कीटाहारी जंतु

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लेख सूचना
कीटाहारी जंतु
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3
पृष्ठ संख्या 37-38
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पांडेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1976 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक धर्मेंद्रनाथ वर्मा

कीटाहारी जंतु इस वर्ग के अंतर्गत बहुत से अति प्राचीन स्वरूप के, कुछ आदियुग कि प्राणियों के अनुरूप तथा कुछ अत्यधिक विशेष प्रकार के जंतु आते हैं। ये छोटे छोटे जीव कदाचित्‌ अनादि काल से अपनी शारीरिक रचना में बिना किसी बड़े परिवर्तन के चले आ रहे हैं। कीटभक्षकों की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि इनकी श्रेणी में अनगिनत प्रकार के प्राणी हैं। आजकल जो कीटभक्षक पाए जाते हैं उनमें स्तनधारी वर्ग के कतिपय ऐसे प्राणी हैं जिनकी या तो शारीरिक रचना अद्भूत है, अथवा स्वभाव सर्वथा विचित्र है। इन्हीं कारणों से कीटाहारी वर्ग के जंतु प्राणिशास्त्रियों के लिए विशेष अध्ययन के विषय रहे हैं। मंगोलिया का फ़ासिल कीटभक्षी, डेल्टाथीरिडियम (Deltatheridium), इस वर्ग का श्वेत रंग का एक अति प्राचीन जंतु था। इसकी लंबे आकार की आगे निकली हुई खोपड़ी दो इंच से कम लंबी होती थी, किंतु आधुनिक युग के कीटाहारी जंतुओं के समान इसको विशेष नासिका नहीं थीं।

कीटाहारियों की पहले चार श्रेणियाँ मानी जाती थीं, किंतु अब वीन ही मुख्य श्रेणियाँ हैं। इन श्रेणियाँ के अंतर्गत अब डरमेप्टरा (Dermaptera) वर्ग नहीं गिना जाता। कीटाहारियों के वर्गीकरण में अत्यधिक विविधता और असमानता पाई जाती है। जहाँ दो श्रेणियाँ के जंतुओं में अत्यधिक समानता पाई जाती है वहाँ तीसरी श्रेणी इनसे बिल्कुल अलग और भिन्न प्रकार की प्रतीत होती हैं। इस दृष्टि से मैडागास्कर द्वीप के अनोखे टेनरेक (Tenrec), पश्चिमी अफ्रीका के श्रू (Soricidae shrew ) नामक कीटाहारी तथा द्वीपसमूह के सोलेनॉडान्स (Solenodons) से सर्वथा भिन्न हैं। इसके विपरीत साही तथा लघु आकार का एलिफैंट श्रू (Elephant shrew), जिनको मैक्रोस्केलिड्स (Macroscelides) कहते हैं, अत्यधिक सजातीय मालूम होते हैं।

कीटभक्षकों की श्रेणी का कोई जंतु बड़े अथवा मध्यम आकार तक के स्तनधारी जंतुओं के रूप में विकसित नहीं हुआ, फलत: इस श्रेणी के अधिकांश जंतु छोटे आकार के ही रहे हैं। फिर भी मैडागास्कर के सेंटीटेस जंतु, जो केवल दो फुट लंबे होते हैं, इस श्रेणी के सबसे बड़े जानवर हैं। साधारणत श्रू (छछूँदर) सबसे छोटा स्तनधारी प्राणी है। कदाचित्‌ अपने छिपे रहने के स्वभाव तथा छोटे आकार के कारण ही ये कीटाहारी क्रिटेशस युग (Crataceous period) से लेकर अब तक अपनी लंबी अवधि में भी समाप्त नहीं हुए। अनुमानत: सब प्रकार के कीटाहारियों का मस्तिष्क छोटा तथा अपने पूर्वजों की भाँति होता था। इन स्तनधारी जंतुओं के पूरे संक्रमण काल में दाँत तथा खोपड़ी की बनावट भी अधिकांशत: उनके पूर्वजों के आकार की ही भाँति चली आ रही हैं। खोपड़ी से उनकी बहुत-सी आदिकालीन विशेषताओं का पता चलता हैं, जैसे अपूर्ण मांसविहीन कनपटी की हड्डी और कान का खुला हुआ छिद्र, जिसमें कान की हड्डी केवल आंशिक वृत्त बनाती हैं। आदिकालीन कीटाहारियों के ढाँचे के सामान्यत: अनुरूप ही इस वर्ग के प्राणियों के ढाँचों की रचना अब भी चल रही हैं, किंतु कुछ समूहों में जो थोड़ा सा अंतर दृष्टिगोचर होता है, वह उस जीव की किस विशेष आवश्यकता की पूर्ति के लिए हुआ प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ, छछूँदर के समान मोल (Mole) के हाथ और पैर जमीन खोदने के लिए बड़े सशक्त होते हैं। अन्यथा उसकी रहन सहन, शरीर पर मुलायम बाल के स्थान पर काँटे होना, छिपकर सोना, छोटे आकार का होना और खतरा पड़ने पर अपने शरीर को मोड़कर गेंद के आकार का बना लेना, ये सारी विशेषताएँ उसके पूर्वजों की विशेषताओं की ही ओर संकेत करती हैं।

आजकल पाए जानेवाले अधिकांश कीटाहारी निशाचर होते हैं, जो प्राचीनयुग से अपरिवर्तित रूप से चली आ रही स्तनधारी जीवों की विशेषताओं को धारण करते हैं। यही कारण है कि साही में काँटे होते हैं और मोल में छिपे रहने का स्वभाव होता हैं। बहुत से कीटाहारी शीतकाल में सो जाते हैं। इसीलिए उनके शरीर में चर्बी की अधिकता होती हैं। इस श्रेणी में सर्वाधिक महत्व के प्राणी श्रू होते हैं।

कीटाहारियों का वर्गीकरण अत्यंत कठिन हैं, क्योंकि इसके अंतर्गत कीटाहारी जंतु कभी किसी वर्ग में रखा जाता है और कभी किसी में। दाँत, खोपड़ी और मस्तिष्क की रचना के अनुसार तो यह कर-पक्ष-वर्ग के चमगादड़ जैसे अन्य प्राणियों के समान हैं। इसके अतिरिक्त इनके अवशेषों का अध्ययन करने से, विशेषज्ञों के अनुसार, से कीटाहारी लेमूर (Lemur) जाति के बंदरों के अनुरूप प्रतीत होते हैं तथा कुछ के अनुसार से द्विद्वंत के ही समीप हैं। पेड़ पर रहनेवाले श्रू की परिगणना इसी कीटाहारी श्रेणी में होती थी, परंतु अब स्थिति भिन्न है, और श्रू प्राइमेटा (Primate) वर्ग में रखे गए हैं। इस प्रकार कीटाहारी जंतुओं और प्राइमेट वर्ग के बंदरों में भी निकटता देखी जाती हैं।

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार कीटाहारियों के ज़ालैंडोडांटा (Golambdodota) तथा डाइलैंडोडॉण्टा उपवर्गों के विभाजन से उनकी पारस्परिक जातीयता तथा संबंध होने का आभास नहीं होता। कीटाहारियों का सर्वाधिक न्यायसंगत वर्गीकरण तभी संभव होगा जब उनके अनेक समूहों को कीटाहारी स्वीकार किया जाए। सिंपसन ने सुपर फ़ैमिलीज के रूप में इनका वर्णन किया हैं। इस प्रकार सिंपसन के अनुसार कीटाहारियों का वर्गीकरण निम्नलिखित है :

देखने में ये दोनों एक दूसरे से सर्वथा भिन्न होते हुए भी परस्पर निकट संबंधी हैं। इन कीटहारियों की शरीररचना में उन आदिकाल स्तनधारी प्राणियों की विशेषताएँ विद्यमान हैं जो डाइनोसार (Dinosaur) के समकालीन थे। साही की पाँच जातियाँ हैं। ये दूसरे स्तनधारी प्राणियों की अपेक्षा अधिक छोटे आकार के जंतु होते हैं। इनके हाथ-पैर भी छोटे-छोटे होते हैं जिनमें पतले ओर तीक्ष्ण पंजोंवाली छोटी और पतली उँगलियाँ तथा अँगूठे होते हैं। साही का स्वभाव जाति, जलवायु तथा निवासस्थान के अनुसार भिन्न प्रकार का होता हैं। अत्यधिक शीत, ताप तथा शुष्क मौसम में, जब अन्न की कमी हो जाती हैं, ये जंतु निष्क्रिय हो जाते हैं। उदारणार्थ, भारत में साही स्वभावत: रात में ही निकलता है, परंतु अफ्रीका में वह दिन में भी चलता-फिरता दिखाई पड़ता है। इनके एक बार में चार से लेकर छह तक बच्चे होते हैं। नवजात शिशु कुछ समय तक दृष्टिविहीन होते हैं। उनके नग्न शरीर पर श्वेत और छोटे काँटे दिखाई देते हैं, जो आरंभ में मुलायम होते हैं। इनकी दंतरचना भी कुछ कीटाहारी जंतुओं की दंतरचना से भिन्न अर्थात्‌ 3133/2123 होती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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