अगस्त्य

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लेख सूचना
अगस्त्य
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1
पृष्ठ संख्या 72
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पाण्डेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1973 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक बलदेव उपाध्याय।

अगस्त्य प्रख्यात ऋषि

अगस्त्य वैदिक साहित्य तथा पुराणों में इनके जीवन की विशिष्ट रूपरेखा अंकित की गई है। मित्र वरुण ने अपना तेज कुंभ (घड़े) के भीतर डाल रखा था जिससे इनका जन्म हुआ और इसीलिए ये मैत्रावरुणि तथा कुंभ योनि के नाम से भी अभिहित हैं। वसिष्ठ ऋषि इनके अनुज थे। अगस्त्य ने विदर्भ देश की राजकुमारी लोपामुद्रा के साथ विवाह किया था जिनसे इन्हें दो पुत्र उत्पन्न हुए- दृढस्यु और दृढास्य। अगस्त्य के अलौकिक कार्यों में तीन विशेष महत्व रखते हैं- वापाति राक्षस का संहार, समुद्र का पी जाना तथा विंध्याचल की बाढ़ को रोक देना। दक्षिण भारत में आर्य सभ्यता के विस्तार का श्रेय ऋषि अगस्त्य को ही दिया जाता है। बृहत्तर भारत में भी भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रसार का महनीय कार्य अगस्त्य के ही नेतृत्व में संपन्न हुआ था। इसीलिए जावा, सुमात्रा आदि द्वीपों में अगस्त्य की अर्चना मूर्ति के रूप में आज भी की जाती है।

अगस्त्य कवि

तमिल भाषा का आद्य वैयाकरण। यह कवि शूद्र जाति में उत्पन्न हुए थे इसलिए यह शूद्र वैयाकरण के नाम से प्रसिद्ध हैं। यह ऋषि अगस्त्य के ही अवतार माने जाते हैं। ग्रंथकार के नाम पर यह व्याकरण अगस्त्य व्याकरण के नाम से प्रख्यात है। तमिल विद्वानों का कहना है कि यह ग्रंथ पाणिनि की अष्टाध्यायी के समान ही मान्य, प्राचीन तथा स्वतंत्र कृति है जिससे ग्रंथकार की शास्त्रीय विद्वता का पूर्ण परिचय उपलब्ध होता है।

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