अनुशयबौद्ध
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अनुशयबौद्ध
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| पुस्तक नाम | हिन्दी विश्वकोश खण्ड 1 |
| पृष्ठ संख्या | 127 |
| भाषा | हिन्दी देवनागरी |
| संपादक | सुधाकर पाण्डेय |
| प्रकाशक | नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी |
| मुद्रक | नागरी मुद्रण वाराणसी |
| संस्करण | सन् 1973 ईसवी |
| उपलब्ध | भारतडिस्कवरी पुस्तकालय |
| कॉपीराइट सूचना | नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी |
| लेख सम्पादक | दलसुख डी. मालवणियां । |
अनुशयबौद्ध परिभाषा के अनुसार संसार का मूल अनुशय है।
(1) रागतृष्णा,
(2) प्रतिघद्वेष,
(3) मान,
(4) अविद्या विद्या का विरोधी तत्व,
(5) दृष्टिविशेष प्रकार की मान्यता या दर्शन, जैसे सत्कादृष्टि मिथ्यादृष्टि आदि,
(6) विचिकित्सासंशय, ये छह 'अनुशय' हैं।
ये ही अनुशय संयोजन, बंधन ओघ, आस्रव आदि शब्दों द्वारा भी व्यक्त किए गए हैं। अन्य दर्शनों में वासना, कर्म, अपूर्व, अदृष्ट, संस्कार आदि नाम से जिस तत्व को बोध होता है उसे बौद्धों ने अनुशय कहा है। अनुशय की हानि का उपाय विशेष रूप से बौद्धों ने बताया है।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
सं.ग्रं.-अभिधर्मकोश, पंचम कोषस्थान।