गन्ना

अद्‌भुत भारत की खोज
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लेख सूचना
गन्ना
पुस्तक नाम हिन्दी विश्वकोश खण्ड 2
पृष्ठ संख्या 23
भाषा हिन्दी देवनागरी
संपादक सुधाकर पाण्डेय
प्रकाशक नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
मुद्रक नागरी मुद्रण वाराणसी
संस्करण सन्‌ 1964 ईसवी
उपलब्ध भारतडिस्कवरी पुस्तकालय
कॉपीराइट सूचना नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी
लेख सम्पादक जगेश्वरगोपाल श्रीखंडे

ईख या गन्ना वस्तुत: घास की जाति का पौधा है जो साधारणत: दस बारह फुट लंबा होता है, परंतु 42 फुट तक लंबे पौधे भी देखे गए हैं। ईख में बाँस की तरह गाँठें होती हैं। प्रत्येक गाँठ पर खड्ग की भाँति दो-दो पत्तियाँ होती हैं। मोटाई में साधारण ईख लगभग एक इंच व्यास की होती है, परंतु तीन इंच व्यास तक की ईख भी उगाई गई है। तने में सफेद गूदा रहता है, जो मीठे रस से भरा रहता है। तने को पेरकर रस निकाला जाता है, जिससे गुड़ और चीनी बनती है। तना बाहर से हरा, पीला, बैगनी या लाल होता है। ईख की जन्मभूमि दक्षिण पूर्वी एशिया कही जाती है। भारत के प्राचीन ग्रंथों में भी ईख का वर्णन 'शर्करा' नाम से पाया जाता है। यों तो ईख का उत्पादन भारत के प्राय: सभी भागों में होता है, परंतु उत्तर प्रदेश, बिहार, पूर्वी पंजाब, बंबई और मद्रास में ईख की खेती अधिक मात्रा में की जाती है। उत्तर प्रदेश में तो ईख की फसल अधिकांश किसानों की आय का मुख्य साधन है। यहाँ प्रति वर्ष लगभग 30 लाख एकड़ भूमि में ईख बोई जाती है जो संपूर्ण भारत के ईख के क्षेत्रफल का 60 प्रतिशत है। इसी कारण यहाँ लगभग 12 लाख टन गुड़ और खाँड के अतिरिक्त 10 लाख टन चीनी बनाई जाती है, जो समस्त भारत में बनाई जानेवाली चीनी का लगभग 50 प्रतिशत है।

ईख की फसल बोआई के 10-12 महीने पश्चात्‌ तैयार होती है। बोने के लिए ईख के टुकड़ों या पैंड़ों का ही बीज के रूप में प्रयोग किया जाता है। ऐसे प्रत्येक पैंड़े पर तीन तीन कलियाँ या आँखें होनी चाहिए। प्रति एकड़ खेत की बोआई के लिए 14-15 हजार स्वस्थ एवं नीरोग तीन तीन आँखवाले पैंड़ों की आवश्यकता होती है, जो 40 से 60 मन तक ईख से प्राप्त किए जा सकते हैं।

ईख की उन्नतिशील जातियों को ही बोना चाहिए, क्योंकि देशी और अन्य पुरानी जातियों की अपेक्षा प्राय: उनकी उपज अधिक होती है। उनमें चीनी या गुड़ का पड़ता अधिक बैठता है और रोग भी कम लगते हैं। उत्तर प्रदेश में विभिन्न क्षेत्रों में बोई जानेवाली ईख की मुख्य मुख्य जातियाँ को. 312, को. 421, को.शा. 245, को.शा.321, को. 453, को. 356, को. 313, को.शा. 109 और को. 527 हैं। इनमें से को. 312, को. 421, को.शो. 321 और को. 453 जातियों की खेती अब बंद कराई जा रही है, क्योंकि इनमें अब अनेक प्रकार के रोग एवं अवगुण पैदा होने लगे हैं। इनके स्थान पर कुछ नई नई जातियाँ, जैसे को.शा. 510, को.395, को. 62403, को.शा. 611, को.शा. 541, को. 859, को. 1336, वी.उ. 47, को.शा. 109, को. शा. 648, को.शा. 659, को. 1148, को. 1158, को. 6811, वी.उ. 17, वी.ओ. 54, वी.ओ. 70, वि.उ. 34, को. 527, को.शा. 568, को. 62035, को. 06425, को. 1007, को. 1347 तथा को. 6611 इत्यादि, जो पुरानी जातियों की अपेक्षा उत्तम सिद्ध हो चुकी हैं, गत 4-5 वर्षो में संचालक, ईख अनुसंधान, शाहजहाँपुर द्वारा प्रचलित की गई हैं।

ईख के लिए यों तो दोमट या दोमट मटियार भूमि सबसे उत्तम होती है, परंतु कुछ जातियाँ हलकी दोमट में और कुछ पानी रुकनेवाली नीची भूमि में भी सफलता से उगाई जा सकती हैं। बोआई अधिकतर फरवरी-मार्च में की जाती है, परंतु पिछले 5-6 वर्षो से सितंबर अक्टूबर की बोआई की प्रथा बढ़ती जा रही है। इस ऋतु में बोई हुई ईख की उपज 10-15 प्रतिशत अधिक होती है और उसमें चीनी या गुड़ का पड़ता लगभग 0.5 प्रतिशत अधिक बैठता है।

साधारणत: ईख को लगभग 120 पाउंड प्रति एकड़ नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है जो आधा गोबर की खाद, कंपोस्ट या हरी खाद और आधा रासायनिक खाद के रूप में देना उचित होता है। फास्फोरस-वाली खादें इस प्रदेश के कुछ ही क्षेत्रों में उपयोगी सिद्ध हुई हैं। पूर्वोक्त खादों को बोआई के पूर्व 50 से 75 पाउंड प्रति एकड़ फास्फोरिक ऐसिड के साथ देना चाहिए, परंतु ईख की फसल बोने के पूर्व हरी खाद की फसल में इसे डालने से ईख की उपज पर प्राय: सभी क्षेत्रों में अच्छा प्रभाव पड़ता है।

उत्तर प्रदेश में ईख की फसल के लिए तीन चार सिंचाइयाँ अनिवार्य होती हैं। सितंबर अक्टूबर में बोई हुई ईख को जनवरी में एक बार अधिक सींचने की आवश्यकता होती है। तराई और भाट कछार जमीनों में केवल एक दो सिंचाई से ही काम चल जाता है। फसल बोने के एक सप्ताह के भीतर एक हलकी गोड़ाई और गर्मियों में प्रत्येक सिंचाई के पश्चात्‌ कम से कम एक गोड़ाई करने से फसल का जमाव और उत्पादन अच्छा होता है। वर्षा ऋतु में आवश्यकतानुसार ईख पर मिट्टी चढ़ाना और मेड़ों को बाँधना चाहिए, जिससे अच्छी बढ़ी हुई फसल के गिरने की आशंका कम रहे।

ईख में 'काना' और 'उकठा' रोग विशेष हानिकारक होते हैं। नीरोग और स्वस्थ बीज बोने से और चार सालवाला या कम से कम तीन सालवाला फसल चक्र अपनाने से न केवल फसलें बीमारियों से सुरक्षित रहती हैं बल्कि भूमि की उर्वरा शक्ति भी नष्ट नहीं होती और बराबर अच्छी उपज मिलती रहती है। कँसुआ (कीड़े) और दीमकों से फसलों को बचाने के लिए 20 प्रतिशत 'गामा-वी.एच.सी.' के घोल को 4 पाउंड प्रति एकड़ के हिसाब से 150 गैलन पानी में मिलाकर बोआई के समय पैंड़ों पर छिड़कना चाहिए। इसी प्रकार फसल का जमाव सुधारने के लिए एरीटान (तीन प्रतिशत) के 0.5 प्रतिशत घोल (एक पाउंड एरीटन, 20 गैलन पानी) में बोआई के पूर्व पैंड़ों को डुबा लेना चाहिए।

फसल की कटाई का काम प्राय: अक्टूबर नवंबर से मार्च अप्रैल तक चलता है। बोई हुई फसल काटने के बाद उसकी पेड़ी की फसल एक साल या अधिक से अधिक दो फसल तक लेने से किसानों को विशेष लाभ होता है। परंतु पेड़ी में खाद, सिंचाई, गोड़ाई और अन्य देखरेख उसी प्रकार करनी चाहिए जैसे नई बोई ईख में।

उत्तर प्रदेश में ईख की खेती में 20 क्विंटल बीज प्रति एकड़ लगता है और उपज 20 टन प्रति एकड़ होती है। ईख का भारत सरकार द्वारा हाल में निर्धारित मूल्य पूर्वी जिलों में 12.25 रु. प्रति क्विंटल तथा पश्चिमी जिलों में 13.25 रु. प्रति किवंटल है। अनुमान किया जाता है कि इस प्रदेश में कुल 70 करोड़ मन ईख हर साल पैदा की जाती है जिसमें से लगभग 51 प्रतिशत उपज गुड़ बनाने के काम में, 31 प्रतिशत चीनी बनाने में और शेष 18 प्रतिशत खँडसारी के काम में, चूसने के काम में और बोवाई में प्रयुक्त होती है। 1972-73 ई. में उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को 815 लाख क्विंटल गन्ना दिया गया। इससे चीनी के उत्पादन में भी बृद्धि होगी।

चीनी मिलों में ईख के रस से चीनी के अतिरिक्त टाफी, लेमन ड्राप और शुगरक्यूब इत्यादि बनाए जाते हैं और शीरे से शराब, स्पिरिट और पेट्रोल में मिलाने के लिए ऐलकोहल आदि। ईख की खोई से कागज और दफ़्ती बनती है। शीरे के साथ खोई को एक विशेष ढंग से मिलाकर पशुओं के लिए चारा भी तैयार किया जाने लगा है। जिन मिलों में रस की सफाई के लिए गंधक का प्रयोग होता है उनके गाढ़े रस को छानने से बची सिट्ठी (प्रेस मड) बहुमूल्य खाद होती है जिसे ईख की फसल में डालने से उपज में विशेष वृद्धि होती है।


टीका टिप्पणी और संदर्भ