महाभारत मौसल पर्व अध्याय 5 श्लोक 1-15

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पञ्चम (5) अध्याय: मौसल पर्व

महाभारत: मौसल पर्व: पञ्चम अध्याय: श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद
अर्जुन का द्वारका में आना और द्वार का तथा श्रीकृष्ण -पत्नियों की दशा देखकर दुखी होना

वैशम्पायन जी कहते हैं- जनमेजय ! दारूकने भी कुरूदेश में जाकर महारथी कुन्ती कुमारों का दर्शन कियाऔर उन्हें यह बताया कि समस्त वृष्णि वंशी मौसल युद्ध में एक-दूसरे के द्वारा मार डाले गये। वृष्णि, भोज, अन्धक और कुकुर वंश के वीरों का विनाश हुआ सुनकर समस्त पाण्डव शोक से संतप्त हो उठे । वे मन-ही-मन संत्रस्त हो गये। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण के प्रिय सखाअर्जुन अपने भाइयों से पूछकर मामा से मिलने के लिये चल दिये और बोले -‘ऐसा नहीं हुआ होगा (समस्त यदुवंशियों का एक साथ विनाश असम्भव है)’। प्रभो ! दारूक के साथ वृष्णियों के निवास स्थान पर पहुँच कर वीर अर्जुन देखा कि द्वारका नगरी विधवा स्त्री की भाँति श्रीहीन हो गयी है। पूर्वकाल में लोकनाथ श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित होने के कारण जो सबसे अधिक सनाथा थीं, वे ही भगवान श्रीकृष्ण की सोलह हजार अनाथा स्त्रियाँ अर्जुन को रक्षक के रूप् में आया देख उच्च स्वर से करूण क्रन्दन करने लगीं। वहाँ पधारे हुए अर्जुन को देखते ही उन स्त्रियों का आर्तनाद बहुत बढ़ गया। उन सब पर दृष्टि पड़ते ही अर्जुन की आँखों में आँसू भर आये । पुत्रों और श्रीकृष्ण से हीन हुई उन अनाथ अबलाओं की ओर उन से देखा नहीं गया। द्वारका पुरी एक नदी के समान थी । वृष्णि और अन्धक वंश के लोग उस के भीतर जल के समान थे । घोड़े मछली के समान थे । रथ नावका काम करते थे । वाद्यों की ध्वनि और रथ की घरघराहट मानो उस नदी के बहते हुए जल का कलकल नाद थी । लोगों के घर ही तीर्थ एवं बड़े-बड़े जलाशय थे । रत्‍नों की राशि ही वहाँ सेवारसमूह के समान शोभा पाती थी । वज्र नामक मणि की बनी हुई चहारदीवारी ही उसकी तटपंक्ति थी । सड़कें और गलियाँ उसमें जल के सोते और भँवरें थीं, चौराहे मानो उस के स्थिर जल वाले तालाब थे । बलराम और श्रीकृष्ण उसके भीतर दो बड़े-बड़े ग्राह थे । कालपाश ही उसमें मगर और घड़ियाल के समान था । ऐसी द्वारका रूपी नदी को बुद्धिमान अर्जुन ने वृष्णि वीरों से रहित हो जाने के कारण वैतरणी के समान भयानक देखा । वह शिशिर काल की कमलिनी के समान श्रीहीन तथा आनन्द शून्य जान पड़ती थी। वैसी द्वारका को और उन श्रीकृष्ण की पत्नियों को देखकर अर्जुन आँसू बहाते हुए फूट-फूटकर रोने लगे और मूर्च्छित होकर पृथ्वी परगिर पड़े। प्रजानाथ ! तब सत्राजित् की पुत्री सत्यभामा तथा रूक्मिणी आदि रानियाँ वहाँ दौड़ी आयीं और अर्जुन को घेरकर उच्च स्वर से विलाप करने लगीं। तदनन्तर अर्जुन को उठाकर उन्होंने सोने की चौकीपर बिठाया और उन महात्मा को घेरकर बिना कुछ बोले उन के पास बैठ गयीं । उस समय अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए उनकी कथा कही और उन रानियों को आश्वासन देकर वे अपने मामा से मिलने के लिये गये।

इस प्रकार श्रीमहाभारत मौसल पर्व में अर्जुन का आगमन विषयक पाँचवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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