वज्जिका

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वज्जिका
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 10
पृष्ठ संख्या 374-375
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक रामप्रसाद त्रिपाठी
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1975 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख संपादक अजित शुकदेव
संदर्भ ग्रंथ पुरातत्व निबंधावली : राहुल सांकृत्यायन; Linguistic Survey of India Gr. Vol V, Part II )

वज्जिका (भाषा अौर साहित्य) उत्तर बिहार के उस क्षेत्र की भाषा है जहाँ भगवान्‌ महावीर अौर बुद्ध की जन्मभूमि एवं कर्मभूमि थी तथा प्रथम गणतंत्रात्मक वज्जिसंघ का राज्य था। अत: वज्जिका की प्राचीनता एवं गरिमा वैशाली गणतंत्र के साथ जुड़ी हुई है अौर इसका पतन भी वैशाली के पतन के साथ ही साथ हो गया था। यह भाषा लोककंठ में ही जीवित रही है, लिखित साहित्य के रूप में नहीं, ऐसा भी संभव है कि इसका लिखित साहित्य विनष्ट हो गया हो, जैसा प्राकृत अपभ्रंश के बहुतेरे ग्रंथों के साथ हुआ। वज्जिका के स्वरूप का दशर्न बौद्ध-जैन-साहित्य से लेकर संतसाहित्य तक देखा जा सकता है।

इस भाषा के स्वतंत्र अस्तित्व की अोर संकेत करने वाले राहुल संकृत्यायन थे, जिन्होंने अपने लेख 'मातृ भाषाओं की समस्या' में भोजपुरी मैथिली, मगही अौर अंगिका के साथ साथ वज्जिका को हिंदी के अंतर्गत जनपदीय भाषा के रूप में स्वीकृत किया। (पुरातत्व निबंधावली, पृ. 12, 241) ग्रियर्सन ने कभी इसे पश्चिम मैथिली कहा, कभी मैथिली भोजपुरी। ग्रियर्सन ने स्थूल दृष्टि से वज्जिका के क्रियापदों में 'छ' देखकर इसकी मैथिली समझ लिया। वज्जिका अौर मैथिली के इस क्रियापाद में अंतर है; जैसे - अावि रहल अछि ( मैथिली ) अबइछी (वज्जिका ) अौर जहाँ इस क्रियापद का प्रयोग मैथिली में भूत अौर वर्तमान काल में होता हैं वहाँ वज्जिका में केवल वर्तमान काल में ही। क्रियापदों का छयुक्त रूप से भिन्न रूप देखकर उन्होंने भोजपुरी मान लिया।लेकिन उन्हें कहाँ पाता था कि भोजपुरी भाषा में बहुवचनबोध चिह्र या प्रत्यय नि, न, न्ह होते हैं परंतु वज्जिका में नि के स्थान पर 'नी' का प्रयोग होता है तथा अन्य दोनों चिह्र एकदम नहीं पाए जाते। फिर वो अागे लिखते हैं - 'मैंने सेवेन ग्रामर्स अॉव दि बिहारी लैंग्वेजेज, भाग दो में इसे भोजपुरी का एक भेद बताया था, किंतु वर्तमान सर्वेक्षण में इसे मैथिली की भाषा इसलिए बता रहा हूँ कि जिस क्षेत्र में वह बोली जाती है वह ऐतिहासिक दृष्टि से प्राचीन मिथिला राज्य के अंतर्गत है।'

मैथिली अौर भोजपुरी भाषा के रूप

डॉ. जयकांत मिश्र अौर डॉ. उदयनारायण तिवारी ने क्रमश: मैथिली अौर भोजपुरी में चार-चार रूपों को स्वीकार किया है- अत्ह्रिस्व, ह्रस्व, अतिदीर्घ, दीर्घ; जैसे घोर, घोरा, घोरवा अौर घोरउआ। लेकिन वज्जिका में अत्ह्रिस्व अौर अतिदीर्घ दोनों ही रूप नहीं पाए जाते। इस प्रकार इस भाषा की प्रकृति परवर्ती भाषाओं के साथ कुछ मेल खाते हुए भी एकदम भिन्न है। इस भाषा के स्वतंत्र अस्तित्व अौर सत्ता को स्वीकार करते हुए जगदीशचंद्र माथुर अौर गणेश चौबे ने तो यहाँ तक कहा है कि थारू भाषा की वज्जिका ही है। डॉ. सियाराम तिवारी के अनुसार वज्जिका क्षेत्र के उत्तर में नेपाल, दक्षिण में गंगा नदी, पश्चिम में सारण अौर चंपारण के भाग अौर पूर्व में दरभंगा जिला है।

रचनाएँ

इस भाषा में गयाधर, हलदर दास, मँगनीराम अादि की कुछ रचनाएँ प्राप्त हुई हैं, जहाँ से वज्जिका भाषा का साहित्य प्रारंभ होता है। गयाधर का रचनाकाल 1045 ई. माना जाता है। ये वैशाली के रहनेवाले थे अौर बौद्ध-धर्म के प्राचारार्थ तिब्बत गए थे। इनकी कोई ठोस रचना अभी नहीं मिली है। हलधर दास का समय 1565 ई. ठहराता है, जिनका लिखा हुआ एक खंडकाव्य सुदामाचरित्र प्राप्त है, जो संपूर्ण वज्जिका में लिखा गया है। कहा जाता है इन्होंने बहुत सी रचनाएँ वज्जिका में की थीं। लेकिन अभी अौर कोई रचना इनकी मिली नहीं है। मँगनीराम का जीवनकाल 1815 ई. के अासपास माना जाता है। जिनकी तीन पुस्तकें - मँगनीराम की साखी, रामसागर पोथी अौर अनमोल रतन मिली हैं। इनके अलावा इनके भजन अौर साखी जनता में प्रचलित हैं, जिनका संकलन संपादन अभी नहीं हो पाया है।

वज्जिका भाषा के साहित्य का दूसरा अध्याय 20वीं शताब्दी से शुरु होता है। इस काल में बहुत सी रचना साहित्य के विभिन्न अंगों पर लिखी गई हैं अौर लिखी जा रही हैं। रामसंजीवन सिंह द्वारा लिखित बुद्ध वैशालिक वज्जिका भाषा का सरस एवं सफल काव्य है, जो वज्जिका भाषा की काव्यात्मकता की सफलता का द्योतक है। डा. अजितनारायण सिंह तोमर का कहानी संग्रह -'परछत के परमाण की' वज्जिका भाषा साहित्य की कहानी विधा को गौरवान्वित करता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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