कथा

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लेख सूचना
कथा
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 2
पृष्ठ संख्या 379-380
भाषा हिन्दी देवनागरी
लेखक भामह, दंडी, रुद्रट, हेमचंद्र, वाचस्पति गैरोला, डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी
संपादक सुधाकर पांडेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1975 ईसवी
स्रोत भामह : काव्यालंकार; दंडी : काव्यादर्श; रुद्रट : काव्यालंकार; हेमचंद्र : काव्यानुशासन; वाचस्पति गैरोला : संस्कृत साहित्य का इतिहास; डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी : हिंदी साहित्य का आदिकाल
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक करुणापति त्रिपाठी

कथा साहित्य की एक प्रमुख विधा है। संस्कृत साहित्यशास्त्रीय दृष्टि से विचार के पूर्व ध्यान देने की एक विचित्र बात यह है कि प्राय: समस्त चरितकाव्यों में रचयिताओं द्वारा अपने काव्य का कथा के नाम से उल्लेख है। पुराने समय से प्रचलित चरितकाव्य को कथा कहने की प्रथा बहुत बाद तक चलती रही है। 'तुलसी' का रामचरितमानस चरितकाव्य भी है, कथा भी है। तथ्य यह है कि प्राचीन साहित्य में स्पष्ट रूप से दो अर्थों को लेकर 'कथा' शब्द व्यवहृत है-1. साधारण कहानी और 2. अलंकृत काव्य (जिसमें कहानी का भी तत्व वर्तमान हो)। साधारण कहानी के अर्थ में पंचतंत्र की कथाएँ भी कथा हैं, महाभारत और पुराणों के आख्यान भी कथा हैं और सुबंधु की वासवदत्त, बाण की कादंबरी, गुणाढ्य की बृहत्कथा आदि भी कथा हैं। पर विशिष्ट अर्थ में यह शब्द अलंकृत गद्यकाव्य के लिए प्रयुक्त हुआ है[1] पर उक्त अर्थ में कथा शब्द का प्रयोग बहुत प्राचीन काल से चला आ रहा है और आज भी अनेक अर्थों में वह प्रयुक्त है। परंतु इस सामान्य अर्थ के अलावा अलंकृत गद्यकाव्य की कहानी के अर्थ में कथा शब्द का जो शास्त्रीय अर्थपरक प्रयोग है, मुख्यत: उसका उल्लेख यहाँ करना है। लक्षणकार आचार्यों ने जिन लक्षणों को निरूपित किया है उनकी परिकल्पना असंदिग्ध रूप से उनके सामने वर्तमान लक्ष्य कृतियों के आधार पर ही हुई होगी।

कथा की शास्त्रीय चर्चा में सबसे पहले अग्निपुराण[2] का उल्लेख किया जा सकता है जहाँ पाँच भेदों के नाम हैं-1. कथा, 2. आख्यायिका, 3. खंडकथा, 4. परिकथा और 5. कथानक। पर आगे चलकर कथा और आख्यायिका-दो ही भेद आलंकारिकों द्वारा चर्चित और परिभाषित हुए। आख्यायिका का उल्लेख बहुत पुराना है। ईसा से लगभग 400 वर्ष पूर्व वैयाकरण वररुचि के वार्तिकों तथा पतंजलि (लगभग 150 ई.पू.) के महाभाष्य[3] में आख्यान और आख्यायिका शब्द मिलते हैं। वहाँ यह संकेत भी झलक जाता है कि पात्र (मुख्यत: नायिका) के नाम पर ग्रंथ शीर्षक भी दिया जाता था। पतंजलि ने वासवदत्ता, सुमनोत्तरी और भैमरथी-इन तीन आख्यायिका कृतियों के नामों का भी संकेत किया है। संभवत: ये गद्य कृतियाँ रही होंगी। रुद्रदामा का शिलालेख भी गद्यकाव्य का अच्छा नमूना है। हो सकता है, आख्यायिका भी पुराने जमाने की संस्कृत गद्य-काव्यकृति रही हो। संस्कृत साहित्य के पुराने आचार्य भामह ने सबसे पहले अपने काव्यालंकार में आख्यायिका और कथा का अंतर बताते हुए इनके लक्षण लिखे हैं-सुंदर गद्य में लिखित रसमय कहानीवाली कृति आख्यायिका कही जाती है। इसकी कथा का विभाजन उछ्‌वास नामक अध्यायों में होता हे। वर्ण्य विषय कल्याहरण, संग्राम, विरोध आदि रहता है और अंत में नायक अपने प्रयास में सफल या विजयी दिखाया जाता है। इसके बीच-बीच में या उछ्‌वासों के आदि अंत में वक्त्र और अपरवक्त्र छंद भी आ जाते हैं। इसकी कथा का आधार यथार्थ (ऐतिहासिक या कभी-कभी पौराणिक) वृत्त होता है। फलत: कल्पना की अतिरंजना इसमें कम या नहीं के बराबर होती है। इसकी कथा का वक्ता भी और कोई और नहीं वरन्‌ स्वयं नायक ही होता है। आख्यायिका की भाषा भी संस्कृत ही होनी चाहिए। नायक के वक्ता होने और यथार्थ पर कथानक आधारित होने के कारण काल्पनिक वृत्त या कथानक रूढ़ियों के अधिक प्रयोग का अवसर नहीं रहता है। कथा का काव्य रूप इससे थोड़ा भिन्न होता है। उसकी कथावस्तु कल्पित होती है। कथा की कहानी कहनेवाला नायक न होकर, वहाँ वक्ता श्रोता अन्य होते हैं। इन्हीं दो (वक्ता श्रोता) व्यक्तियों की बातचीत या प्रश्नोत्तर के रूप में कथा कही जाती है। कथा की भाषा भी संस्कृत, प्राकृत या अपभ्रंश-कुछ भी हो सकती है। उसमें भाषा के माध्यम का कोई बंधन नहीं होता। भामह के लक्षण को देखकर मानों उसकी आलोचना अथवा उसमें संशोधन करते हुए दंडी ने अपने काव्यादर्श[4] में कहा है-कथा और आख्यायिका दोनों वस्तुत: एक ही कोटि की साहित्यिक रचनाएँ हैं। कहानी का कहनेवाला चाहे नायक हो या और कोई, अध्याय चाहे उछ्‌वासों के नाम से विभक्त हों या लंभक नाम से, बीच-बीच में चाहे वक्त्र अपरवक्त्र छंद आएँ या न आएँ-इन सबसे कहानी में क्या अंतर पड़ता है? अत: इन ऊपरी और बाहरी अंतरों के आधार पर कथा और आख्यायिका में भेद मानने का कोई खास कारण नहीं है। दंडी स्वयं भी गद्यकाव्य की-दशकुमारचरित नामक-कहानीवाली एक पुस्तक के निर्माता हैं। निश्चय ही उनके कथन का यह संकेत हो सकता है कि अपने समकालीन कहानी के लक्ष्यग्रंथों का आधार लेकर भामह ने कथा आख्यायिका के जो लक्षण बताए थे, संभवत: दंडी के काल तक आते-आते लक्ष्यकारों ने उनको भुलाकर या उपेक्षित समझकर कड़ाई से उन लक्षणों का पालन करना छोड़ दिया था। फिर भी भामह के कथन में कुछ सार है। आख्यायिका के लिए शायद संस्कृत और गद्य का माध्यम ही मान्य रहा। पर कथा के लिए वे बंधन नहीं थे। गुणाढ्य की बृहत्कथा (जिसकी कथावस्तु के ऋणी सुबंधु, दंडी और बाणभट्ट-तीन प्रमुख संस्कृत-गद्य-साहित्य-लेखक कहे जाते हैं) संस्कृत में नहीं बल्कि प्राकृत में और गद्य में नहीं, पद्य में थी। रुद्रट और उनके टीकाकार नमिसाधु ने काव्यालंकार में इसे निरूपित करते हुए बताया है कि संस्कृत-निबद्ध-कथाओं के लिए गद्य माध्यम आवश्यक है। परंतु अन्य भाषा अर्थात्‌ प्राकृत, अपभ्रंश आदि की कथाओं को अगद्य (अर्थात्‌ पद्य) में लिखना चाहिए। वैसे प्राकृत की, गद्य में लिखी, वसुदेवहिंडी नामक प्राचीन कथा उपलब्ध भी है। इसके अलावा प्राकृत में लिखित पद्यबद्ध कतिपय अन्य कथाएँ भी प्राप्त हुई हैं और उनमें से अनेक प्रकाशित भी हो चुकी हैं। अनुमान किया जा सकता है, रुद्रट के कथालक्षण और काव्यालंकार के टीकाकार नमिसाधु की व्याख्या में बताए गए लक्षण उस काल के उपलब्ध लक्ष्यों को देखकर ही निरूपित हैं।[5] बताया गया है कि कथा या महाकथा के कथारंभ में देवता या गुरु की वंदना करने और संक्षेप में स्वकुल परिचय देने के पश्चात्‌ कथालेखन का उद्देश्यवर्णन रहना चाहिए। प्रारंभ में एक कथांतर भी रहना चाहिए जो कहानी का प्रस्ताव करे। कथा गद्य और अगद्य में भी हो सकती है। सरस वर्णनयुक्त कन्याप्राप्ति ही इसका प्रतिपाद्य होता है। आख्यायिका में वंशवर्णन आदि विस्तृत रहता है। कथा आख्यायिका के बारे में और भी बहुत सी बातें बताई गई हैं। रुद्रट से पूर्व की, कौतूहल कवि की 'लीलावती' आज उपलब्ध है जिसमें रुद्रट का कथालक्षण प्राय: पूरा का पूरा देखा जा सकता है। कवि और कविपत्नी की बातचीत द्वारा कहानी उपस्थित की गई है। इस देश के कथाकथन की यह पुरानी प्रथा है। पुराणों में और सबसे बढ़कर महाभारत में व्यास ने इसी रूप से प्रश्नोत्तरात्मक बातचीत द्वारा कथा ही नहीं, सब कुछ बता डाला है। हेमचंद्र ने अपने काव्यानुशासन[6] में प्राय: इसी प्रकार के लक्षणों द्वारा आख्यायिका और कथा को परिभाषित किया। आख्यायिका की रचना संस्कृत में होनी आवश्यक है। अन्य बातें प्राय: पूर्ववत्‌ हैं। प्राचीन आलंकारियों ने और हेमचंद्र ने भी बाण के हर्षचरित को आख्यायिका का प्रतिमान माना है और कविकल्पनाप्रसूत लोकोत्तर, असंभव एवं अद्भुत पात्रों तथा उनके चरितों से युक्त बाण की कादंबरी, लीलावती (पद्यबद्ध) आदि को कथा कहा है। यह भी स्पष्ट रूप से हेमचंद्र ने कहा है कि कथा गद्य या पद्य में और सभी भाषाओं (संस्कृत, प्राकृत, मागधी, शौरसेनी, पैशाची, अपभ्रंश आदि) में लिखी जा सकती है। उन्होंने अनेक ग्रंथों के नाम लिखकर कथा और आख्यायिका के अतिरिक्त आख्यान, निदर्शन, प्रवह्लिका, मणिकुल्या, परिकथा, खंडकथा, समस्तकथा, उपकथा आदि का भी सोदाहरण परिचय दिया है। आख्यायिका का नायक आख्यातवृत्त एवं धीरप्रशांत होता है, पर कथा का धीरशांत (नायकाख्यातवृत्ताभाव्यर्थ शंसिवादि: सोछ्‌वासा संस्कृता गद्ययुक्ता आख्यायिका। धीरशांतनायका गद्येन पद्येन सर्वभाषा कथा)।

निष्कर्ष इतना ही है कि कथा और आख्यायिका के भामह और दंडी द्वारा सूचित अनेक लक्षण उपेक्षित रहे या भुला दिए गए अथवा कठोरता के साथ उनका पालन नहीं हुआ। पर भामह द्वारा कुछ बातें मार्के की कही गई थीं जिनकी गूँज भविष्यत्‌ के लक्षणों में भी है। पहली बात यह है कि आख्यायिका स्वयं नायक द्वारा कथित होती है और ऐतिहासिक या यथार्थ वृत्त पर आधारित। उनके कहने का कदाचित्‌ संकेत यह था कि इसी कारण वह अधिकत: यथार्थशंसी होती हैं; उसमें अलौकिक, असामान्य या दिव्य घटनाओं और चारित्रिक उत्कर्षों के आरोपण का स्थान कम होता है। पर कथा के इससे भिन्न और कल्पनाधारित होने से उसमें कथानक रूढ़ियों के लिए पर्याप्त अवकाश और अवसर रहता है। पात्रों में असंभव शौर्य-वीर्य-त्यागादि गुणों के चरितांकन की सुविधा रहती है और अद्भुत असामान्य उसमें गूँथ दिया जा सकता है। इसका एक कारण यह भी था कि उसका कहनेवाला नायक न होकर अन्य श्रोता वक्ता होते थे जो सुनी सुनाई या जनश्रुति की कहानी हू-ब-हू या थोड़ा बहुत इधर-उधर करके श्रोता के सामने रख देते थे। इसमें कवि और नायक दोनों का उत्तरदायित्व कम हो जाता था। दूसरी बात यह है कि संस्कृत के आलंकारिकों की मान्यता के अनुसार आख्यायिका की भाषा मुख्यत: संस्कृत रही है और रचानारूप उसका गद्य रहा है। पर कथा में न तो भाषा का प्रतिबंध है और न गद्य पद्य का। जब-जब जैसी रचनाएँ होती गईं तब-तब कथा आख्यायिका के लक्ष्यानुसारी लक्षण बनाए गए। लक्षणों के अनुसार रचना करने की कलाकारों ने कभी बाध्यता स्वीकार नहीं की। भाषा, कथावस्तु और उसका विभाजन, छंद आदि के संदर्भ में आख्यायिका-कथाकारों ने अपनी रुचि का अनुसरण किया।

साहित्यशास्त्रीय अर्थ से भिन्न एक अर्थ को लेकर लोकव्यवहार में कथा शब्द का प्रयोग मिलता है। इसके अनुसार कथा शब्द से उन कथाओं का बोध होता है जो पौराणिक, सांस्कृतिक लोकपरंपरा के अनुसार (अथवा मिथक के अनुसार) कथामाध्यम से व्रात, दान, तीर्थयात्रा, देवदर्शन, स्नान, धर्मानुष्ठान, स्वर्गप्राप्ति, मनोरथपूर्ति आदि की महिमा औरुलदायिता बताकर तत्तत्कर्मानुष्ठान आदि की प्रेरणा देती है; जैसे, महालक्ष्मी व्रातकथा, हरितालिका व्रातकथा, सत्यनारायण ्व्रातकथा आदि। यह प्रयोग हिंदू धर्म और भारतीय सांस्कृति परंपरा से संबद्ध है। जातक कथाएँ आदि भी बहुत कुछ इसी कोटि की कथाएँ हैं। वस्तुत: कथा शब्द का बड़े व्यापक और अनेक अर्थों में प्रयोग होता है। यहाँ शास्त्रीय तथा कुछ हिंदीभाषी क्षेत्र के लौकिक अर्थ का संकेत मात्र किया जा सका है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिंदी साहित्य का आदिकाल, डॉ. हाजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ. 52
  2. अग्निपुराण 173
  3. महाभाष्य (4।2।60 एवं 4।3।187)
  4. काव्यादर्श (1।23-30)
  5. 16।20-30
  6. काव्यानुशासन (अध्या. 8)
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