पारसी समुदाय

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सैकड़ों सालों से मुंबई में रहने वाले पारसी लोगों के मृत सगे-संबंधियों के शवों के लिए 'टॉवर आफ साइलेंस' ही अंतिम ठिकाना रहा है। वे वहां पर शवों को गिद्घों के भोजन के लिए लेकर आते रहे हैं। पारसी धर्म के विश्वास के अनुसार मृत्यु के बाद शरीर को इन परभक्षियों के काम आना चाहिए। समस्या यह है कि रासायनिक उर्वरकों के अत्याधिक प्रयोग के कारण भारत में गिद्घों की संख्या कम हो गई है, अत: शवों के अंतिम संस्कार के लिए पारसियों को सौर भट्टियों का प्रयोग करना पड़ रहा है। शवों को राख में बदलने के लिए बड़े-बड़े लेंसों का प्रयोग किया जाता है। मलाबार हिल्स स्थित टॉवर आफ साइलेंस में सहायता करने वाले सेवानिवृत्त इंजीनियर सायरस सिंगानपोरिया बताते हैं, गिद्घों की संख्या अधिक नहीं है, वे कभी-कभी ही यहां आते हैं।

इस समस्या के साथ ही भारत में रहने वाले पारसी एक और बड़ी समस्या का सामना कर रहे हैं। यह समस्या उनकी घटती जनसंख्या की है। इस समय देश में लगभग 69,000 पारसी ही बचे हैं। उद्योगपति रतन टाटा, प्रसिद्घ लेखक रोहिन्टन मिस्त्री जैसे नाम इस समुदाय में शामिल हैं। अधिकतर पारसी मुंबई या उसके आस-पास के इलाकों में रहते हैं। गिरती जनसंख्या के कारण पारसी समुदाय में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि इसमें कैसे सुधार लाया जाए? यह सुधारवादियों व परंपरावादी दोनों ही प्रकार के पारसियों के मध्य तकरार का मुख्य कारण है।

भगवान अहूर माजदा पर विश्वास रखने वाले पारसी संत जरथुस्ट्र के अनुयायी हैं, जो लगभग 1300 साल पहले भारत में आ बसे थे। पूरे विश्व में पारसियों की संख्या लगभग 2,00,000 है। यह सूर्य और अग्नि की पूजा करते हैं। हमेशा से ही अल्पसंख्यक रहने के बावजूद भारतीय पारसी आश्चर्यजनक रूप से सफल रहे हैं। टाटा घराने के अतिरिक्त इसका दूसरा सफल उदाहरण गोदरेज परिवार है जो अपने उत्पादों के जरिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इसी प्रकार भारतीय सेना के फील्डमार्शल स्व. सैम मानेकशां के नाम से कौन परिचित नहीं है?

बहुत ही सम्मानित और शिक्षित माने जाने वाले पारसी समुदाय के लोग देर से विवाह करते हैं और कम संतानों में विश्वास रखते हैं। इसी आदत ने उनके अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। मुंबई में प्रतिवर्ष 200 पारसी बच्चे जन्म लेते हैं, वहीं 1000 पारसियों की मृत्यु हो जाती है। द पारसियन मैगजीन के संपादक जहांगीर इस समुदाय में होने वाले जन्म व मृत्यु का मासिक ब्यौरा रखते हैं, इस समस्या का समाधान कैसे किया जाए, इसके लिए कोई रास्ता नहीं सूझ रहा हैं। लोग निजी सभाएं करते हैं पर इसका कोई फायदा नहीं होता है।

परंपरावादी पारसी कहते हैं कि समुदाय से बाहर जन्म लेने वाले किसी व्यक्ति का समुदाय में सम्मिलित होना लगभग असंभव है। वे इस बात पर भी जोर देते है कि गैर पारसी महिला से विवाह करने वाले पारसी पुरुष के बच्चे समुदाय में शामिल नहीं हो सकते, जबकि महिलाओं के लिए यह नियम लागू नहीं है। सुधारवादी इस परंपरा को स्त्री-पुरुष दोनों के लिए खोलना चाहते हैं।

मुंबई निवासी विस्पी वाडिया और केरेसी वाडिया इन उदारवादी लोगों में शामिल हैं। वे एक अग्नि मंदिर बनवा रहे हैं। यह मंदिर उन लोगों के लिए खुला रहेगा, जो पारसी धर्म के बाहर विवाह करते हैं। परंपरावादियों से क्षुब्ध केरेसी वाडिया कहते हैं, उन्होंने हमारे महान धर्म को मात्र 69,000 लोगों के छोटे से क्लब में समेट कर रख दिया है। एसोशिएशन फॉर रिवाइवल ऑफ जोराष्टि्रंयन के इस संस्थापक का कहना है, मैं चाहता हूं कि मेरा धर्म भारत में जीवित रहे। मुझे लगता है कि चाहे पारसी समुदाय रहे या न रहे, जरथुस्ट्र पर विश्वास करने वालों का अस्तित्व बना रहेगा।

विस्पी वाडिया के अनुसार 18 पारसी पुजारी उनकी अग्नि मंदिर परियोजना का भाग बनने के लिए तैयार हो गए है। वे बताते है कि धर्म से बाहर विवाह करने वाले 120 लोगों का मंदिर में स्वागत किया जाएगा। विस्पी कहते है, मेरे लिए नस्ल से अधिक धर्म महत्वपूर्ण है। पारसी समुदाय ने भी इस तरह से सोचना शुरू कर दिया है।

यदि इस रस्सी का एक सिरा वाडिया ने पकड़ रखा है तो दूसरा सिरा खोजस्टे मिस्त्री जैसे लोगों के हाथ में है। पेशे से चार्टर्ड एकाउण्टेट और जोराष्टि्रंयन स्टडीज इंस्टीट्यूट के संस्थापक मिस्त्री कट्टर परंपरावादी हैं। वे कहते है, मुझे लगता है कि हमें भारत की जगह पारसियों का पूरे विश्व में वितरण देखना चाहिए। आज पारसी समुदाय के लोग भारत से अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और मध्य-पूर्व की ओर पलायन कर रहे है। बीते 18 सालों में भारत में केवल 2,000 पारसी ही कम हुए है लेकिन इनसे कहीं अधिक विदेशों में पलायन कर गए होंगे। हो सकता है कि भारत में पारसी समुदाय में थोड़ी सी कमी आई हो, लेकिन इसका समाधान धर्मान्तरण नहीं है। यह रक्त की शुद्धता ही है जिसने हमारे धर्म को 35,000 सालों से जिंदा रखा है![1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. विलुप्त होने के कगार पर पारसी समुदाय (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) जागरण याहू इंडिया। अभिगमन तिथि: 5 अगस्त, 2011।
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