महाभारत द्रोण पर्व अध्याय 137 श्लोक 38-53

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षट्त्रिंशदधिकशतकम (136) अध्याय: द्रोण पर्व (जयद्रथवध पर्व)

महाभारत: द्रोण पर्व: षट्त्रिंशदधिकशतकम अध्याय: श्लोक 38-53 का हिन्दी अनुवाद

धनुर्धर भीमसेन के उस महानाद को सुनकर बुद्धिमान् धर्मराज युणिष्ठिर को बड़ी प्रसन्नता हुई। राजन् ! तब प्रसन्न चित्त होकर युधिष्ठिर ने वाद्यों की गम्भीर ध्वनि के द्वारा भाई के उस सिंहनाद को स्वागत पूर्वक ग्रहण किया। इस प्रकार भीमसेन को अपनी प्रसन्नता का संकेत करके सम्पूर्ण शस्त्र धारियों में श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने बड़े हर्ष के साथ रण भूमि में द्रोणाचार्य पर आक्रमण किया। महाराज ! आपके इकतीस ( दुःशल को लेकर बत्तीस ) पुत्रों को मारा गया देखकर दुर्योधन को विदुर जी की कही हुई बात याद आ गयी। विदुर जी ने जो कल्याणकारी वचन कहा था, उसके अनुसार ही यह संकट प्राप्त हुआ है। ऐसा सोचकर आपके पुत्र से कोई उत्तर देते न बना। द्यूत के समय कर्ण के साथ आपके मन्दमति पुत्र दुर्बुद्धि दुर्योधन ने पान्चाल राजकुमारी द्रौपदी को सभा में बुलाकर उसके प्रति जो दुर्वचन कहा था तथा प्रजा नाथ ! महाराज ! पाण्डवों और आपके सामने समस्त कौरवों के सुनते हुए कर्ण ने सभा में द्रौपदी के प्रति जो यह कठोर वचन कहा था कि ‘कृष्णे ! पाण्डव नष्ट हो गये। सदा के लिये नरक में पड़ गये। तू दूसरा पति कर ले’, उसी अन्याय का आज यह फल प्राप्त हुआ है।आपके पुत्रों ने जो पाण्डवों को कुपित करने के लिये षण्ढतिल ( सारहीन तिल या नपुंसक ) आदि कठोर बातें उन महामनस्वी पाण्डवों को सुनायी थीं, उसके कारण पाण्डु पुत्र भीमसेन के हृदय में तेरह वर्षों तक जो क्रोधाग्नि धधकती रही है, उसी को निकालते हुए भीमसेन आपके पुत्रों का अन्त कर रहे हैं।
भरत श्रेष्ठ ! विदुर जी ने आपके समीप बहुत विलाप किया, परंतु उन्हें शान्ति की भिक्षा नहीं प्राप्त हुई। आपके उसी अन्याय का फल प्रकट हुआ है। अब आप पुत्रों सहित इसे भोगिये। आप वृद्ध हैं, वीर हैं, कार्य के तत्त्व और प्रयोजन को देखते और समझते हैं, तो भी आपने हितैषी सुहृदों की बातें नहीं मानी। इसमें दैव ही प्रधान कारण है। अतः नरश्रेष्ठ ! आप शोक न कीजिये। इसमें आपका ही महान् अन्याय कारण है। मैं तो आपको ही आपके पुत्रों के विनाश का मुख्य हेतु मानता हूँ। राजेन्द्र ! विकर्ण मारा गया। पराक्रमी चित्रसेन को भी प्राणों का त्याग करना पड़ा। आपके पुत्रों में जो प्रमुख थे, वे तथा अन्य महारथी भी काल के गाल में चले गये। महाराज ! भीमसेन ने अपने नेत्रों के सामने आये हुए जिन - जिन पुत्रों को देखा, उन सबको तुरंत ही मार डाला। आपके ही कारण मैंने भीमसेन और कर्ण के छोड़े हुए हजारों बाणों से राजाओं की विशाल सेना दग्ध होती देखी है।

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्व के अन्तर्गत जयद्रथ वध पर्व में भीमसेन का युद्ध विषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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