सन के शब्दों में इसकी विशेषताएँ परस्पर विरोधी विचारों और बिंबों का सायास संयोग और बौद्धिक सूक्ष्मता, मौलिकता, व्यक्तिकरण और दीक्षागम्य ज्ञान हैं। लेकिन आधुनिक युग ने उसका अधिक सहानुभूतिपूर्ण मूल्याँकन करते हुए उनकी इन विशेषताओं पर अधिक जोर दिया है- गंभीर चिंतन के साथ कटाक्ष और व्यंग्यपूर्ण कल्पना, विचार और अनुभूति की अन्विति, आंतरिक तनाव और संघर्ष, अलंकृत बिंबों के स्थान पर अनुभूति या विचारप्रसूत मार्मिक बिंबों की योजना और ललित अभिव्यक्ति के स्थान पर यथार्थवादी अभिव्यक्ति।

17वीं शताब्दी के कवियों में जॉन मिल्टन (1608-74) का व्यक्तित्व ऊँचे शिखर की तरह है। उसके लिए चिंतन और कर्म, कवि और नागरिक अभिन्न थे। पूर्ववर्ती पुनर्जागरण और परवर्ती 18वीं शताब्दी की राजनीतिक और दार्शनिक स्थिरता से वंचित, संक्रांति काल का कवि होते हुए भी मिल्टन ने मानव के प्रति असीम आस्था व्यक्त की। इस तरह की ईसाई मानवतावादियों में सबसे अंतिम और सबसे बड़ा कवि है। मध्ययुगीन अंकुशों के विरुद्ध नई मान्यताओं के लिए उसने कविता के अतिरिक्त केवल गद्य में लगातार बीस वर्षों तक संघर्ष किया और अपनी आँखें भी खो दीं।

मिल्टन के अनुसार कविता को सरल, सरस और आवेगपूर्ण होना चाहिए। अपनी प्रारंभिक रचनाओं- आन दि मार्निंग ऑव क्राइस्ट्स नेटिविटी, ल एलग्रो, पेन्सेरोसो, फ़ कोमसफ़ और फ़ लिसिडासफ़ में वह बेन जॉन्सन और मुख्य रूप के स्पेंसर से प्रभावित रहा, किंतु लंबे विराम के बाद लिखी हुई तीन अंतिम रचनाओं, फ़ पैराडाइज़ लॉस्टफ़ , फ़ पैराडाइज़ रीगेंडफ़ और सैम्सन एगनाइस्टीज़ में उसकी चिंतन शक्ति और काव्य प्रतिभा का उत्कर्ष है। अपनी महान्‌ कृति फ़ पैराडाइज़ लॉस्टफ़ में उसने अंग्रेजी कविता को होमर, वर्जिल और दांते का उदात्त स्वर दिया। उसमें उसने अंग्रेजी कविता में पहली बार महाकाव्य के लिए अतुकांत छंद का प्रयोग किया और भाषा, लय और उपमा को नई भंगिमा दी।

1660 ई. से लेकर शताब्दी के अंत तक की अवधि का सबसे बड़ा कवि जॉन ड्राइडन (1631-1700) है। यह अंग्रेजी कविता में प्रखर कल्पना और अनुभूति की जगह काव्य शास्त्रीय चेतना, तर्क और व्यवहार कुशल सामाजिकता के उदय का युग है। इस नए मोड़ के पीछे काम करने वाली शक्तियों में उस युग के राजनीतिक दलों के संघर्ष, फ्राँस के रंग में रँगे हुए चार्ल्स द्वितीय का दरबार, फ्राँस के नए रीतिकारों के आदर्श, कॉफी हाउसों और मनोरंजन गृहों का उदय और नागरिक जीवन का महत्व इत्यादि हैं। स्वभावत, इस युग की कविता का आदर्श सरल, स्पष्ट, संतुलित, सूक्तिप्रधान, फलयुक्त अभिव्यक्ति है। ड्राइडन की व्यंग्यपूर्ण कविताओं- फ़ ऐबसेलम ऐंड आर्कीटोफेलफ़ , फ़ मेडलफ़ और फ़ मैक्फ्लेक्नोफ़ में ये गुण प्रचुरता से हैं। नीति की कविता में वह अद्वितीय है। ड्राइडन में गीतिकाव्य की परंपरा के भी तत्व हैं। लेकिन कुल मिलाकर उसकी कविता बुद्धिवादी युग की पूर्वपीठिका ही है। ड्राइडन को छोड़कर यह युग छोटे कवियों का है जिनमें सबसे उल्लेखनीय, प्रसिद्ध और लोकप्रिय व्यंग्यकृति फ़ हुडिब्राजफ़ का कवि सैमुएल बटलर है।

18वीं शताब्दी तर्क या रीतिप्रधान युग

18वीं शताब्दी अपेक्षाकृत राजनीति और सामाजिक स्थिरता का काल है। इसमें इंग्लैंड के साम्राज्य, वैभव और आंतरिक सुव्यवस्था का विस्तार हुआ। इस युग के दार्शनिकों और वैज्ञानिकों के अनुसार यंत्र की तरह नियमित सृष्टि तर्क और गणितगम्य है और धर्म की डीइस्ट (प्रकृति देववादी) विचारधारा के अनुसार धर्म श्रुतिसंमत न होकर नैसर्गिक और बुद्धिगम्य है। साहित्य में यह तर्कवाद रीति के आग्रह के रूप में प्रकट हुआ। कवियों ने अपने ढंग से यूनान और रोम के कवियों का अनुकरण करना अनिवार्य समझा। इसका अर्थ था कविता में तर्क, नीर-क्षीर-विवेक और संतुलित बुद्धि की स्थापना। काव्य में शुद्धता को उन्होंने अपना मूल मंत्र बनाया। इस शुद्धता की अभिव्यक्ति विषय वस्तु में सार्वजनीनता (ह्वाट ऑफ्ट वाज़ थॉट बट नेवर सो बेल एक्सप्रेस्ड), भाषा में पदलालित्य, छंद में दशवर्णी द्विपदी में अत्यधिक संतुलन और यतियों में अनुशासन के रूप में हुई।

इस कविता का पौरोहित्य अलेक्जैंडर पोप (1688-1744) ने किया। उसके आदर्श रोम के जुवेनाल और होरेस, फ्राँस के ब्वालो (Boileau) और इंग्लैंड के ड्राइडन थे। काव्य सिद्धांतों पर लिखी हुई अपनी पद्यरचना एसे ऑन क्रिटिसिज़्म में उसने प्रतिभा और रुचि तथा इन दोनों को अनुशासित रखने की आवश्यकता बतलाई। उसकी अधिकांश कृतियाँ व्यंग्य और विद्रूप प्रधान हैं और उनमें सबसे प्रसिद्ध ¢ दि रेप ऑव दि लॉक¢ और ¢ डंसियड¢ हैं जिनमें उसने कृत्रिम उदात्त (मॉक हिरोइक) शैली का अनुसरण किया। उसके काव्यों की समता बरछी की नोंक से की जाती है। उसकी रचना ¢ एसे ऑन मैन¢ मानव जीवन के नियमों का अध्ययन है। इस पर उसके बुद्धिवादी युग की छाप स्पष्ट है।

उसके युग के अन्य व्यंग्यकारों में प्रायर, गे, स्विफ्ट और पारनेल हैं। इस बुद्धिवादी और व्यंग्यप्रधान युग में ही ऑलिवर गोल्डस्मिथ, लेडी विंचेल्सिया, जेम्स टाम्सन, टॉमस ग्रे, विलियम कॉलिंस, विलियम कूपर, एडवर्ड यंग आदि प्रसिद्ध कवि हुए जिनमें से अनेक ने स्पेंसर और मिल्टन की परंपरा को कायम रखा और प्रकृति, एकांत जीवन, भग्नावशेषों और समाधि स्थलों के संबंध में अवसाद और चिंतनपूर्ण अनुभूति के साथ लिखा। इन्हें १९वीं शताब्दी की रोमानी कविता का अग्रदूत कहा जाता है। रहस्यवादी कवि विलियम ब्लेक और किसान की कवि रॉबर्ट बर्न्स में भी प्रधान तत्व रोमानी प्रवृत्तियाँ और गीति हैं। इन दोनों का स्वर विद्रोद और मुक्ति का है।

रोमैंटिक युग

18वीं शताब्दी के कुछ कवियों में अनेक रोमानी तत्वों के अंकुरों के बावजूद रोमैंटिक युग का प्रारंभ 1798 में विलियम वर्ड्‌स्वर्थ (1770-1850) और सैमुएल टेलर कोलरिज (1772-1834) के संयुक्त संग्रह फ़ लिरिकल बैलड्सफ़ के प्रकाशन से माना जाता है। अंग्रेजी कविता के इस सबसे महान्‌ युग के साथ पर्सी बिशी शेली (1792-1822), जॉन कीट्स (1795-1821), जॉर्ज गॉर्डन बायरन (1788-1824), अलफ्रेड टेनिसन (1809-92), रॉबर्ट ब्राउनिंग (1812-89) और मैथ्यू आर्नल्ड (1822-88) के नाम भी जुड़े हुए हैं।

पूर्वार्ध

19वीं सदी के पूर्वार्ध की कविता उस युग की चेतना की उपज है और उस पर फ्राँसीसी दार्शनिक रूसो और फ्राँसीसी क्रांति का गहरा असर है। इसलिए इस कविता की विशेषताएँ मानव में आस्था, प्रकृति से प्रेम और सहज प्रेरणा के महत्व की स्वीकृति हैं। इस युग ने रीति के स्थान पर व्यक्तिगत प्रतिभा, विश्वजनीनता के स्थान पर व्यक्तिगत रुचि तथा अनुभव, तर्क और विकल्प के स्थान पर संकल्पात्मक कल्पना और स्वप्न, अभिव्यक्ति में स्पष्टता के स्थान पर लाक्षणिक वक्रता पर अधिक जोर दिया। इस युग की कविता में गीति का स्वर प्रधान है।

बर्ड्‌स्वर्थ प्रकृति का कवि है और इस क्षेत्र में वह बेजोड़ है। उसने बड़ी सफलता के साथ साधारण भाषा में साधारण जीवन के चित्र प्रस्तुत किए। प्रकृति के प्रति उसका सर्वात्मवादी दृष्टिकोण अंग्रेजी कविता के लिए नई चीज है। उसके साथी कोलरिज ने प्रकृति के असाधारण पक्षों का चित्र खींचा। वह चिंतन प्रधान, संशय और अवसाद से भरे मन के दिवास्वप्नों का कवि है। शेली मानव जीवन की व्यथा और उसके उज्ज्वल भविष्य का क्रांतिकारी स्वप्नद्रष्टा कवि है। वह अपने संगीत और सूक्ष्म किंतु प्रखर कल्पना के लिए प्रसिद्ध है। कीट्स इस युग का सबसे जागरूक कवि है। उसमें इंद्रियबोध की अद्भुत क्षमता है। इसलिए वह सौंदर्य का कवि माना जाता है और उसके भाव चित्रों के माध्यम से व्यक्त होते हैं। बायरन रोमानी कविता की अवसादपूर्ण और नाटकीय आत्मरति का कवि है। इस प्रवृत्ति से जुड़कर उसके आकर्षक विद्रोही व्यक्तित्व ने यूरोप के अनेक कवियों को प्रभावित किया। किंतु आज उसकी प्रसिद्धि १८वीं शताब्दी से प्रभावित उसके व्यंग्यकाव्य पर टिकी है।इस काल के अनेक उल्लेखनीय कवियों में रॉबर्ट सदी, टॉमस मूर, टॉमस कैंबेल, टॉमस हुड, सैबेज लैंडर, बेडोज़, ली हंट इत्यादि हैं।

विक्टोरिया युग

रोमैंटिक कविता का उत्तरार्ध विक्टोरिया के शासनकाल के अंतर्गत आता है। विक्टोरिया के युग में मध्यवर्गीय प्रभुत्व की असंगतियाँ उभरने लगी थीं और उसकी शोषण व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन भी होने लगे। वैज्ञानिक समाजवाद के उदय के अतिरिक्त यह काल डार्विन के विकासवाद का भी है जिसने धर्म की भीतें हिला दीं। इन विषमताओं से बचने के लिए ही मध्यवर्गीय उपयोगितावाद, उदारतावाद और समन्वयवाद का जन्म हुआ। समन्वयवादी टेनिसन इस युग का प्रतिनिधि कवि है। उसकी कविता में अतिरंजित कलावाद है। ब्राउनिंग ने आशावाद की शरण ली। अपनी कविता के अनगढ़पन में वह आज की कविता के समीप है। आर्नल्ड और क्लफ़ संशय और अनास्थाजन्य विषाद के कवि हैं।

इस तरह विक्टोरिया युग के कवियों में पूर्ववर्ती रोमैंटिक कवियों की क्रांतिकारी चेतना, अदम्य उत्साह और प्रखर कल्पना नहीं मिलती। इस युग में समय बीतने के साथ फ़ कला कला के लिएफ़ का सिद्धांत जोर पकड़ता गया और कवि अपने-अपने घोंसले बनाने लगे। कुछ ने मध्ययुग तथा कीट्स के इंद्रियबोध और अलस संगीत का आश्रय लिया। ऐसे कवियों का दल प्रीरेफ़ेलाइट नाम से पुकारा जाता है। उनमें प्रमुख कवि डी.जी. रोज़ेटी, स्विनबर्न, क्रिश्चियाना रॉज़ेटी और फिट्ज़ेराल्ड हैं। विलियम मारिस (1834-96) का नाम भी उन्हीं के साथ लिया जाता है, किंतु वास्तव में वह पृथ्वी पर स्वर्ग की कल्पना करने वाला इंग्लैंड का प्रथम साम्यवादी कवि है। धर्म की रहस्यवादी कल्पना में पलायन करने वालों में प्रमुख कावेंट्री पैटमोर, एलिस मेनेल और जेरॉर्ड मैनली हॉप्किंस (1844-89) हैं। हॉप्किंस अत्यंत प्रतिभाशाली कवि है और छंद में फ़ स्प्रंग रिद्मफ़ का जन्मदाता है। मेरेडिथ (1828-1909) प्रकृति का सूक्ष्मदर्शी कवि है। शताब्दी के अंतिम दशक में ्ह्रासशील प्रवृत्तियाँ पराकाष्ठा पर पहुँच गई। इनमें आत्मरति, आत्मपीड़न और सतही भावुकता है। ऐसे कवियों में डेविडसन, डाउसन, जेम्स टाम्सन, साइमंस, ऑस्टिन डॉब्सन, हेनली इत्यादि के नाम लिए जा सकते हैं। इसी प्रकार किपलिंग की अंध राष्ट्रवादिता और ऊँचे स्वरों के बावजूद १९वीं शताब्दी के अंतिम भाग की कविता व्यक्तिवाद के संकट की कविता है। 20वीं शताब्दी में वह संकट और भी गहरा होता गया।

20वीं शताब्दी

20वीं शताब्दी का प्रारंभ प्रश्नचिह्नों से हुआ, लेकिन उसकी प्रारंभिक कविता में, जिसे जॉर्जियन कविता कहते हैं, १९वीं शताब्दी के आदर्शों का ही प्रक्षेपण है। जॉर्जियन कविता में प्रकृतिप्रेम, अनुभवों की सामान्यतया और अभिव्यक्ति में स्वच्छता और कोमलता पर अधिक जोर है। इसीलिए उस पर अंतरहीनता का आक्षेप किया जाता है। इस शैली के महत्वपूर्ण कवियों में रॉबर्ट ब्रिजेज़ (1844-1940), मेसफील्ट (1878) वाल्टर डी ला मेयर, डेवीज़, डी.एच. लारेंस, लारेंस बिन्यन, हॉजसन, रॉबर्ट वेन, रुपर्ट ब्रुक, सैसून, एडमंड ब्लंडन, रॉबर्ट ग्रेव्स, अबरक्रूबी इत्यादि उल्लेखनीय हैं। निश्चय ही,इनमें से अनेक में विशिष्ट प्रतिभा है,सभी उथले भावों के कवि नहीं हैं।

इस शताब्दी के कवियों में येट्स (1865-1939), हार्डी (1840-1928) और हाउसमन (1851-1936) का स्थान बहुत ऊँचा है। येट्स में रहस्य-भावना, प्रतीक योजना और संगीत की प्रधानता है। हार्डी में स्वरों की रुक्षता और नियति की दारुण चेतना उसे जॉर्जियन युग से अलग करती है। हाउसमन हार्डी की कोटि का कवि नहीं, उससे मिलता-जुलता कवि है। वह अपनी रचना फ़ ए श्रॉपशायर लैडफ़ के लिए प्रसिद्ध है।

आधुनिकता के रंग में रँगी कविता का प्रारंभ 1993 में इमेजिस्ट (बिंबवादा) आंदोलन से प्रारंभ होता है। इसके पूर्व भी इस तरह की कविताएँ लिखी गई थीं, किंतु 1983 में एफ.एस. फ्लिंट और एज़रा पाउंड (1885) ने उसके सिद्धांतों की स्थापना की। इनके अनुसार कविता का लक्ष्य था फ़ वस्तुफ़ को कविता में सीधे उतारना, अभिव्यक्ति में अधिक से अधिक संक्षिप्ति और संगीत अनुशासित वाक्य रचना। पाउंड के अनुसार ळ् बिंब वह है जो बौद्धिक और भावात्मक संश्लिष्टता को उसकी क्षणिकता में प्रस्तुत करता है।ळ् बिंबवादी कविता कठोर और पारदर्शी अभिव्यक्ति पसंद करती है। इसी के साथ मुक्त छंद की लोकप्रियता भी बढ़ी। इसी शैली के कवियों में सबसे प्रसिद्ध एज़रा पाउंड और फ़ एडिथ सिटबेलफ़ (1887-1964) हैं।

प्रथम युद्ध के बाद टी.एस. इलियट (1888-1965) की प्रसिद्धि रचना फ़ वेस्ट लैंडफ़ ने आधुनिक अंग्रेजी कविता पर गहरा असर डाला। इस रचना में पूँजीवादी सभ्यता की ऊसर भूमि में पथहीन और प्यासे व्यक्ति का चित्र है। इसमें कवि ने रोमानी परंपरा को छोड़कर डन कवि का अनुगमन शुरू किया। इसमें फ्रेंच प्रतीकवादियों का प्रभाव भी स्पष्ट है। 1928 के बाद इलियट के काव्य में धार्मिक भावना का प्रवेश होता है तो फ़ ऐस वेड्नेस्डेफ़ से होता हुआ फोर क्वार्टेट्स के रहस्यवादी काव्यपुंजों में पराकाष्ठा पर पहुँचता है। इस अंतर्मुखी क्षेत्र से अंग्रेजी कविता को निकालने का प्रयास 1930 के बाद मार्क्सवाद से प्रभावित आंडेन (1907), लिविस, स्पेंडर, सीसल डे और मेकनीस ने किया। परंतु कालांतर में उनकी काव्यधारा भी अंतर्मुखी हो गई।

आंडेन के बाद सबसे महत्वपूर्ण कवि डीलन टामस (1914-53) है जो अत्यंत नवीन होते हुए भी अत्यंत मानवीय है। उसमें यौन प्रतीको, धार्मिकता तथा जीवन और मृृत्यु संबंधी चिंतन का विचित्र योग है। उसकी कविता गीति और बिंब प्रधान है और बहुत अंशों में उसने अंग्रेजी कविता को रोमानी परंपरा का भी निर्वाह किया है।

20वीं शताब्दी के अन्य उल्लेखनीय कवियों में हर्बर्ट रीड, जॉर्ज बार्कर, एडविन म्योर, केज़, अलन लिविस, कोथ डगलस, लॉरेंस ड्यूरेल, रॉय फुलर, डेविड गैसक्वॉयन, राइडलर, रोज़र्स, बर्नर्ड स्पेंसर, टेरेस टिलर, डॉ. जे. एनराइट, टॉम गन, किंग्सले आसिम, जॉन वेन और अलबैरीज़ हैं।

आधुनिक युग को पश्चिम के बुद्धिजीवी चिंता और भय का युग कहते हैं। इसमें संदेह नहीं कि भाषा, बिंब और छंद में इस युग ने अनेक प्रयोग किए हैं, किंतु ऐसा जान पड़ता है कि अधिकांश कवियों में जीवन और उसके यथार्थ को समझने की क्षमता नहीं है।

द्वितीय महायुद्ध के पश्चात्‌ अंग्रेजी कविता में परिवर्तन हुआ है। आज के नए कवि पूर्ववर्ती कवियों को पांडित्यपूर्ण एवं जटिल शैली को छोड़कर काव्य में परंपरागत सरलता एवं छंदबद्ध शिल्प का समावेश करके दैनिक जीवन संबंधी काव्य का निर्माण कर रहे हैं। वे प्रयोगवादी कविता के विरुद्ध हैं।

नाटक

उदय-यूनान की तरह इंग्लैंड में भी नाटक धार्मिक कर्मकांडों से अंकुरित हुआ। मध्ययुग में चर्च (धर्म) की भाषा लातीनी थी और पादरियों के उपदेश भी इसी भाषा में होते थे। इस भाषा से अनभिज्ञ साधारण लोगों को बाइबिल और ईसा के जीवन की कथाएँ उपदेशों के साथ अभिनय का भी उपयोग कर समझाने में सुविधा होती थी। बड़े दिन और ईस्टर के पर्वों पर ऐसे अभिनयों का विशेष महत्व था। इससे धर्मशिक्षा के साथ मनोरंजन भी होता था। पहले ये अभिनय मूक हुआ करते थे, लेकिन नवीं शताब्दी में लातीनी भाषा में कथोपकथन होने के भी प्रमाण मिलते हैं। कालांतर में बीच-बीच में लोकभाषा का भी प्रयोग किया जाने लगा। अंग्रेजी भाषा 1350 में राजभाषा के रूप में स्वीकृत हुई। इसलिए आगे चलकर केवल लोकभाषा ही प्रयुक्त होने लगी। इस प्रकार आरंभ से ही नाटक का संबंध जनजीवन से था और समय के साथ वह और भी गहरा होता गया। ये सारे अभिनय गिरजाघरों के भीतर ही होते थे और उनमें उनसे संबद्ध साधु, पादरी और गायक ही भाग से सकते थे। नाटक के विकास के लिए जरूरी था कि उसे कुछ खुली हवा मिले। परिस्थितियों ने इसमें उसकी सहायता की।

14वीं शताब्दी से १६वीं शताब्दी तक

मिस्ट्री और मिरैकिल नाटकफ़ विशेष मनोरंजक होने के कारण इन अभिनयों को देखने के लिए लोग गिरजाघरों के भीतर उमड़ने लगे। विवश होकर चर्च के अधिकारियों ने इनका प्रबंध गिरजाघरों के मैदानों में किया। लेकिन सड़कों पर या बाजार में इन अभिनयों के लिए अनुमति न थी। प्रार्थना भवन से बाहर आते ही अभिनयों का रूप बदलने लगा और उनमें स्वच्छंदता की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। इस स्वच्छंदता ने गिरजाघर के भीतर के अभिनयों को भी प्रभावित करना आरंभ किया। इसलिए ईसा के संदेह स्वर्गारोहण के दृश्य के अतिरिक्त प्रार्थना भवन में और अभिनय नियम बनाकर रोक दिए गए। बाजारों में और सड़कों पर ऐसे अभिनय करना फ़ पापफ़ घोषित कर दिया गया। पादरियों और चर्च के अन्य सेवकों पर लगे इस नियंत्रण ने अभिनय को गिरजाघरों की चहारदीवारियों से बाहर ला खड़ा किया। नगरों की श्रेणियों (गिल्ड्स) ने इस काम को अपने हाथ में लिया। यहीं से मिस्ट्री और मिरैकिल नाटकों का उदय और विकास हुआ।

मिस्ट्री नाटकों में बाइबिल की कथाओं से विषय चुने जाते थे और मिरैकिल नाटकों में संतों कीे जीवनियाँ होती थीं। फ्रांस में यह भेद स्पष्ट था, लेकिन इंग्लैंड में दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं था। १४वीं शताब्दी के प्रारंभ में नाटक मंडलियाँ अपना सामान बैलगाड़ियों पर लादकर अभिनय दिखाने के लिए देश भर में भ्रमण करने लगीं। स्पष्ट है कि ऐसे अभिनयों में दृश्यों का प्रबंध नहीं के बराबर होता था। लेकिन वेशभूषा का काफी ध्यान रखा जाता था। अभिनेता प्राय अस्थायी होते थे और कुछ समय के लिए अपने स्थायी काम-धंधों से छुट्टी लेकर इन नाटकों में अभिनय करके पुण्य और पैसा दोनों ही कमाते थे। धीरे-धीरे जनरुचि को ध्यान में रखकर गंभीरता के बीच प्रहसन खंड भी अभिनीत होने लगे। यही नहीं, हजरत नूह की पत्नी, शैतान और क्रूर हेरोद के चरित्रों को हास्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाने लगा। विभिन्न नगरों की नाटक मंडलियों ने अपनी-अपनी विशिष्टताएँ भी विकसित कीं- धार्मिक शिक्षा, प्रहसन, तीव्र अनुभूति और यथार्थवाद विभिन्न अनुपातों में मिश्रित किए जाने लगे। इसमें संदेह नहीं कि इन नाटकों में विषय और रूपगत अनेक दोष थे, लेकिन अंग्रेजी नाटक के भावी विकास की नींव इन्होंने ही रखी।

मोरैलिटी नाटक

इस विकास का अगला कदम था मिस्ट्री और मिरैकिल नाटकों के स्थान पर मोरैलिटी (नैतिक) नाटकों का उदय। ये नाटक सदाचार शिक्षा के लिए लिखे जाते थे। इन नाटकों पर मध्ययुगीन साहित्य के भाववाद और प्रतीक या रूपक की शैली का स्पष्ट प्रभाव है। इनमें उपदेश के अतिरिक्त पात्रों के नाम तक गुणों या दुर्गुणों से लिए जाते थे, जैसे सिन (पाप), ग्रेस (प्रभुदया), फेलोशिप (सौहार्द), एन्वी (ईर्षा), आइडिलनेस (प्रमाद), रिपेटेंस (पश्चाताप) इत्यादि। इन नाटकों की केंद्रीय कथावस्तु थी मानव (एव्रामैन) का पापों द्वारा पीछा तथा आत्मा और ज्ञान द्वारा उसका उद्धार। इस प्रकार इन नाटकों ने मनुष्य के आंतरिक संघर्षों के चित्रण की महत्वपूर्ण परंपरा को जन्म दिया। ऐसे नाटकों में सबसे प्रसिद्ध फ़ ए्व्राीमैनफ़ है जिसकी रचना 15वीं शताब्दी के अंत में हुई।

मोरैलिटी नाटक पहले वाले नाटकों से ज्यादा लंबे होते थे और पुनर्जागरण के प्राभाव के कारण उनमें से कुछ का विभाजन सेनेका के नाटकों के अनुकरण पर अंकों और दृश्यों में भी होता था। कुछ नाटक सामंतों की हवेलियों में खेले जाने के लिए भी लिखे जाते थे। इनमें से अधिकांश का अभिनय पेशेवर अभिनेताओं द्वारा होने लगा। इनमें व्यक्तिगत रचना के लक्षण भी दिखाई पड़ने लगे।

इंटरल्यूड

प्रारंभ में मोरैलिटी और इंटरल्यूड नाटकों की विभाजक रेखा बहुत धुँधली थी। बहुत से मोरैलिटी नाटकों को इंटरल्यूड शीर्षक से प्रकाशित किया जाता था। कोरे उपदेश से पैदा हुई ऊब को दूर करने के लिए मोरैलिटी नाटकों में प्रहसन के तत्वों का भी समावेश कर दिया जाता था। ऐसे ही खंडों को इंटरल्यूड कहते थे। बाद में यो मोरैलिटी नाटकों से स्वतंत्र हो गए। ऐसे नाटकों में सबसे प्रसिद्ध हेवुड का फ़ फ़ोर पीज़फ़ है। इन नाटकों में आधुनिक भांड (फार्स) और प्रहसन के तत्व थे। इनमें से कुछ ने बेन जॉन्सन की यथार्थवादी कॉमेडी के लिए भी जमीन पर तैयार की। प्रसिद्ध मानवतावादी चिंतक सर टॉमस मोर ने भी ऐसे नाटक लिखे।

इसी युग में आगे आने वाली प्रहसन और प्रेमयुक्त दरबारी रोमैंटिक कॉमेडी के तत्व मेडवाल की कृतियों फ़ फुल्जेंस ऐंड लूक्रीसफ़ और फ़ कैलिस्टो ऐंड मेलेबियाफ़ में और रोमानी प्रवृत्तियों से सर्वथा मुक्त कॉमेडी के तत्व यूडाल की रचना फ़ राल्फ़ र्‌वायस्टर डवायस्टरफ़ और मिस्टर एस की रचना फ़ गामर गर्टस नीडिलफ़ में प्रकट हुए। ऐतिहासिक नाटकों का भी प्रणयन तभी हुआ।

16वीं शताब्दी के मध्य तक आते आते पुनर्जागरण के मानवतावाद ने अंग्रेजी नाटक को स्पष्ट रूप से प्रभावित करना शुरू किया। १५८१तक सेनेका अंग्रेजी में अनूदित हो गया। सैकविल और नॉर्टन कृत अंग्रेजी की पहली ट्रैजडी फ़ गॉरबोडकफ़ का अभिनय एलिज़ाबेथ के सामने १५६२ में हुआ। कामेडी पर प्लाटस और टेरेंस का सबसे गहरा असर पड़ा। लातीनी भाषा के इन नाटककारों के अध्ययन से अंग्रेजी नाटकों के रचनाविधान में पाँच अंकों, घटनाओं की इकाई और चरित्रचित्रण में संगतिपूर्ण विकास का प्रयोग हुआ।

इस विकास की दो दिशाएँ स्पष्ट हैं। एक ओर कुछ नाटककार देशज परंपरा के आधार पर ऐसे नाटकों की रचना कर रहे थे जिनमें नैतिकता, हास्य, रोमांस इत्यादि के विविध तत्व मिले-जुले होते थे। दूसरी ओर लातीनी नाट््यशास्त्र के प्रभाव में विद्वद्वर्ग के नाटककार कॉमेडी और ट्रैजेडी में शुद्धतावाद की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे। अंग्रेजी नाटक के स्वर्णयुग के पहले ही अनेक नाटककारों ने इन दोनों तत्वों को मिला दिया और उन्हीं के समन्वय से शेक्सपियर और उसके अनेक समकालीनों के महान्‌ नाटकों की रचना हुई।

इस स्वर्णयुग की यवनिका उठने के पहले की तैयारी में एक बात की कमी थी। वह 1576 में शोरडिच में प्रथम सार्वजनिक (पब्लिक) रंगशाला की स्थापना से पूरी हुई। उस युग की प्रसिद्ध रंगशालाओं में थिएटर, रोज़, ग्लोब, फार्चुन और स्वॉन हैं। सार्वजनिक रंगशालाएँ लंदन नगर के बाहर ही बनाई जा सकती थीं। 16वीं शताब्दी के अंत तक केवल एक रंगशाला ब्लैकफ्रायर्स में स्थित थी और वह व्यक्तिगत (प्राइवेट) कहलाती थी। सार्वजनिक रंगशालाओं में नाटकों का अभिनय खुले आसमान के नीचे, दिन में, भिन्न-भिन्न वर्गों के सामाजिकों द्वारा घिरे हुए प्राय: नग्न रंगमंच पर होता था। एलिज़ाबेथ और स्टुअर्ट युग के नाटकों में वर्णनात्मक अंशों, कविता के आधिक्य, स्वगत, कभी-कभी फूहड़ मजाक या भँड़ैती, रक्तपात, समसामयिक पुट, यथार्थवाद इत्यादि तत्वों को समझने के लिए इन रंगशालाओं की रचना और उनके सामाजिकों का ध्यान रखना आवश्यक है। व्यक्तिगत रंगशालाओं में रंगमंच कक्ष के भीतर होता था जहाँ प्रकाश, दृश्य आदि का अच्छा प्रबंध रहता था और उसके सामाजिक अभिजात होते थे। इन्होंने भी 17वीं शताब्दी में अँग्रेजी नाटक के रूप को प्रभावित किया। इन रंगशालाओं ने नाटकों के लिए केवल व्यापक रुचि ही नहीं पैदा की बल्कि नाटकों की कथावस्तु और रचना विधान को भी प्रभावित किया, क्योंकि इस युग के नाटककारों का रंगमंच से जीवित संबंध था और वे उसकी संभावनाओं और सीमाओं को दृष्टि में रखकर ही नाटक लिखते थे।

एलिज़ाबेथ और जेम्स प्रथम का युग

एलिज़ाबेथ का युग अंग्रेजों के इतिहास में राष्ट्रीय एकता, अदम्य उत्साह, मानवतावादी जागरूकता के उत्कर्ष और महान प्रयत्नों का था। इसका प्रभाव साहित्य की अन्य विधाओं की तरह नाटक पर भी पड़ा। शेक्सपियर संसार को उस युग की सबसे बड़ी साहित्यिक देन है, लेकिन उसके अतिरिक्त यह अनेक बड़ी प्रतिभाओं का कृतित्वकाल है। उस महान्‌ युग की भूमिका तैयार करने में विश्वविद्यालयों में शिक्षित होने और लेखन को व्यवसाय बनाने के कारण फ़ यूनिवर्सिटी विट्सफ़ कहलाने वाले रॉबर्ट ग्रीन (1558-92), जॉन लिली (1542-1606), टॉमस किड (1558-94) और टॉमस मार्लो (1564-1593) का विशेषत: बहुत बड़ा हाथ है। ग्रीन और लिली ने गीतिमय प्रेम और उदार प्रहसन, किड ने प्रतिहिंसात्मक ट्रैजेडी और मार्लो ने महत्वाकांक्षा और नैतिकता के संघर्ष से पैदा हुई विषमता की ट्रैजेडी को जन्म दिया। लातीनी और देशज परंपराओं के मिश्रण से उन्होंने नाटक को कलात्मकता दी। जॉर्ज पील (1557-1596) और ग्रीन ने नाटकीय अतुकांत कविता का विकास किया और मार्लो ने उनसे आगे बढ़कर उसे उच्चकंठ और वेगवान बनाया। मार्लो के नाटकों में कथासूत्र शिथिल है लेकिन वह भयंकर अंतर्द्वंद्वों की गीतिमय अकृत्रिम अभिव्यक्ति और भव्य चित्र योजना में शेक्सपियर का योग्य गुरु है। मार्लो कृत फ़ टैंबरलेनफ़ , फ़ डाक्टर फास्टस्‌फ़ और फ़ दि ज्यू ऑव माल्टाफ़ के नायक अपने अबाध व्यक्तिवाद के कारण आध्यात्मिक मूल्यों से टकराते और टूट जाते हैं। इस प्रकार व्यक्ति और समाज के बीच संघर्ष को चित्रित कर मार्लो पहले पहल पुनर्जागरण की वह केंद्रीय समस्या प्रस्तुत करता है जो शेक्सपियर और अन्य नाटककारों को भी आंदोलित करती रही। मार्लो ने अंग्रेजी नाटक को स्वर्णयुग के द्वार पर खड़ा कर दिया।

विलियम शेक्सपियर

विलियम शेक्सपियर (1564-1616) का प्रारंभिक विकास इन्हीं परंपराओं की सीमाओं में हुआ। उसके प्रारंभिक नाटकों में कला में सिद्धहस्तता प्राप्त करने का प्रयत्न है। इस प्रारंभिक प्रयत्न के माध्यम से उसने अपने नाटककार के व्यक्तित्व को पुष्ट किया। कथानक, चरित्र-चित्रण, भाषा, छंद, चित्र योजना और जीवन की पकड़ में उसका विकास उस युग के अन्य नाटककारों की अपेक्षा अधिक श्रमसाध्य था, लेकिन १६वीं शताब्दी के अंतिम और १७वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में उसकी प्रतिभा का असाधारण उत्कर्ष हुआ। इस काल के नाटकों में पुनर्जागरण की सारी सांस्कृतिक और रचनात्मक क्षमता प्रतिबिंबित हो उठी। इस तरह शेक्सपियर ने हाल और हॉलिनशेड के इतिहास ग्रंन्थों से इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के राजाओं की ओर प्लुतार्क से रोम के शासकों की कथाएँ लीं, लेकिन उनमें उसने मानवतावादी युग का बोध भर दिया। प्रारंभिक सुखांत नाटकों में उसने लिली और ग्रीन का अनुकरण किया, लेकिन ¢ ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम¢ (1596) और उसके बाद की चार ऐसी ही रचनाओं ¢ दि मरचेंट ऑव वेनिस¢ , ¢ मच ऐडो अबाउट नथिंग¢ , ¢ ट्वेल्फ्थ नाइट¢ और ¢ ऐज यू लाइक इट¢ में उसने अंग्रेजी साहित्य में रोमैंटिक कॉमेडी को नया रूप दिया। इनका वातावरण दरबारी कॉमेडी से भिन्न है। वहाँ एक ऐसा लोक है जहाँ स्वप्न और यथार्थ का भेद मिट जाता है और जहाँ हास्य की बौद्धिकता भी हृदय की उदारता से आर्द्र है। ¢ मेज़र फॉर मेज़र¢ और ¢ आल्ज़ वेल दैट एंड्स वेल¢ में, जो उसके अंतिम सुखांत नाटक हैं, वातावरण घने बादलों के बीच छिपते और उनसे निकलते हुए सूरज का सा है। दुखांत नाटकों में प्रारंभिक काल की रचना ¢ रोमियो ऐंड जूलिएट¢ में नायक-नायिका की मृत्यु के बावजूद पराजय का स्वर नहीं है। लेकिन १६वीं शताब्दी के बाद लिखे गए ¢ हैमलेट¢ , ¢ लियर¢ , ¢ आथेलो¢ , ¢ मैकवेथ¢ , ¢ ऐंटनी ऐंड क्लियोपेट्रा¢ और ¢ कोरियोलेनस¢ में उस युग के षड्यंत्रपूर्ण दूषित वातावरण में मानवतावाद की पराजय का चित्र है। लेकिन उसके बीच भी शेक्सपियर की अप्रतिहत आस्था का स्वर उठता है। अंत में अनुभूतियों से मुक्ति पाने के लिए उसने ¢ पेरिक्लीज़¢ , ¢ सिंबेलीन¢ , ¢ दी विंटर्स टेल¢ और ¢ टेंपेस्ट¢ लिखे जिनमें प्रारंभिक दुर्घटनाओं के बावजूद अंत सुखद होते हैं। जीवन के विशद ज्ञान और काव्य एवं नाट्य सौंदर्य में शेक्सपियर संसार की इनी-गिनी प्रतिभाओं में है।

बेन जॉन्सन

बेन जॉन्सन (1572-1637) अंग्रेजी नाटक में ¢ विकृत¢ प्रहसन (कामेडी ऑव ह्यूमर्स) का जन्मदाता है। उसके दीक्षा गुरु प्लाटस और होरेस थे, इसलिए वह आचार्य नाटककार है और उसने शेक्सपियर इत्यादि की रोमैंटिक कॉमेडी में विरोधी तत्वों के समन्वय का विरोध किया। उसकी ¢ विकृति¢ का अर्थ था किसी चरित्र के दोषविशेष को अतिरंजित रूप में चित्रित करना। उसकी प्राथमिक रचनाओं ¢ एब्रीमैन इन हिज़ ह्यूमर¢ और ¢ एब्रीमैन आउट ऑव हिज़ ह्यूमर¢ में इसी तरह का प्रहसन है। जॉन्सन के अनुसार कॉमेडी का कर्तव्य अपने युग का चित्र प्रस्तुत करना और मानव चरित्र की मूर्खताओं से ¢ क्रीड़ा¢ करना था। इस तरह उसने विद्रूपपूर्ण यथार्थवादी प्रहसन नाटक को भी जन्म दिया जिसमें उसकी प्रसिद्ध रचनाएँ ¢ वॉल्पोन¢ और ¢ आलकेमिस्ट¢ हैं। जॉन्सन का प्रहसन गुदगुदाता नहीं, डंक मारता है।

जेम्स प्रथम के शासनकाल में समाज में बढ़ती हुई अस्थिरता और निराशा तथा दरबार में बढ़ती हुई कृत्रिमता ने नाटक को प्रभावित किया। शेक्सपियर के परवर्ती वेब्स्टर, टर्नर, मिडिलटन, मास्टर्न चैपमैन, मैसिंजर और फोर्ड के दुखांत नाटकों में व्यक्तिवाद अस्वाभाविक महत्वाकांक्षाओं, भयंकर रक्तपात और क्रूरता, आत्मपीड़ा और निराशा में प्रकट हुआ। वेब्स्टर के शब्दों में, इनका केंद्रीय दर्शन ¢ फूल के पौधों के मूल में नरमुंड¢ की अनिवार्यता है।

कॉमेडी में मिडिलटन (1580-1627) और मैंसिंजर (1583-1639) जॉन्सन की परंपरा में थे, लेकिन उनमें स्थूल प्रहसन और अश्लीलता की भी वृद्धि हुई। जॉन पलेचर (1579-1625) और फ्रांसिस बोमांट (1584 । 5-1616) में कॉमेडी का पतन स्वस्थ रोमांस या प्रहसन की जगह दुखपूर्ण घटनाओं, नायक-नायिकाओं के काल्पनिक जीवन, अत्यधिक अलंकृत और रूढ़िप्रिय भाषा तथा अस्वाभाविक घटनाओं के रूप में दीख पड़ा। दरबार की प्रेरणा से ही इसी युग में मास्क (Masque) का भी जन्म हुआ जिसमें भव्य दृश्यों और साजसज्जा तथा संगीत की प्रधानता थी। इसी समय भावी विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण पारिवारिक समस्यामूलक दुखांत नाटकों में सबसे प्रसिद्ध ¢ आर्डेन ऑव फीवरशैम¢ (1592) है, जो लिखा पहले गया था पर प्रकाशित पीछे हुआ।

इस तरह दरबार के प्रभाव में नाटक जनता से दूर हो रहा था। वास्तव में बोमांट और फ्लेचर की ट्रैजी-कॉमेडी का अभिनय ¢ प्राइवेट¢ रंगशालाओं में मुख्यत अभिजातवर्गीय सामाजिकों के सामने होता था। अगर नाटक का जनता से जीवित संबंध था तो जॉन्सन की शिष्य परंपरा के नाटकों के द्वारा या शेक्सपियर के परवर्ती दुखांत नाटकों के द्वारा, जिनका अभिनय ¢ पब्लिक¢ रंगशालाओं में होता था।

अंग्रेजी नाटक के विकास की श्रृंखला सहसा १६४२ में टूट गई जब कामनवेल्थ युग में प्यूरिटन संप्रदाय के दबाव से सारी रंगशालाएँ बंद की दी गईं। उसका पुनर्जन्म १६६० में चार्ल्स द्वितीय के पुनर्राज्यारोहण के साथ हुआ।

पुनर्राज्यारोहण काल

फ्रांस में लुई चतुर्दश के दरबार में शरणार्थी की तरह रह चुके चार्ल्स द्वितीय के लिए संस्कृति का आदर्श फ्रांस का दरबार था। उसके साथ यह आदर्श भी इंग्लैंड आया। फ्रेंच रीतिकार और नाटककार अंग्रेजी नाटककारों के आदर्श बने। चार्ल्स के लौटने पर ड्रूरी लेन और डॉर्सेट गार्डेन की रंगशालाओं की स्थापना हुई। रंगशालाओं पर स्वयं चार्ल्स और ड्यूक ऑव यॉर्क का नियंत्रण था। इन रंगशालाओं के सामाजिक मुख्यत दरबारी, उनकी प्रेमिकाएँ, छैल-छबीले और कुछ आवारागर्द होते थे। अब नाटक बहुसंख्यकों की जगह अल्पसंख्यकों का था; इसलिए इस युग में दो तरह के नाटकों का उदय और विकास हुआ- एक, ऐसे नाटक जिनकी ¢ हिरोइक¢ दुखांत कथावस्तु दरबारियों की रुचि के अनुकूल ¢ प्रेम¢ और ¢ आत्मसम्मान¢ थी; दूसरे, ऐसे प्रहसन जिनमें चरित्रहीन किंतु कुशाग्रबुद्धि व्यक्तियों के सामाजिक व्यवहारों का चित्रण होता था (कॉमेडी ऑव मैनर्स)। रंगशालाओं में दृश्यों, प्रकाश इत्यादि के प्रबंध के कारण कानों से ज्यादा आँखों के माध्यम से काम लिया जाने लगा, जिससे एलिज़ाबेथ युग के नाटकों की शुद्ध कविता की अनिवार्यता जाती रही। स्त्रियों ने भी रंगमंच पर आना शुरू किया जिसकी वजह से कथानकों में कई-कई स्त्री पात्रों को रखना संभव हुआ।

हिरोइक

हिरोइक ट्रैजेडी का नेतृत्व ड्राइडन (1631-1700) ने किया। ऐसे नाटकों की विशेषताएँ थीं-- असाधारण क्षमता और आदर्श वाले नायक प्रेम में असाधारण रूप से दृढ़ और अत्यंत सुंदर नायिका, प्रेम और आत्मसम्मान के बीच आंतरिक संघर्ष, शौर्य, तुकांत कविता, ऊहात्मक भाव एवं अभिव्यक्ति तथा तीव्र और सूक्ष्म अनुभूति की कमी। ड्राइडन का अनुकरण औरों ने भी किया, लेकिन उनको नगण्य सफलता मिली।

इस काल में अतुकांत छंदों में भी दुखांत नाटक लिखे गए और उनमें हिरोइक ट्रैजेडी की अपेक्षा नाटककारों को अधिक सफलता मिली। ये भी आम तौर पर प्रेम के विषय में थे। लेकिन इनकी दुनिया एलिज़ाबेथ युग के नाटकों के भीषण अंतर्द्वंद्वों से भिन्न थी। यहाँ भी प्रधानता ऊहात्मक भावुकता की ही थी। ड्राइडन के अतिरिक्त ऐसे नाटककारों में केवल टॉमस ऑटवे ही उल्लेखनीय है।

इस युग ने नाटक के रूप को एक नई देन ¢ ऑपेरा¢ के रूप में दी, जिसमें कथोपकथन के अतिरिक्त संगीत भी रहता था।

कॉमेडी ऑव मैनर्स

कॉमेडी ऑव मैनर्स के विकास ने अंग्रेजी प्रहसन नाटक का पुनरुद्धार किया। इसके प्रसिद्ध लेखकों में विलियम विकर्ली (1640-1716), विलियम कांग्रीव (1670-1729), जॉर्ज इथरेज (1634-1690), जॉन व्हॉनब्रुग (1666-1746) और जॉर्ज फर्कुहार (1678-1707) हैं। इन्होंने जॉन्सन के यथार्थवादी ढंग से चार्ल्स द्वितीय के दरबारियों जैसे आमोदप्रिय, प्रमद, प्रेम के लिए अनेक दुरभिसंधियों के रचयिता, नैतिकता और सदाचार के प्रति उदासीन और साफ-सुथरी किंतु पैनी बोली वाले व्यक्तियों का नग्न चित्र तटस्थता के साथ खींचा। उपदेश या समाज सुधार उनका लक्ष्य नहीं था। इसके कारण इन लेखकों पर अश्लीलता का आरोप भी किया जाता है। इन नाटकों में जॉन्सन के चरित्रों की मानसिक विविधता के स्थान पर घटनाओं की विविधता है। इन्होंने जॉन्सन की तरह चरित्रों को अतिरंजन की शैली से एक-एक दुर्गुण का प्रतीक न बनाकर उन्हें उनके सामाजिक परिवेश में देखा। उनका सबसे बड़ा काम यह था कि उन्होंने अंग्रेजी कॉमेडी को बोमांट और फ्लेचर की कृत्रिम रोमानी भावुकता से मुक्त कर उसे सच्चे अर्थों में प्रहसन बनाया। साथ ही जॉन्सन की परंपरा भी शैडवेल और हॉवर्ड ने कायम रखी।

18वीं शताब्दी

यह शताब्दी गैरिक और श्रीमती सिडंस जैसे अभिनेता और अभिनेत्री की शताब्दी थी, लेकिन नाटक रचना की दृष्टि से इस युग में केवल दो बड़े नाटककार हुए: रिचर्ड ब्रिंसले शेरिडन (1751-1816) और ऑलिवर गोल्डस्मिथ (1728-74)। इस शताब्दी की मध्यवर्गीय नैतिकता ने इस युग में भावुक (सेंटिमेंटल) कॉमेडी को जन्म दिया, जिसमें प्रहसन से अधिक जोर सदाचार पर था। पारिवारिक सुख, आदर्श प्रेम और हृदय की पवित्रता की स्थापना के लिए अक्सर मध्यवर्गीय चरित्रों को ही चुना जाता था। ऐसे नाटककारों में सबसे प्रसिद्ध सिबर, स्टील, केली, और कंबरलैंड हैं। शेरिडन और गोल्डस्मिथ ने ऐसे अश्रुसिंचित सुखांत नाटकों के स्थान पर शुद्ध प्रहसन को अपना लक्ष्य बनाया। इन्होंने रोमानी तत्वों के स्थान पर ज़ॉन्सन और कांग्रीव के यथार्थवाद, व्यंग्य, चुभती हुई भाषा और चरित्र-चित्रण में अतिरंजन का अनुसरण किया। गोल्डस्मिथकृत ¢ शी स्टूप्स टु कांकर¢ और शेरिडन कृत ¢ दि स्कूल फॉर स्कैंडल¢ अंग्रेजी प्रहसन नाट्य की सर्वोत्तम कृतियों में गिने जाते हैं।

इस शताब्दी में कई लेखकों ने दुखांत नाटक लिखे, लेकिन उनमें एडिसन का ¢ कैटो¢ ही उल्लेखनीय है। पैंटोमाइम, जो एक तरह से शुद्ध भँड़ैती था, और बैलड-ऑपेरा (गीति नाट्य) भी इस युग में काफी लोकप्रिय थे। गे का गीतिनाट्य ¢ दि बेगर्स¢ ऑपेरा तो यूरोप के कई देशों में अभिनीत हुआ। एडवर्ड मूर का पारिवारिक समस्यामूलक नाटक ¢ गेम्सटर¢ ऐसे नाटकों में सबसे अच्छा है।

19वीं शताब्दी

रोमैंटिक युग का पूर्वार्ध नाटक की दृष्टि से प्राय शून्य है। सदी, कोलरिज, बर्ड्‌स्वर्थ, शेली, कीट्स, बायरन, लैंडर और ब्राउनिंग ने नाटक लिखे, लेकिन अधिकतर वे केवल पढ़ने लायक हैं। शताब्दी के उत्तरार्ध में इब्सन के प्रभाव से अंग्रेजी नाटक को नई प्रेरणा मिली। पारिवारिक जीवन को लेकर रॉबर्टसन, जोन्स और पिनरो ने इब्सन की यथार्थवादी शैली के अनुकरण पर नाटक लिखे। उनमें इब्सन की प्रतिभा नहीं थी, लेकिन नाटकीयता और आधुनिक शैली के द्वारा उन्होंने आगे का मार्ग सरल कर दिया।

20वीं शताब्दी

इब्सन के प्रचार ने अंग्रेजी नाटक को नई दिशा दी। उसके नाटकों की कुछ विशेषताएँ ये थीं- समाज और व्यक्ति की साधारण समस्याएँ; पुरानी नैतिकता की आलोचना; बाहरी संघर्षों के स्थान पर आंतरिक संघर्ष; रंगमंच पर यथार्थवाद; विवरणात्मक साज-सज्जा; स्वगत का बहिष्कार; बोलचाल की भाषा से निकटता; प्रतीकवाद। इब्सन के नाटक समस्या नाटक हैं। 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक नाटककारों पर इब्सन के अतिरिक्त चेखव का भी गहरा असर पड़ा। ऐसे नाटककारों में सबसे प्रमुख शॉ और गाल्सवर्दी के अतिरिक्त ग्रैनबिल बार्कर, सेंट जॉन हैंकिन, जॉन मेसफील्ड, सेंट जॉन अर्विन, आर्नल्ड बेनेट इत्यादि हैं।

इस युग में कॉमेडी ऑव मैनर्स की परंपरा भी विकसित हुई है। 19वीं शताब्दी के अंत में ऑस्कर वाइल्ड ने इसको पुनरुज्जीवित किया था। २०वीं शताब्दी में इसके प्रमुख लेखकों में शॉ, मॉम, लांसडेल, सेंट अर्विन, मुनरो, नोएल काअर्ड, ट्रैवर्स, रैटिगन इत्यादि हैं।

समस्या नाटकों की परंपरा भा आगे बढ़ी है। उनके लेखकों में सबसे प्रसिद्ध ओ¢ कैसी के अतिरिक्त शेरिफ, मिल्न, प्रीस्टले और जॉन व्हॉन ड्रटेन हैं।

इस युग के ऐतिहासिक नाटककारों में सबसे प्रसिद्ध ड्रिंकवाटर, बैक्स और जेम्स ब्रिडी हैं।

काव्य नाटकों का विकास भी अनेक लेखकों ने किया है। उनमें स्टीफेन फिलिप्स, येट्स, मेसफील्ड, ड्रिंकवाटर, बाम्ली, फ्लेकर, अबरक्रुंबी, टी.एस. इलियट, ऑडेन, ईशरवुड, क्रिस्टोफर फ्राई, डंकन, स्पेंडर इत्यादि हैं।

आधुनिक अंग्रेजी नाटक में आयरलैंड के तीन प्रसिद्ध नाटककारों, येट्स, लेडी ग्रेगरी और सिंज की बहुत बड़ी देन है। यथार्थवादी शैली के युग में उन्होंने नाटक में रोमानी और गीतिमय कल्पना तथा अनुभूति को कायम रखा।

इस प्रकार स्पष्ट है कि 20वीं शताब्दी में अंग्रेजी नाटक का बहुमुखी विकास हुआ है। रंगमंच के विकास के साथ-साथ रूपों में भी अनेक परिवर्तन हुए हैं। समसामयिकता के कारण मूल्यांकन में अतिरंजन हो सकता है, लेकिन जिस युग में शॉ, गाल्‌र्सवर्दी, ओ कैसी, येट्स, इलियट, और सिंज जैसे नाटककार हुए हैं उसकी उपलब्धियों का स्थायी महत्व है।

पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध


टीका टिप्पणी और संदर्भ

सं. ग्रं.कैंब्रिज हिस्ट्री ऑव इंग्लिश लिटरेचर; लेगुइ ऐंड कज़ामिया; हिस्ट्री ऑव इंग्लिश लिटरेचर। लेगुई ऐंड कजामिया: ए हिस्ट्री ऑव इंग्लिश लिटरेचर; क्रेक: इंग्लिश प्रोज़ राइटर्स; सेंट्सबरी: इंग्लिश प्रोज़ रिद्म। डब्ल्यू.जे. कोर्टहोप : हिस्ट्री ऑव इंग्लिश पोएट्री; कैंब्रिज हिस्ट्री ऑव इंग्लिश लिटरेचर; लेगुई ऐंड कज़ामिया ए हिस्ट्री ऑव इंग्लिश लिटरेचर; डब्ल्यू.पी. कर इंग्लिश लिटरेचर, मेडोवल; बी.डी. सोलापिंटो: दि इंग्लिश रेनेसाँ, 1510-1688; एस.जे.सी. ग्रियर्सन क्रॉस करेंट्स इन इंग्लिश लिटरेचर ऑव दि सेवेन्टीथ सेंचुरी; एडमंड गॉस हिस्ट्री ऑव एट्टीन्थ सेंचुरी लिटरेचर; सी.एच. हरफर्ड दि एज ऑव बर्ड्‌स्वर्थ; बी. आइफर इवन्स इंग्लिश पोएट्री इन दि लेटर नाइन्टीन्थ सेंचुरी; एफ.आर लिविस न्यू बेयरिंग्स इन इंग्लिश पोएट्री। अलरडाइस निक्‌ल दि थियरी ऑव ड्रामा, ब्रिटिश ड्रामा, और दि डेवलपमेंट ऑव दि थियेटर; ई.के, चैंबर्स दि एलिज़ाबेथन स्टेज; ए.एच. थार्नडाइक इंग्लिश कॉमेडी; जे.सी. ट्रेविन दि थियेटर सिंस 1900, और ड्रैमेटिस्ट्स ऑव टुडे; एलिस फर्मर आयरिश ड्रामा।

निजी टूल
नामस्थान
संस्करण
क्रियाएं
भ्रमण
भारतकोश
सहायता
टूलबॉक्स