क़ुतुबुद्दीन ऐबक

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क़ुतुबुद्दीन ऐबक
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3
पृष्ठ संख्या 60
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पांडेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1976 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक मिथिलो चंद्र पांडा

कुतुबुद्दीन ऐबक (११९२-१२१० ई.)। दिल्ली के सुलतानों गुलाम वंश का संस्थापक। उसका जन्म तुर्किस्तान के एक गुलाम घर में हुआ था जब वह छोटा था तभी उसे नेशापुर के एक ने खरीद लिया था। उस व्यापारी से वहाँ के काजी फखरुद्दीन कुतुबुद्दीन को खरीदा और उसे अपने बच्चों की तरह पाला। बच्चों के साथ ही उसकी भी धार्मिक तथा सैन्य शिक्षा की व्यवस्था की। काजी की मृत्यु के उपरांत काजी के पुत्रों ने उसे एक व्यापारी के बेच दिया। वह उसे गजनी ले गया जहाँ उसे मोहम्मद गोरी ने खरीद लिया। अपने गुणों के कारण वह बहुत जल्द ही मोहम्मद गोरी स्नेहपात्र हो गया और गोरी ने उसे अमीर-ए-आखुर के पद पर नियुक्त कर दिया। थोड़े ही दिनों में वह मोहम्मद गोरी के सबसे विश्वासपात्र तुर्की अफसरों में गिना जाने लगा। उसने अपने स्वामी के लिए बहुमूल्य सेवाएँ कीं और उसके भारतीय आक्रमणों में उसने अपना रणकोश दिखाया। जब ११९२ में तराई के मैदान में पृथ्वीराज हार गया मार डाला गया तब उत्तरी भारत में मुस्लिम राज्य की नींव पड़ी तदनंतर कुछ ही वर्षों में कुतुबुद्दीन ने उत्तरी भारत के कई भागों पर पाली। उसकी इन सेवाओं से प्रसन्न होकर मोहम्मद गोरी ने भारत संपूर्ण विजित प्रदेश कुतुबुद्दीन को सौंप दिए। इस प्रदेश पर तो उसका पूरा अधिकार था ही, उसे अपना क्षेत्र बढ़ाने का भी अधिकार मिला अपनी स्थिति मजबूत बनाने के लिए उसने अपने प्रतिस्पर्धी शक्तिशाली शासकों से विवाह संबंध जोड़ने आरंभ किए। यलदुज़ की बेटी से विवाह किया : अपनी बेटी का विवाह इल्तुतमिश से और अपनी बहन का ब्याह नासिरु द्दीन कुबाचा से किया।

ररणयंभोर, मेरठ, दिल्ली तथा हाँसी आदि कई स्थानों पर विजय प्राप्त करने के बाद ११९४ ई० में कुतुबुद्दीन की सहायता से गोरी ने बनारस तथा कन्नौज के राजा जयचंद को हराया था। गुजरात के राजा के कारण कुतुबुद्दीन को कुछ असुविधा हुई थी, इसलिये उसने ११९७ ई. में गुजरात पर आक्रमण कर दिया और उसकी राजधानी लूटकर दिल्ली लौटा; १२०२ ई. में उसने चंदेलों की शक्ति को नष्टभ्रष्ट किया; बुंदेलखंड में कार्लिजर के किले पर अधिकार कर लिया और वहाँ से लूट में अपार धनराशि प्राप्त की। तदनंतर महोबा तथा बदायूं पर अधिकार कर वह दिल्ली लौटा।

मोहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन सुल्तान की उपाधि धारणकर भारतीय क्षेत्रों का स्वतंत्र शासक बन बैठा। उसने लगभग चार वर्ष तक राज्य किया और नवंबर, १२१० में लाहौर में चौगान खेलते समय घोड़े से गिर जाने से उसकी मृत्यु हो गई। वह साफ दिल का शासक था। अपनी दानशीलता के लिए वह प्रसिद्ध है। वह सबके साथ न्याय करता था और अपने राज्य में शांति तथा समृद्धि बनाए रखने में प्रयत्नशील रहता था।

वह इस्लाम का पक्का पुजारी था। अपने रणकौशल के कारण युद्धों में साधारणत: उसकी कभी हार नहीं हुई। विभिन्न क्षेत्रों पर विजय पाने के कारण उसकी मृत्यु के समय भारत का एक बड़ा भाग मुसलमान शासकों के अधीन हो गया।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

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