गणितीय प्रतिरूप

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लेख सूचना
गणितीय प्रतिरूप
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 3
पृष्ठ संख्या 365
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पांडेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1976 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक हरिश्चंद्र गुप्त

गणितीय प्रतिरूप गणितीय संकल्पनाओं से मानव का सर्वप्रथम परिचय कदाचित्‌ बालकोपयोगी ढेलों के डिब्बे के रूप में हुआ यदि ऐबाकस (गिनने की गोलियों का चौखटा) से शिशु मस्तिष्क में गणितीय मनोभावों को कुछ अंश तक उत्तेजना मिलती है तो घनाकार गिट्टकों से, जिनसे शिशुपालन गृह (Nursery) वाले प्रहेलिका चित्र बनते हैं, और घन, समपार्श्व, बेलन आदि आकारों के ठोसों के संग्रह से, जिनसे उसी काल की निर्माणमंजूषा बनती है, अवश्य शिशु मस्तिष्क की सुप्त गणितीय मन:शक्ति किसी अंश तक जागृत होती है। बालक को आरंभ में यह बताया जाता है कि घन, समपार्श्व आदि में से विशेष गुण हैं जिनके कारण उन्हें समुचित संख्याओं और क्रमविन्यास में रखने पर अत्यंत मनमोहक वास्तुकलात्मक वस्तुएँ बन सकती हैं। यही नहीं, इन प्रतिरूपों द्वारा क्रियावान पुरु ष के उन गणितीय संकल्पनाओं का बोध कराया जा सकता है जो गणित की अपूर्व प्रतिभावाले व्यक्ति के लिए स्वत: बोधगम्य हों। उदाहरणत: लंब समपार्श्व का तीन समान आयतन वाले सूचीस्तंभो में विभाजन प्रतिरूप द्वारा छात्रों की समझ में सरलता से आ जाता है।

बिना प्रतिरूपों का आश्रय लिए समतल ज्यामितीय का ज्ञान एक प्रकार से मस्तिष्क को समतलीय कर देता है और उनमें ऐसी विचारधारा पैदा कर देता है कि आगे चलकर गणित में त्रिविमितीय ज्यामिति का समझना उसके लिए दुर्घट हो जाता है।

समतल रेखागणित-----यूक्लिड के कुछ आरंभिक संस्करणों में ऐसे रेखाचित्र खीचे रहते थे जिन्हें काटकर और मोड़कर रेखागणित के तथ्यों को समझने में सहायता मिलती थी और सन्‌ 1752 को कौली की न्यू ऐंड मेथॉडिकल एक्स्प्लेनेशंस ऑव दि एलिमेंटस ऑव ज्योमेट्री (रेखागणित के मूल तत्वों की नई और विधिमय व्याख्याएँ) नामक कृति में विभिन्न प्रतिरूपों को बनाने के लिए गत्ते के कटे टुकड़ों का भी सन्निवेश था। हर्बर्ट स्पेंसर जैसे प्रतिभावान विचारक और दार्शनिक ने अपने पिता को लिखे एक पत्र में प्रतिरूप के लाभों की चर्चा की थी।

प्रेरणाभूत (इंट्यूटिव) रेखागणित-----जैसा पहले कहा जा चुका है, प्रतिरूपों द्वारा रेखागणित के तथ्य बोधगम्य हो जाते हैं। यही नहीं, प्राय: उनकी सहायता से नए गणितीय तथ्यों को छात्र स्वयं ज्ञात कर सकता है। उदाहरणार्थ, एक ही परिमापवाले विभिन्न भुजाओं के त्रिभुज एक समान गत्ते से काटकर और उन्हें तौलकर छात्र यह तथ्य खोज सकता है कि दी हुई परिमापवाले त्रिभुजों में समबाहु त्रिभुज का क्षेत्रफल सबसे अधिक होता है, इसी प्रकार वह यह भी खोज सकता है कि दिए हुए पृष्ठीय क्षेत्रफल वाले चतुष्फलकों में समचतुष्फलक सबसे बड़े आयतन का होता है।

बहुफलक----कुछ मनोरंजक तिर्यकछिन्न समबाहु फलकों के प्रति रूप बनाने की विधि यह है : किसी दफ्ती या कड़े कागज पर एक सम षड्भुज खींचे और इसकी प्रत्येक भुजा पर ऐसा ही षड्भुज खींचे। इन सात षड्भुजों से घिरे हुए क्षेत्र की परिसीमा में 18 भुजाएँ हैं। इनके अनुदिश तेज चाकू या ब्लेड से काट कर इस क्षेत्र को अलग कर ले। फिर इस क्षेत्र से बीचवाला षड्भुज भी काट कर अलग कर दें। अब हर जोड़ी षड्भुजों की उभयनिष्ठ कोरों में से पाँच को भीतर से आधी दूर तक काट दें और शेष अर्धभाग में शिकन बना दें। छठी उभयनिष्ठ कोर को पूरा काट दें। अब यदि इस कटी हुई कोरवाले षड्भुजों को एक दूसरे के ऊपर संपाती कर दिया जाय तो बीच में समपंचभुजाकार छिद्र मिलेगा। यदि ऐसे सिरे के दो षड्भुजों को दूसरे सिरे के दो षड्भुजों पर संपाती कर दिया जाय तो वर्गाकार छिद्र मिलेगा। यदि सिरे के तीन षड्भुजों को संपाती कर दिया जाय तो समबाहु त्रिभुजाकार छिद्र मिलेगा। तीन सलंग्न षड्भुजों की मुक्त कोरों को सटाकर चिपका देने से भी समबाहु त्रिभुजाकार छिद्र मिलेगा। यदि त्रिभुजाकार छिद्रवाले वलय के एक सिरे पर कटा हुआ षड्भुज बैठा दिया जाय तो ऐसा तिर्यकछिन्न समचतुष्फलक मिलेगा। जिसके चारों शीर्षों पर से 4 छोटे समान समचतुष्फलक काट दिए गए हैं। वर्गाकार छिद्रवाले दो वलयों को इस प्रकार रखने पर कि वर्गाकार छिद्र के संमुखवाले भाग संपाती हो जायँ, वह तिर्यकछिन्न अष्टफलक बनता है जो सम अष्टफलक के शीर्षों से समान वर्गाधारवाले सूचीस्तंभ काटने पर मिलता है। पंचभुजाकर छिद्रवाले 12 वलयों को इस प्रकार रखने पर कि षड्भुज होते जाए, वह तिर्यकछिन्न समविंशातिफलक बनता है जिसके शीर्षों से समपंचभुजाकारवाले सूचीस्तंभ काट लिए गए हैं।

तिर्यकछिन्न अष्टफलकों को सटाकर अवकाश को उसी प्रकार भरा जा सकता है जैसे ईटोंं से। इस दशा में षड्भुज एक ऐसे समस्पंज अर्थात्‌ कुटिल (तिरछे skew) बहुफलक के फलक हो जाते हैं जिसके प्रत्येक शीर्ष पर चार षड्भुज है। इसी प्रकार तिर्यकछिन्न चतुष्फलकों से जो कुटिल बहुफलक बनता है उसके प्रत्येक शीर्ष पर छह षड्भुज रहते है इन दो के अतिरिक्त एक और प्रकार का कुटिल बहुफलक है जिसके प्रत्येक शीर्ष पर छह वर्ग रहते हैं। यह बहुफलक है जिसके प्रत्येक शीर्ष पर छहवर्ग रहते हैं। यह बहुफलक ऐसे घनवलयों से बन सकता है जिनमें दो सम्मुख फलक न हों। इस बहुफलक की घरी हो सकती है। इन तीनों कुटिल बहुफलकों के पाँच प्लेटोनीय ठोसों की भाँति फलक समभुज और कोण समान होते हैं।

प्रतिरूपों के लिए साम्रगी-----गणितीय प्रतिरूपों का प्रयोजन साध्यों की उपपत्ति देना नहीं होता, कवेल उन्हें समझने में सहायता देना और खोज की नई दिशाएँ सुझाना होता है। इसलिये उनका इतना यथार्थ होना आवश्यक नहीं जितना कि लेखाचित्रों और गणनाचित्रों (nomograms) का। तब भी प्रतिरूप यथासंभव सावधानी से और समूचित सामग्री से बनाए जाने चाहिए।

वर्णनात्मक रेखागणित----वर्णनात्मक रेखागणित, यथादर्शन (संदर्श, perspective) आदि के अध्ययन के लिए कब्जों से जुड़े हुए समतलों की जोड़ी, और कभी कभी संदर्भ के लिए तीसरे समतल का दिया रहना, एक लाभदायक युक्ति है। ऐसे घरी होनेवाले (Collapsible) समतलों में छिद्र करने पर समस्याओं का यथास्थिति अध्ययन और लंबप्रक्षेप की समस्याओं का स्पष्टीकरण हो जाता है।

काष्ठप्रतिरूप-----अनेक समस्याओं का स्पष्टीकरण काष्ठ के ठोस प्रतिरूपों की काट से हो जाता है। इसका एक जवलंत उदाहरण घन को छह समान चतुष्फलकों में इस प्रकार विभक्त करना है कि कोई नया शीर्ष न बने। इस प्रकार बने हुए चतुष्फलकों में तीन तीन सर्वांगसम हैं और एक त्रिक दूसरे का परावर्तित रूप है। प्रत्येक फलक समकोण त्रिभुज है।

एक और उदाहरण द्विपद घन का है, जिसमें एक बड़ा घन किन्हीं दो स्वेच्छा भुजाओं क और ख वाले घनों और ऐसे आयतनों से जिनकी विमितियाँ कxकx ख तथा कxखxख हैं, बन जाता है। वस्तुत: इस प्रकार सूत्र (क+ख) क3+ख3+3 क2ख+3 कख2 का प्रदर्शन हो जाता है।

शांकव गणित का अध्ययन, जो अधिकांश वैश्लेषिक विधि से किया जाता है, प्रतिरूप के प्रयोग द्वारा सरल ओर सुबोध हो जाता है। इस प्रतिरूप में केवल एक लंब वृत्ताधार शंकु के विभिन्न काट दिखाए जाते हैं। (1) यदि काटवाला समतल आधार के समांतर है तो काट वृत्त है, (2) यदि समतल आधार से थोड़ा झुका है, अर्थात अक्ष से अर्धशीर्ष कोण की अपेक्षा बड़ा कोण बनता है, तो काट दीर्घवृत्त हैं, (3) यदि समतल किसी जनक रेखा के समांतर है तो काट परवलय है और (4) यदि समतल अक्ष से अर्धशीर्ष कोण की अपेक्षा छोटा कोण बनाता है तो काट अपरिवलय की एक शाखा है (द्विशंकु अर्थात पूर्ण शंकु लेने पर दोनों शाखाएँ मिल जाती हैं)। यदि शंकु के भीतर दो गोले और इन गोलों को स्पर्श करता हुआ एक समतल बना दें तो इन गोलों के उभय स्पर्शी के बराबर एक तार द्वारा यह तथ्य सरलता से स्थापित किया जा सकता है कि समतल से गोलों के स्पर्शबिंदु उस दीर्घवृत की नाभियाँ हैं जो शंकु की काट से मिलता है।

वृत्तज वलय, बेलन और उनके अंतप्रवेश संबंधी समस्याएँ काष्ठ प्रतिरूपों की सहायता से सरलतापूर्वक उद्धृत की जा सकती है।

प्राविधिक निर्माण----सममित ठोस और परिक्रमज पृष्ठ खराद पर तैयार किए जा सकते हैं। जो पृष्ठ अक्ष के सापेक्ष सममित नहीं है उनका भी निर्माण समुचित खराद में, उत्केंद्र गति से चलनेवाले चक (Chuck) लगाकर, किया जा सकता है। इस प्रकार प्रतिरूप उच्च कोटि की सूक्ष्मता के बनाए जा सकते हैं, क्योंकि मशीन का काम सूक्ष्म मापों के साथ किया जा सकता है।

बहुत से पृष्ठों के प्रतिरूप मुड़े हुए स्थायी तारों से उनके मुख्य काट प्रदर्शित कर बनाए जा सकते हैं, किंतु कितने ही चक्करदार नम्य प्रतिरूप, छड़ों और पत्तियों में सिरों पर कीलें और कब्जे जड़कर, बनाए जा सकते हैं। इस प्रकार ऐसी यंत्ररचना की जा सकती है, जिसमें सतत रूपांतर कर संनाभि पृष्ठ प्राप्त किए जा सकते हैं।

डोरक प्रतिरूप-----ऋजु रेखाओं द्वारा जनन होनेवाले, अर्थात्‌ रेखज पृष्ठों के प्रतिरूप, सरलतापूर्वक बनाए जा सकते हैं, क्योंकि जनकों को क्रमिक ताने हुए डोरकों से निरूपति किया जा सकता है। उदाहरणत: दो समान वृत्तीय मंडलकों में पास पास समदूरस्थ छेद करें और उन्हें एक ही अक्ष पर इस प्रकार कसें कि एक स्थिर रहे और दूसरा अक्ष पर घुमाया जा सके। अब मंडलकों के संगत (जोड़ीदार) छिद्रों में से डोरक पिरोएँ। ऊपर के छिद्र से डोरक बँधा रहे और नीचवाले सिरे पर भार बधाँ रहे, जिससे डोरक सीधा रहे। जब मंडलकों में से डोरक स्वतंत्रतापूर्वक लटकते हैं तब डोरकों से बेलन का पृष्ठ बनता है। जब एक मंडलक को घुमाते हैं तब डोरकों से परिक्रम अतिपरवलयज का और सीमांत अवस्था में द्विशंकु का पृष्ठ बनता है।

दूसरा उदाहरण ऐसे प्रतिरूप का है जिससे समतल से आरंभ कर क्रमश: अतिपरवलयिक परवलयज के सभी रूप और अंत में द्विसमतल बनाए जा सकते हैं। इस प्रतिरूप को बनाने के लिये दो छड़ों में समदूरस्थ छेद करें। एक छड़ को स्थिर तथा दूसरी को एक ऐसे अक्ष से परित घूर्णनशील रखें, जो स्वयं भी स्थिर छड़ से विभिन्न कोणों पर झुक सकें। छिद्र युग्म से डोरक पिरोएँ। ये पृष्ठों के जनक हैं। घूर्णनशली छड़ को घुमाने से विभिन्न पृष्ठ प्राप्त होते हैं। यह बात ध्यान देने की है कि अति परवलयिक परवलयज धातु की समतल चादर को ऐंठने और मोड़ने से नहीं बनता। बेलन और शंकु जैसे पृष्ठों को, जो समतल से बनाए जा सकते हैं, उद्घाटनीय (developabale) कहते हैं।

अवकाश वक्र----व्यावृत्त (twisted) वक्रों के प्रतिरूप या तो तारों को समुचित रूप से मोड़कर या डोरकों से उनके स्पर्शियों को निरूपित कर बनाए जा सकते हैं। स्पर्शियों से एक उदघाटनीय पृष्ठ का जनन होता है। यह पृष्ठ आश्लेषी समतलों का अन्वालोप भी है।

कुंडलिनीय पृष्ठ----कुंडलिनीय पृष्ठों के प्रतिरूप तारों को मोड़कर बनाए जा सकते हैं। यदि जनक रेखाएँ और वक्र रेखाएँ विभिन्न रंगों की रहें तो स्पष्टता बढ़ जाती है। ये प्रतिरूप टीन पृष्ठों के छोटे छोटे टुकड़ों को कीलित करके भी बनाए जा सकते हैं। तारवाले प्रतिरूप अपेक्षया अधिक सस्ते और नम्य होते हैं।

12. गत्ते के प्रतिरूप----गत्ते के ऐसे वृत्त काटकर, जिनके व्यास नियमित रूप से क्रमश: बदलते हों, और उन्हें समदूरस्थ ऊर्ध्वाधर समतलों में रखकर द्वितीय वर्ण के सभी पृष्ठों (दीर्घवृत्तज, अतिपरवलयज, परवलयज आदि) के प्रतिरूप बनाए जा सकते हैं।[१]



टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सं. ग्रं.-----प्रोसीडिंग्ज़, लंडन मैथिमैटिकल सोसायटी (2), खंड 43, पृ. 33-62 (1937); स्क्रिप्टा मैथिमैटिका खंड 6, पृ. 240-244 (1939); एच. एस. एम. कोक्सटर पी. ड्यूवाल, एच. टी. फ्लेटर और जे. एफ. पैट्री : द फिफ्टिनाइन आइकोसेहैड्रा (टोरोंटो 1938); माइकल गोल्डबर्ग : पॉलिहेड्रल लिंकेज़ेज नैशनल मैथिमैटिक्स मैगज़ीन खंड 16, पृ. 1-10 (1942); एच. एम. कुंडी ऐंड ए. पी. रोलेट, मैथिमैटिकल मॉडेल्स (न्यूयार्क ऐंड लंडन, 1952)।