महाभारत आदि पर्व अध्याय 139 श्लोक 71-84

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एकोनचत्‍वारिंशदधिकशततम (139) अध्‍याय: आदि पर्व (सम्भाव पर्व)

महाभारत: आदि पर्व: >एकोनचत्‍वारिंशदधिकशततम अध्‍याय: श्लोक 71-84 का हिन्दी अनुवाद

राजा अपने हृदय से अहंकार को निकाल दे। चित्त को एकाग्र रक्‍खे। सब से मधुर बोले। दूसरों के दोष प्रकाशित न करे। सब विषयों पर दृष्टि रक्‍खे और शुद्ध चित्त हो द्विजों के साथ बैठकर मंत्रणा करे । राजा यदि संकट में हो तो कोमल या भयंकर –जिस किसी भी कर्म के द्वारा उस दुरवस्‍था से अपना उद्धार करे; फि‍र समर्थ होने पर धर्म का अचारण करे । कष्ट सहे बिना मनुष्‍य कल्‍याण का दर्शन नहीं करता। प्राण-संकट में पड़कर यदि वह पुन: जीवित रह जाता है तो अपना भला देखता है। जिसकी बुद्धि संकट में पड़कर शोकाविभूत हो जाय, उसे भूतकाल की बातें (राजा नल तथा श्रीरामचन्‍द्रजी आदि के जीवन का वृत्तान्‍त) सुनाकर सांत्‍वना दे। जिसकी बुद्धि अच्‍छी नहीं है, उसे भविष्‍य में लाभ की आशा दिलाकर तथा विद्वान् पुरुष को तत्‍काल ही धन आदि देकर शांत करे । जैसे वृक्ष के ऊपर की शाखा पर सोया हुआ पुरुष जब गिरता है, तब होश में आता है उसी प्रकार जो अपने शत्रु के साथ संधि करके कृतकृत्‍य की भांति सोता (निश्चिंत हो जाता) है, वह शत्रु से धोखा खाने पर सचेत होता है । राजा को चाहिये कि वह दूसरों के दोष प्रकाशित न करके अपनी गुप्त मंत्रणा को सदा छिपाये रखने की चेष्टा करे। दूसरों के गुप्तचरों से तो अपने आकार तक को (क्रोध और हर्ष आदि को सूचित करने वाली चेष्टा तक को) गुप्त रक्‍खे; परंतु अपने गुप्तचर से सदा अपनी गुप्त मंत्रणा की रक्षा करे । राजा मछली मारों की भांति दूसरों के मर्म विदीर्ण किये बिना, अत्‍यन्‍त क्रूर कर्म किये बिना तथा बहुतों के प्राण लिये बिना बड़ी भारी सम्‍पत्ति नहीं पाता । जब शत्रु की सेना दुर्बल, रोग ग्रस्‍त, जल या कीचड़ में फंसी, भूख-प्‍यास से पीड़ित और सब ओर से विश्वस्‍त होकर निष्‍चेष्ट पड़ी हो, उस समय उस पर प्रहार करना चाहिये । धनवान् मनुष्‍य किसी धनी के पास नहीं जाता। जिसके सब काम पूरे हो चुके हैं, वह किसी के साथ मैत्री निभाने की चेष्टा नहीं करता; अत: अपने द्वारा सिद्ध होने वाले दूसरों के कार्य ही अधूरे रख दें (जिससे अपने कार्य के लिये उनका आना-जाना बना रहे) । ऐश्वर्य की इच्‍छा रखने वाले राजा को दूसरों के दोष न बताकर सदा आवश्‍यक सामग्री के संग्रह और शत्रुओं के साथ विग्रह (युद्ध) करने का प्रयत्न करते रहना चाहिये; साथ ही यत्‍न पूर्वक अपने उत्‍साह को बनाये रखना चाहिये । मित्र और शत्रु किसी को भी यह पता न चले कि राजा कब क्‍या करना चाहता है। कार्य के आरम्‍भ अथवा समाप्त हो जाने पर ही (सब) लोग उसे देखें । जब तक अपने ऊपर भय आया न हो तब तक डरे हुए की भांति उसको टालने का प्रयत्न करना चाहिये; पंरतु जब भय को सामने आया देखें, तब निडर होकर शत्रु पर प्रहार करना चाहिये । जो मनुष्‍य दण्‍ड के द्वारा वश में किये हुए शत्रु पर दया करता है, वह मौत को ही अपनाता है- ठीक उसी तरह जैसे खच्चरी गर्भ के रुप में अपनी मृत्‍यु को ही उदर में धारण करती है । जो कार्य भविष्‍य में करना हो, उस पर बुद्धि से विचार करें और विचारने के पश्चात तदनुकूल व्‍यवस्‍था करें । इसी प्रकार जो कार्य सामने उपस्थित हो, उसे भी बुद्धि से विचार कर करे। बुद्धि से निश्चय किये बिना किसी भी कार्य या उद्देश्‍य का परित्‍याग न करे ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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