श्रीमद्भागवत महापुराण दशम स्कन्ध अध्याय 69 श्लोक 40-45

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दशम स्कन्ध: एकोनसप्ततितमोऽध्यायः(69) (उत्तरार्ध)

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कन्ध: एकोनसप्ततितमोऽध्यायः श्लोक 40-45 का हिन्दी अनुवाद

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा—देवर्षि नारदजी! मैं ही धर्म का उपदेशक, पालन करने वाला और उसका अनुष्ठान करने वालों का अनुमोदनकर्ता भी हूँ। इसलिये संसार को धर्म की शिक्षा देने के उद्देश्य से ही मैं इस प्रकार धर्म आचरण करता हूँ। मेरे प्यारे पुत्र! तुम मेरी यह योगमाया देखकर मोहित मत होना । श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण गृहस्थों को पवित्र करने वाले श्रेष्ठ धर्मों का आचरण कर रहे थे। यद्यपि वे एक ही हैं, फिर भी आचरण कर रहे थे। यद्यपि वे एक ही हैं, फिर भी देवर्षि नारदजी ने उनको उनकी प्रत्येक पत्नी के महल में अलग-अलग देखा ।

भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति अनन्त है। उनकी योगमाया परम ऐश्वर्य बार-बार देखकर देवर्षि नारद के विस्मय और कौतूहल की सीमा न रही । द्वारका में भगवान श्रीकृष्ण गृहस्थ की भाँति ऐसा आचरण करते थे, मानो धर्म, अर्थ और कामरूप पुरुषार्थों में उनकी बड़ी श्रद्धा हो। उन्होंने देवर्षि नारद का बहुत सम्मान किया। वे अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान का स्मरण करते हुए वहाँ से चले गये । राजन्! भगवान नारायण सारे जगत् के कल्याण के लिये अपनी अचिन्त्य महाशक्ति योगमाया को स्वीकार करते हैं और इस प्रकार मनुष्यों की-सी लीला करते हैं। द्वारकापुरी में सोलह हजार से भी अधिक पत्नियाँ अपनी सलज्ज एवं प्रेमभरी चितवन तथा मन्द-मन्द मुसकान से उनकी सेवा करती थीं और वे उनके साथ विहार करते थे । भगवान श्रीकृष्ण ने जो लीलाएँ की हैं, उन्हें दूसरा कोई नहीं कर सकता। परीक्षित्! वे विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के परम कारण हैं। जो उनकी लीलाओं का गान, श्रवण और गान-श्रवण करने वालों का अनुमोदन करता है, उसे मोक्ष के मार्गस्वरुप भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में परमप्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाती है ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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