महाभारत द्रोण पर्व अध्याय 139 श्लोक 62-78

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एकोनचत्वारिंशदधिकशतकम (139) अध्याय: द्रोण पर्व (जयद्रथवध पर्व)

महाभारत: द्रोण पर्व: एकोनचत्वारिंशदधिकशतकम अध्याय: श्लोक 62-78 का हिन्दी अनुवाद

क्रोध में भरे हुए सूत पुत्र कर्ण ने अपने अस्त्रों की माया से तथा झुकी हुई गाँठ वाले बाणों द्वारा युद्ध परायण भीमसेन के दो तरकसों, धनुष की प्रत्यंचा, बागडोर तथा घोड़े जोतने की रस्स्यिों को भी युद्ध स्थल में काट डाला। फिर घोड़ों को भी मारकर सारथि को पाँच बाणों से घायल कर दिया। सारथि वहाँ से भागकर तुरंत ही युधामन्यु के रथ पर चढ़ गया। इधर क्रोध में भरे हुए काष्ठााग्नि के समान तेजस्वी राधा पुत्र कर्ण ने भीमसेन का उपहास सा करते हुए उनकी ध्वजा और पताका को भी काट गिराया। धनुष कट जाने पर कुपित हुए महाबाहु भीमसेन ने शक्ति हाथ में ली और उसे घुमाकर कर्ण के रथ पर दे मारा। कर्ण कुछ थक सा गया था, तो भी उसने बहुत बड़ी उल्का के समान अपनी ओर आती हुई उस सुवर्ण भूषित शक्ति को दस बाणों से काट दिया। मित्र के हित के लिये विचित्र युद्ध करने वाले तथा बाण प्रहार में तत्पर सूत पुत्र कर्ण के तीखे बाणों से दश टुकड़ों में कटकर वह शक्ति धरती पर गिर पड़ी। तब कुन्ती कुमार भीमसेन ने युद्ध में सम्मुख मृत्यु अथवा विजय इन दो में से एक का निश्चित रूप से वरण करने की इचछा रखकर ढाल और सुवर्ण भूषित तलवार हाथ में ले ली।
भारत ! उस समय क्रोध में भरे हुए कर्ण ने हँसते हुए से वेग पूर्वक बहुत से अत्यंत भयंकर बाण मारकर भीमसेन की चमकीली ढाल नष्ट कर दी। महाराज ! ढाल और रथ से रहित हुए भीमसेन ने क्रोध से आतुर हो बड़ी उतावली के साथ कर्ध के रथ पर तलवार घुमा कर चला दी। राजेन्द्र ! वह बड़ी तलवार आकाश से कुपित सर्प की भाँति आकर सूत पुत्र कर्ण के प्रत्यन्चा सहित धनुष को काअती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी । यह देख अधिरथ पुत्र कर्ण ठठाकर हँस पड़ा और समरांगण में कुपित हो उसने शत्रुविनाशकारी सुदृढ़ प्रत्यन्चा वाला अत्यन्त वेगशाली दूसरा धनुष हाथ में लेकर उस पर कुन्ती पुत्र के वध की इच्छा से सुवर्णमय पंख वाले सहस्त्रों अत्यनत तीखे बाणों का संधान किया। कर्ण के धनुष से छूटे हुए बाणों द्वारा घायल किये जाते हुए बलवान् भीमसेन कर्ण के मन में व्यथा उत्पन्न करते हुए उसे पकड़ने के लिये आकाश में उछले। संग्राम में विजय चाहने वाले भीमसेन का वह चहरत्र देख राधा पुत्र कर्ण ने अपना अंग सिकोड़कर भीमसेन के आक्रमण को विफल कर दिया। कर्ण की सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो गयीं थीं। वह रथ के पिछले भाग में दुबक गया था। उसे उस अवस्था में देखकर भीमसेन उसके ध्वज का सहारा लेकर पृथ्वी पर खड़े हो गये। जैसे गरुड़ सर्प को दबोच लेते हैं, उसी प्रकार भीमसेन ने कर्ण को उसके रथ से पकड़ ले जाने की जो इच्छा की थी, उनके इस कर्म की समसत कौरवों तथा चारणों ने भी प्रशंसा की। धनुष कट जाने तथा रथहीन होने पर स्वधर्म का पालन करते हुए भीमसेन अपने रथ को पीछे करके युद्ध के लिये ही खड़े रहे।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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